झूठ का मेगा मॉल

झूठ ने आखिरकार मार्केटिंग की दुनिया में वह धमाका कर दिया, जो सच ने कभी सोचा भी नहीं था। भव्य “झूठ महा-सेल” का उद्घाटन अहोरात्र स्मरणीय झूठानंद बेलेगाम के करकमलों से हुआ। लाल-पीले बैनर, चमचमाती लाइटें और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—
“आज का धमाकेदार ऑफर: एक झूठ के साथ दो झूठ बिल्कुल फ्री!”

सेल्स काउंटर पर ऐसी भीड़ उमड़ी कि देखकर सच में सच का मुँह काला हो जाए—न्यूज़ मीडिया, राजनीतिज्ञ, धर्मगुरु, लेखक, प्रकाशक, कोचिंग संचालक, पक्ष-विपक्ष के नेता, अधिकारी—सब अपने-अपने झोले लेकर लाइन में खड़े थे। कहीं धक्का-मुक्की, कहीं रेलमपेल—झूठ की बंदरबांट हो रही है। लंगर सा लग गया है झूठ का।

स्टॉल के बीचों-बीच—सेल्स मैनेजर झूठ प्रसाद—माइक थामे बड़े रोचक अंदाज़ में ग्राहकों को लुभा रहे थे—
“आइए-आइए! हर तरह का झूठ उपलब्ध है—पॉलिटिकल पैक, धार्मिक स्पेशल एडिशन, मीडिया ब्रेकिंग वर्जन, और छात्रों के लिए एग्ज़ाम क्रैक झूठ! आपकी जरूरत, हमारी पैकिंग—जब दोनों होंगे साथ, तो झूठ का होगा बोलबाला, सच्चे का मुँह काला!”

सेल्स मैनेजर ने अगला ऑफर अनाउंस किया—
“स्पेशल कॉम्बो! एक झूठ के साथ दो अफवाहें फ्री, और अगर बल्क में खरीदेंगे तो ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ भी कॉम्प्लिमेंट्री!”

एक ग्राहक—नेता जी—आगे बढ़े, बोले,
“भाई, चुनावी सीज़न है… कुछ दमदार चाहिए।”

सेल्स मैनेजर मुस्कराए—
“सर, आपके लिए प्रीमियम पैक है—वादों वाला झूठ। इसके साथ ‘आश्वासनों की लड़ी’ और ‘यू-टर्न गारंटी’ बिल्कुल मुफ्त!”

तभी एक न्यूज़ एंकर ने अपना माइक सेल्स मैनेजर के मुँह में घुसा दिया—
“क्या इसमें टीआरपी बढ़ाने वाला मसाला भी मिलेगा?”

“बिल्कुल सर! ये लीजिए ‘ब्रेकिंग न्यूज़ झूठ’—एक झूठ को दस अलग अंदाज़ में पैक किया गया है, वैलिडिटी लंबी है!”

उधर धर्मगुरु भी पीछे क्यों रहते—
“कोई ऐसा पैकेट हो जिसमें भक्त भगवान से पहले हम पर विश्वास कर लें बस?”

“आपके लिए आस्था स्पेशल झूठ—स्वर्ग की सीढ़ियों से लेकर मोक्ष प्रदान करवाने का प्रीमियम पैकेज! इस समय यही ट्रेंड में है।”

कोचिंग वालों की भीड़ अलग लगी थी—
“हमें ऐसा झूठ चाहिए जो बच्चों को सपने बेचे।”

सेल्स मैनेजर तुरंत बोले—
“ये लीजिए ‘सक्सेस गारंटी झूठ’—100% चयन का दावा!”

भीड़ में एक लेखक भी खड़ा था—
“थोड़ा साहित्यिक झूठ मिल जाए, तो मेरा भी काम बने?”

“सर, आपके लिए ‘भावनात्मक झूठ’ है—सनसनी और वाद के साथ वादा खिलाफी वाला झूठ भी।”

इतने में एक बुजुर्ग—कृषकाय देह धारी—कुछ ढूंढते हुए भीड़ चीरते हुए काउंटर तक पहुँचे—
“बेटा, सच मिलेगा?”

