मेरे पास डिग्री है…तेने खन्ने क्या ?

मेरे पास डिग्री है…तेने खन्ने क्या ?

दीवार फिल्म का वह मशहूर संवाद अब जमाने की धूल झाड़कर नए रूप में हमारे सामने खड़ा है। पहले भाई लोग कहा करते थे—मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, दौलत है, शोहरत है, तुम्हारे पास क्या है? आज का शिक्षित, अर्धशिक्षित, अतिशिक्षित और कागज़ी रूप से महाशिक्षित युवक कॉलर खड़ी करके कहता है—मेरे पास डिग्री है।

आज के समय में आदमी का चरित्र बाद में देखा जाता है, पहले उसकी फाइल देखी जाती है। चेहरे पर तेज हो या न हो, फोल्डर में डिग्री होनी चाहिए। आदमी भूखा हो, बेरोज़गार हो, निराश हो, प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंगों में अपनी जवानी घिस चुका हो, पर अगर हाथ में लैमिनेटेड डिग्री है तो समाज उसे सम्मानपूर्वक असफल मानता है। यह हमारे सभ्य समाज का बड़ा मानवीय पक्ष है कि वह खाली हाथ आदमी को कुछ नहीं समझता, पर हाथ में डिग्री लिए आदमी को कम से कम चाय पिलाकर उसकी दुर्दशा जरूर पूछ लेता है।

संविधान निर्माताओं ने शिक्षा का अधिकार देकर बड़ी दूरदर्शिता दिखाई थी। वे जानते थे कि आने वाली पीढ़ियाँ केवल अधिकार नहीं, विडंबनाएँ भी भोगेंगी। शिक्षा का अधिकार इस देश में वैसा ही अधिकार है जैसे रेलवे प्लेटफॉर्म पर शुद्ध पेयजल का बोर्ड—लिखा बहुत सुंदर रहता है, पर नल में या तो पानी नहीं आता, या इतना टपकता है कि आदमी ज्ञान से पहले धैर्य सीख ले। हर नागरिक को अच्छी शिक्षा मिले, यह बात इतनी पवित्र है कि इसे सुनते ही अनेक लोग भावुक हो जाते हैं, और तुरंत अपने बच्चों का एडमिशन उस स्कूल में कराते हैं जहाँ फीस देखकर खुद शिक्षा भी शर्मा जाए।

अब शिक्षा केवल शिक्षा नहीं रही, वह निवेश है, प्रतिष्ठा है, वैवाहिक योग्यता है, पड़ोसी पर मनोवैज्ञानिक आक्रमण है, और कई मामलों में तो यह माता-पिता के अधूरे सपनों की रजिस्ट्री है। हर माँ-बाप का सपना है कि बच्चा पढ़-लिखकर बड़ी डिग्री लाए, अच्छी नौकरी करे, नाम रोशन करे। बच्चा बेचारा पहले एल.के.जी. से ही समझ जाता है कि वह परिवार में संतान कम, प्रोजेक्ट अधिक है। उस पर अंक ऐसे लादे जाते हैं मानो वह बच्चा नहीं, सरकारी गोदाम में रखा गेहूँ हो। दसवीं में नंबर कम आ जाएँ तो ऐसा मातम मनता है जैसे लड़के ने गणित में 72 नहीं, खानदान की इज्जत में 28 अंक ला दिए हों।

हमारे यहाँ प्रतिभा पर भरोसा करने की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है, पर मार्कशीट पर भरोसा करने की परंपरा प्राचीन है। कोई व्यक्ति बिना डिग्री के हुनर के बल पर चंद्रमा पर होटल खोल दे, मंगल पर पानी ढूँढ़ लाए, या गाँव की टूटी पुलिया अपने जुगाड़ से बना दे—तब भी हम पूछेंगे, “अच्छा ये बताइए, बारहवीं में मैथ्स में कितने आए थे?” हम ऐसे व्यावहारिक लोग हैं कि सफलता को देखकर प्रभावित नहीं होते, पहले उसकी अंकतालिका देखकर निर्णय लेते हैं कि ताली बजानी है या नाक सिकोड़नी है। हमारे यहाँ आदमी की उपलब्धि से ज़्यादा उसकी मार्कशीट का करियर लंबा होता है।

डिग्री का भी अपना सामाजिक जीवन होता है। नौकरी मिल जाए तो वही डिग्री “मेहनत का फल” कहलाती है। नौकरी न मिले तो वही डिग्री “समय की बर्बादी” घोषित कर दी जाती है। रिश्तेदारों की दृष्टि में बेरोज़गार डिग्रीधारी व्यक्ति बहुत उपयोगी प्राणी होता है—हर शादी-ब्याह, तीज-त्योहार, पारिवारिक जमघट और शोकसभा में उसका उदाहरण देकर दूसरे बच्चों को प्रेरित किया जा सकता है। “देखो बेटा, पढ़ो-लिखो, नहीं तो इनकी तरह हो जाओगे”—यह वाक्य सुनने के बाद वह डिग्रीधारी युवक समझ जाता है कि उसका सबसे बड़ा रोजगार फिलहाल सामाजिक चेतावनी बनना है।

हाँ, डिग्री का एक व्यावहारिक उपयोग हमेशा बना रहता है। नौकरी न दे पाए तो भी कागज़ का स्तर अच्छा होता है। अच्छे कागज़ पर छपी डिग्री समोसे का तेल भी बड़ी गरिमा से सोखती है। इस दृष्टि से डिग्री को कभी पूरी तरह वेस्ट नहीं कहा जा सकता। कुछ डिग्रियाँ तो इतनी चमकदार होती हैं कि उन्हें देखकर ही लगता है, इन्हें पढ़ने से अधिक छपवाने में श्रम लगा होगा।

