“इतिहास का संदूक और बब्बन चाचा की मूँछें”
उस दिन बब्बन चाचा कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न थे। चेहरे पर वही चमक थी, जैसी पुरानी अलमारी में अचानक मिली सौ रुपये की नोट देखकर आ जाती है । मैंने गौर से देखा तो चौंक पड़ा—
“चाचा, आज बड़े दमक रहे हो… और ये मूँछें! ये एक ही दिन में कहाँ से उग आईं? कल तक तो आप ‘सफाचट क्रांति’ के ब्रांड एंबेसडर बने घूम रहे थे!”
चाचा ने गले को खंखारा, मूँछों पर ऐसे हाथ फेरा जैसे कोई पुरातत्व विभाग का अधिकारी नई खोज पर धूल झाड़ता है—
“अरे भतीजे, आज तो वंश की शान वापस आई है! ये हमारे परदादा जी की मूँछें हैं… वही ऐतिहासिक मूँछें… जो सालों से संदूक में सुरक्षित थीं। हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया इस पर। बस यूँ ही परदादा की याद में संदूक खंगाल रहे थे कि ये मूँछें नज़र आ गईं!”
थोड़ा ठहरकर बोले—
“अब क्या करें, यही तो छोड़ गए हमारे पूर्वज। कोई तीर-तलवार, धन-दौलत तो थी नहीं… मूँछों के धनी थे बस!”
फिर उन्होंने गर्दन ऊँची की—
“देखो, जब सब अपने अतीत पर गर्व कर रहे हैं, अपने दादा-परदादा की कब्रें खोद रहे हैं, इतिहास के पीछे पड़े हैं, हर कोई अपना इतिहास उज्ज्वल बता रहा है… तो भला हम क्यों पीछे रहें?”
मैंने हिम्मत करके कहा—
“लेकिन चाचा, तलवार और मूँछ में थोड़ा फर्क तो होता है…”
चाचा तुरंत ताव में आए—
“अरे भतीजे! तलवार का धनी होना अपनी जगह, पर मूँछों का धनी होना उससे भी बड़ा गौरव है! हमारे दादा तो मूँछों के बाल गिरवी रखकर पूरे खानदान की रोजी- रोटी चलाते थे!” “एक-एक करके उनके सारे बाल जमींदार के यहाँ गिरवी रख दिए गए थे। मरते वक्त परदादा ने दादा से कहा था—‘बेटा, एक शूल मेरे सीने में रह गया कि मेरी मूँछें मेरे साथ नहीं… इन्हें तुम्हारे हाथों सौंपना चाहता था… अब इन्हें छुड़ाना तुम्हारा धर्म है!’”
चाचा की आँखें चमक उठीं—
“बस, दादा ने विद्रोह कर दिया! लाल झंडा सलाम वालों के गिरोह में शामिल हो गए। एक दिन जमींदार को पकड़ लिया—सबसे पहले उसकी मूँछें काटीं, फिर परदादा की मूँछें आज़ाद कराईं! दादा उन्हें पहनते रहे… लेकिन मेरे बाप ने इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया। मूँछें फिर संदूक में चली गईं। अब वक्त आ गया है—अपने इतिहास को फिर से चेहरे पर चढ़ाने का!”
मैं हक्का-बक्का—
“लेकिन चाचा, इससे होगा क्या? आजकल तो क्लीन शेव का ज़माना है… मूँछ की पूछ कहाँ? आजकल तो पूँछ की पूछ है—बस हिलाने के लिए कोई सामने चाहिए!”
चाचा ने आँखें तरेरीं—
“तुम नई पीढ़ी वाले समझोगे नहीं! हम इतिहास को जीते हैं, ढोते नहीं! और सुनो—खुद की मूँछ उगाने में समय लगता है, अपने दादा परदादा की लगाने में नहीं। ज़रूरत पड़े तो उतारकर जेब में रख लो! इतिहास दिखाने की चीज़ है—निकालो, धूप दिखाओ, और तान दो—‘देखो, ये हमारी विरासत है!’”
अब चाचा का रोज़ का रूटीन तय हो गया—सुबह उठते ही ‘इतिहास अलाप’।
“हमारे परदादा की मूँछें इतनी लंबी थीं कि अंग्रेज उनकी छाया में खड़े होकर छाता समझ लेते थे!”
मैंने फिर धीरे से पूछा—
“चाचा, ये सब ठीक है… लेकिन कब तक हम इतिहास को ऐसे ढोते रहेंगे? आजकल लोग नई-नई चीज़ें बना रहे हैं—टेक्नोलॉजी, साइंस…”
चाचा तुरंत भड़क उठे—
“अरे वो सब क्या है! सब हमसे ही चुराया गया है! हमारे यहाँ तो हजारों साल पहले हो चुका था! वाई-फाई? अरे नारद मुनि पहले से ही ‘लाइव अपडेट’ दे रहे थे!”
मैंने आखिरी दांव खेला—
“ठीक है, इतिहास पर गर्व करो… लेकिन दूसरों की मूँछों का भी तो ख्याल करो! अगर हम इन्हीं पुरानी मूँछों को ही ऐंठते रहेंगे, तो नई मूँछें कब उगेंगी?”
चाचा अडिग रहे—
“Old is gold, भतीजे! नया टिकाऊ नहीं होता। पुराने को कहीं भी टिकाओ, किसी को भी टंगी देकर गिरा दो!”
मैं सोचता रह गया—
गर्व करना बुरी बात नहीं… लेकिन अगर मूँछें संदूक में ही पड़ी रहें और हम सिर्फ उनकी कहानी सुनाते रहें, तो क्या हरज़ है? आखिर कब तक हम अपने नंगे चेहरों को इन उधार की मूँछों से ढँकते फिरेंगे?
चाचा आज भी घूम रहे हैं—इतिहास की मूँछें चिपकाए,
वर्तमान और भविष्य—दोनों को संदूक में बंद करके।
क्योंकि इस युग का सिद्धांत साफ है—
इतिहास की मूँछें जितनी लंबी होती जाती हैं,
वर्तमान का चेहरा उतना ही छोटा पड़ता जाता है।
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