“क्या-क्या ढूंढ रहे हो बाबा? कोई खाने की चीज है क्या? देख नहीं रहे बोर्ड—यहाँ केवल झूठ मिलता है। चाहिए कोई, तो बताओ पैक करा दूँ।”

“नहीं, मैंने सोचा जहाँ झूठ मिल रहा है, वहाँ कहीं सच भी पड़ा होगा। पुराना हो तो चलेगा। वो क्या है, पुराना ही थोड़ा टिकाऊ होता है। नया सच तो कब रंग बदल ले, पता ही नहीं चलता—पता लगे कि पड़ा-पड़ा झूठ में बदल गया।”

“अरे जाओ बाबा, तुम्हें लेना तो कुछ है नहीं, टाइम खराब कर रहे हो। ये सब पागल हैं क्या जो यहाँ भीड़ लगाए हैं? देखो, नया सच तो तुम्हें मिलेगा ही नहीं। अगर तुम्हारा खुद का खो गया है इस भीड़ में, तो ये कोई गुमशुदगी की रिपोर्ट वाला काउंटर नहीं है। पकड़ कर क्यों नहीं रखा?”

बाबा इस मेले में भी देख रहे हैं—शायद कहीं गुम हो गया होगा।

शोरगुल सुनकर भीड़ उत्सुकता से देखने लगी कि क्या चल रहा है। तभी दो पुलिस वाले डंडा हिलाते हुए आ पहुँचे—
“हटो-हटो! क्या बात हुई? क्यों बाबा पर चिल्ला रहे हो?”

“लो हवलदार साहब, आप ही बात कर लो—बूढ़ा पगला गया है। झूठ लेना नहीं है, ये सच की बात कर रहा है। पता नहीं कहीं गुम गया है, उसे ढूंढ रहा है।”

हवलदार बोले—
“बाबा, क्या हुआ? छोटा बच्चा था क्या, उंगली पकड़कर चलना चाहिए था ना? यहाँ लाते क्यों हो बाज़ार में? तुम्हें पता है इस भीड़ में सच को कोई कुचल देगा—झूठ के बड़े-बड़े ट्रक आ रहे हैं, माल अनलोड हो रहा है।”

बाबा बोले—
“अरे नहीं भाई… हमारे ज़माने में तो सच ही मिलता था। मैं तो यही सोचकर आया था कि यहाँ मिल जाएगा सेल में। बड़ा महंगा हो गया है। पहले पड़ोस की दुकान पर भी मिल जाता था—पड़ोसी ही बाँट लेते थे आपस में। पूरी जिंदगी खूब सप्लाई रही… अब बड़ी किल्लत हो गई यार। बिना उसके रहा नहीं जाता। जीने की तमन्ना सी खत्म हो गई है। घर में झूठ पक रहा होता है—बदबू के मारे टिकता नहीं जाता। घरवालों से कहता हूँ कि कभी सच भी पका लिया करो, तो मुझे पागल समझते हैं।”

हवलदार कुछ समझ नहीं पा रहा—
“यार, अगर किसी ने चोरी कर लिया हो तो रिपोर्ट लिखवा दो थाने में। हुलिया-वुलिया बता दो—कद-काठी, कब जन्म हुआ, कोई एक्सपायरी डेट, किसी पर शक—तब तो बात बने।”

बाबा हँस पड़े—
“तुम लोग ही पागल हो गए हो। सच तो अनादि काल से है भाई—वो क्या एक्सपायर होगा! बस झूठ ने उसे छुपा दिया है। निकलने नहीं देता बाहर। इस दुकान की छानबीन करो—यहीं कहीं ब्लैक मार्केटिंग कर रहे होंगे, बाद में ऊँचे दाम पर बेचेंगे।”

सेल्स मैनेजर ने स्थिति संभाली—
“अच्छा बाबा, आप अपना नाम लिखवा दो… हम ढूंढ लेंगे।”

फिर धीमे से मुस्कराते हुए बोला—
“बाबा, सच अब आउटडेटेड प्रोडक्ट है… कोई डिमांड नहीं, इसलिए हम रखते नहीं। हमारे पास ‘सच जैसा दिखने वाला झूठ’ है—वही आजकल ज़्यादा चलता है। आपको सस्ते दामों में दे देंगे।”

इधर भीड़ में फिर शोर उठा—
“अरे ये कौन बाबा है? हटाओ इसे! जब दुकानदार कह रहा है नहीं है, तो क्यों पीछे पड़ा है? मार्केट में जो ट्रेंड है वही खरीदना चाहिए! ये पुराने सामान लेकर क्या अजायबघर बनाएगा घर?”

“हटाओ इसे हवलदार साहब!”

हवलदार ने बूढ़े को खींचकर भीड़ से बाहर कर दिया। ज़्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ी—बाबा अपना मुँह छुपाए धीरे-धीरे वहाँ से चला गया।

मेला जोर पकड़ चुका था।
सेल्स काउंटर पर माहौल फिर से खरीददारी के अनुकूल हो गया।

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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