मूर्खोपाख्यानम् : देवलोक सभा में मूर्खता का महातांडव

मूर्खोपाख्यानम् : देवलोक सभा में मूर्खता का महातांडव”

देवलोक में उस दिन एक विचित्र विषाद-वातावरण व्याप्त था—नूपुर निनाद निस्तेज, गंधर्व-गान गुमसुम, और सभा में ऐसा मौन मानो चिंता ने चुप्पी की चादर ओढ़कर वाई-फाई का फुल नेटवर्क पकड़ लिया हो। देवराज इंद्र सिंहासन पर विराजमान थे, पर मुखमंडल पर वह मलिनता थी जो सामान्यतः तब आती है जब राजा को यह आभास हो जाए कि सिंहासन डोल रहा  है।

तभी वीणा-विनोद-विन्यास करते देवर्षि नारद अवतरित हुए—
“नारायण-नारायण! महाराज, यह मुखमुद्रा क्यों मलिन? कहीं इंद्रधनुष पर जीएसटी का नया स्लैब तो नहीं लग गया?”

इंद्र ने इधर-उधर देखा, फिर स्वर को गंभीरता का स्वेटर पहनाकर बोले—
“देवर्षि, मृत्युलोक से मूर्खता के महाप्रसार का समाचार है। बुद्धि वहाँ शरणार्थी शिविरों में आवेदन भर रही है। इतिहास गवाह है—जहाँ मूर्खता मस्त होती है, वहाँ सत्ता शंकित होती है। मुझे भय है, यह मूर्ख-महामारी कहीं इंद्रलोक में न प्रवेश कर जाए!”

नारद ने मुस्कान की महीन माला पहनी और बोले—
“महाराज, यह समाचार नहीं, समयाचार है। अब वहाँ ‘मूर्खमेव जयते’ का महामंत्र मान्य हो चुका है। बुद्धि अल्पसंख्यक है, और अल्पसंख्यक होना अब बुद्धिमानी नहीं, जोखिम है।”
इंद्र चौंके—
“पर यह कैसे संभव हुआ?”
नारद हँसे—
“महाराज, मूर्खता अब अधिकार है—जन्मसिद्ध, जनसुलभ और जनप्रिय! पहले माता-पिता, गुरुजन, समाज—सब मिलकर बुद्धि का बीज बोते थे। अब वही लोग मूर्खता की फसल काट रहे हैं। चप्पलें चटकती हैं, डंडे दम तोड़ते हैं, पेंसिलें टूटती हैं—पर बुद्धि का पन्ना खुलता नहीं।
इंद्र ने विस्मय से पूछा—
“तो क्या मूर्खता ही अब योग्यता है?”
नारद ने व्यंग्य-वाण छोड़ा—
“योग्यता ही नहीं, प्रमोशन-प्रमाणपत्र है! और इसका वर्गीकरण भी हुआ है—
दृश्य मूर्ख—जो दिखते हैं पर होते नहीं; ये चाटुकाराचार्य हैं, चरण-चुंबक चमत्कारी हैं ।
अदृश्य मूर्ख—जो होते हैं पर दिखते नहीं; ये फाइलों में फंसे अफसर, कागजों के कंगूरों में कुंडली मारे बैठे हैं ।
और विशुद्ध मूर्ख—जो होते भी हैं, दिखते भी हैं, ये खुद दिशाहीन लेकिन दूसरों को  दिशा भी देते हैं। यही नेता, यही नायक, यही लोक-लुभावन लोकप्रतिनिधि!”
इंद्र ने माथा पकड़ा—
“तो बुद्धिमानों का क्या?”
नारद ने वीणा को विराम दिया—
“बुद्धिमान हैं, महाराज, पर उनकी दशा वही है जो सभा में संयुक्त राष्ट्र की होती है—देखते हैं, बोलते हैं, प्रस्ताव पास करते हैं, पर परिणाम पास नहीं होता।”

इंद्र ने पूछा—
“मूर्खता में ऐसा आकर्षण क्या है?”
नारद ने वक्रोक्ति का वस्त्र ओढ़ाया—
“मूर्खता अद्भुत आवरण है। इसे ओढ़ते ही व्यक्ति सरल कहलाता है; सरल होते ही विश्वसनीय, और विश्वसनीय होते ही उपयोगी—यानी उपयोगी होने की उपयोगिता का उपयोग हो जाता है।
कार्यालय में मूर्ख बनिए—आपको काम नहीं पकडाया जाएगा ।घर में मूर्ख बनिए—ग्रह कलेश से निपटारा  मिलेगा। राजनीति में मूर्ख बनिए—भीड़ आपके लिए पलक और पांवड़े बिछा देगी
इंद्र ने आश्चर्य से कहा—
“अर्थात मूर्खता लाभप्रद है?”
नारद ठहाके के साथ बोले—
“लाभ ही लाभ! मूर्ख प्रश्न नहीं करता, केवल ‘हाँ’ की हांड़ी में ‘हाँ’ ही उबालता है। सामने वाले की अहं-तृप्ति होती है—‘देखो, हमने इसे मूर्ख बनाया।’ और कई बार—मूर्ख बनने का अभिनय ही व्यक्ति को यश, धन, वैभव का वीआईपी पास दिला देता है!”
इंद्र धीरे-धीरे समझ के सरोवर में उतर रहे थे—
“तो क्या बुद्धिमत्ता अपराध हो गई?”
नारद ने गंभीरता का गमछा डाला—
“ बुद्धीमान आदमी प्रश्न बहुत पूछता है l अब प्रश्न करना ही अपराध है, महाराज!
जो पूछे—वह विरोधी। जो सोचे—वह संदिग्ध। जो चुप रहे—वही देशभक्त घोषित है महाराज !”
इंद्र ने कहा—
“तो शासन का आधार मूर्खता है?”
नारद बोले—
“भीड़ मूर्खों की बनती है, बुद्धिमान तो मार्ग स्वयं बनाते हैं। मूर्खता मन को अर्धमूर्छित करती है—रंगों को एकरंगी बना देती है। सावन का अंधा हरा देखता है, जेठ का अंधा केसरिया—और दोनों को लगता है कि वही रंग राष्ट्रध्वज है।”
इंद्र ने अंतिम प्रश्न किया—
“तो इसका अंत?”
नारद मुस्कराए—
“महाराज, मूर्खता का अंत नहीं, अपग्रेड होता है। हर युग में नया वर्जन—अब यह संस्थानों, सम्मानों, संगठनों और श्रद्धा के पैकेज में उपलब्ध है। यहाँ मूर्ख गुरु है, मूर्ख शिष्य है, और मूर्खता ही मोक्ष का मार्गदर्शक है।”
इंद्र थके स्वर में बोले—
“तो उपाय?”
नारद वीणा उठाकर बोले—
“नारायण-नारायण! उपाय सरल है—मूर्खता से ही मूर्खता से लड़ सकते हैं ।
यदि सिंहासन बचाना है, तो समझदारी का त्याग करिए, मूर्खता की बयार बहने दीजिये !”
इतना कहकर नारद प्रस्थान कर गए। और इंद्रसभा में फिर वही मौन छा गया—
लगता है कहीं कहीं  मूर्खता का मौन-समर्थन था…
इंद्र को पहली बार लगा—सिंहासन वास्तव में खतरे में है,
क्योंकि अब उसे बचाने के लिए बुद्धि नहीं, मूर्खता चाहिए।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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