अब जहाँ चाह, वहाँ राह। जिन्हें पढ़-लिखकर डिग्री नहीं मिलती, वे व्यवस्था की रचनात्मकता पर भरोसा रखते हैं। हमारे यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में भी उद्यमिता का अद्भुत विकास हुआ है। कुछ लोग विश्वविद्यालय को सरस्वती का मंदिर नहीं, कस्टमाइज्ड प्रिंटिंग प्रेस की तरह देखते हैं। वे आत्मनिर्भर लोग होते हैं। वे अंकों के लिए किताबों पर निर्भर नहीं रहते। उन्हें मालूम होता है कि कौन-सा कोर्स चाहिए, कितने प्रतिशत चाहिए, कौन-सी यूनिवर्सिटी से चाहिए, और कितनी जल्दी चाहिए। यह नया भारत है—यहाँ शिक्षा में भी ‘डोरस्टेप डिलिवरी’ की संभावनाएँ हैं।
और कभी-कभी डिग्री के साथ थर्ड डिग्री भी बोनस में मिल जाती है, ताकि सत्य और प्रमाणिकता का संतुलन बना रहे।

शादी-ब्याह के बाजार में डिग्री का महत्व तो प्राचीन काल से स्थापित है। लड़की वाले लड़के की शक्ल से पहले उसकी योग्यता पूछते हैं, और योग्यता का अर्थ चरित्र, संवेदना, जिम्मेदारी या संस्कार नहीं—सीधे-सीधे डिग्री है। मानो विवाह दो आत्माओं का नहीं, दो प्रमाणपत्रों का पवित्र गठबंधन हो। जैसे ही उधर से कहा जाता है—“लड़का एम.ए., बी.एड., नेट, सेट, पीएचडी है”—इधर से जवाब आता है—“अच्छा… और पैकेज?” फिर बातचीत धीरे-धीरे डिग्री से दहेज, दहेज से वाहन, वाहन से फर्नीचर, और फर्नीचर से पनाह तक पहुँच जाती है। शादी कम, दस्तावेज़ों और मांगपत्रों की संयुक्त संसदीय समिति अधिक लगती है।

राजनीति ने भी डिग्री का महत्व समय के साथ भली प्रकार समझ लिया है। पहले विपक्ष सीधे इस्तीफ़ा माँगता था। अब वह आधुनिक, शिक्षित और अकादमिक हो गया है—पहले डिग्री माँगता है, फिर इस्तीफ़ा। लोकतंत्र में बहस का स्तर ऊपर उठा है। जनता पानी, बिजली, रोज़गार, महँगाई, अस्पताल और सड़क पर अटकी रहे, पर नेता एक-दूसरे की डिग्री जाँचते रहें—इससे लोकतंत्र में बौद्धिकता का वातावरण बना रहता है। आजकल कोई मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री की डिग्री देखना चाहता है, कोई प्रधानमंत्री किसी और की नीयत। जनता बीच में बैठी यह सब देखकर सोचती है कि देश समस्याओं से नहीं, प्रमाणपत्रों से चलेगा।

सच तो यह है कि हमारे यहाँ डिग्री ज्ञान का प्रमाण कम, सामाजिक प्रतिष्ठा का पासपोर्ट अधिक है। यह एक ऐसा ताबीज़ है, जिसे गले में डालकर आदमी उम्मीद करता है कि नौकरी, सम्मान, रिश्ता, पहचान, स्थायित्व—सब कुछ अपने आप प्रकट हो जाएगा। लेकिन डिग्री भी बेचारी क्या करे? वह कागज़ है, चमत्कार नहीं। उससे उम्मीदें ऐसी रखी जाती हैं मानो बी.ए. का प्रमाणपत्र नहीं, अलादीन का चिराग हो। डिग्री मिलते ही घर वाले समझते हैं अब लड़का कमाएगा। लड़का समझता है अब समाज सम्मान देगा। समाज समझता है अब यह प्रतियोगी परीक्षा देगा। प्रतियोगी परीक्षा समझती है—पहले कोचिंग लो। कोचिंग समझती है—पहले फीस दो। और बेरोज़गारी मुस्कराकर कहती है—स्वागत है।

इसलिए आज का सबसे बड़ा नायक वह नहीं जिसके पास गाड़ी, बंगला, बैंक बैलेंस और जायदाद है। आज का असली नायक वह है जो सीने पर हाथ रखकर कह सके—मेरे पास डिग्री है।
भले नौकरी न हो, अनुभव न हो, अवसर न हो, पर डिग्री है।
यानी उम्मीद को अभी पूरी तरह मृत घोषित नहीं किया जा सकता।

और यह भी क्या कम उपलब्धि है कि इस देश में आदमी के पास रोटी बाद में आती है, प्रमाणपत्र पहले आ जाता है। पहले लोग कहते थे—हाथों में दुनिया है। अब हालत यह है कि मुँह में रजनीगंधा हो या न हो, हाथ में डिग्री होनी चाहिए।
क्योंकि इस महान गणतंत्र में आदमी की औकात उसके विचारों, व्यवहारों और कार्यों से कम, और फाइल में लगे पारदर्शी प्लास्टिक कवर से ज्यादा आँकी जाती है।

तो आइए, इस डिग्री-युग का सम्मान करें।
जो पढ़कर लाए, उनका भी।
जो खरीदकर लाए, उनका भी।
जो लेकर भी कुछ न कर पाए, उनका सबसे अधिक।
क्योंकि अंततः इसी कागज़ी सभ्यता ने हमें यह महान आत्मविश्वास दिया है कि चाहे जेब खाली हो, भविष्य धुँधला हो, नौकरी दूर हो, पर संवाद बोलने लायक एक पंक्ति तो हमारे पास है—

मेरे पास डिग्री है…”

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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