प्रेम पत्र में घोस्ट राइटिंग

प्रेम पत्र में घोस्ट राइटिंग

साहित्यिक विधाओं का मेरा रियाज़ किसी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में नहीं, बल्कि प्रेमपत्रों की प्रयोगशाला में हुआ। बात उन दिनों की है जब प्रेम की पेंगें बढ़ाने में प्रेमपत्र का योगदान सर्वाधिक था। प्रेमी को प्रेमिका का पति बनने से पहले दो-चार पाती लिखना अनिवार्य था। वह प्रेमी पतित माना जाता था जो एक अदद प्रेमपत्र भी न लिख सके। कुछ ऐसे भी थे जो यह काम कॉन्ट्रैक्ट पर करवाते थे। हम जैसे घोस्ट राइटर, जिनकी खुद की प्रेम कहानी को कभी किसी ने भाव नहीं दिया… बाकी बंदा दूल्हा नहीं बना तो क्या, बारात तो अटेंड की ही है, तो हमें भी चस्का लग गया प्रेमपत्र लिखने का। अब प्रेमपत्र लेखन का खेल घर में खेलना रिस्की था, इसलिए हम इंतज़ार करते कि कोई हमसे प्रेमपत्र लिखवा ले। मैं उस दौर का अनाम प्रेमाचार्य था, जिसने प्रेम के सर्वहारा वर्ग के लिए जनहित याचिका की तरह प्रेमपत्र लिखे—निःशुल्क, निस्वार्थ और निस्संग।

मेरे पास प्रेमपत्र लिखने के ठेके आते थे—साल भर के कॉन्ट्रैक्ट। धनसुख, मनसुख, बहुबोलीलाल जैसे क्लाइंट्स की लंबी लाइन लगी रहती। कई बार तो एक ही कन्या को प्रेमपत्र लिखने वाले क्लाइंट भी दो-चार होते। उस समय ज़ेरॉक्स का ज़माना नहीं था, सभी प्रेमपत्र हाथ से ही लिखने पड़ते थे।

पत्र पुष्पम्

प्रेमपत्र लिखना कोई मामूली काम नहीं था। यह एक शास्त्रीय प्रक्रिया थी—लगभग वैसी ही जैसे किसी ग्रंथ की रचना। इसमें कुछ अनिवार्य तत्व होते थे, जिनका पालन न किया जाए तो प्रेमपत्र अमान्य घोषित हो सकता था। सबसे पहले तो प्रेमपत्र में लिखने वाले और पढ़ने वाले दोनों के नाम के आगे खाली स्थान छोड़ना आवश्यक था, ताकि पत्र के पकड़े जाने पर किसी भी संभावित मार-कुटाई आदि से बचा जा सके। यह तो स्वाभाविक था कि मैं एक घोस्ट राइटर था, मेरा नाम तो वैसे भी कहीं उजागर होना नहीं था।

पत्र लिखा जाता बंदर छाप नीली स्याही से, दवात भरे फाउंटेन पेन से, जिसे प्रिया की याद में बार-बार तोड़ने का दावा भी किया जाता था। लेकिन बात आती थी पत्र को खून से लिखने की—हालाँकि डर था कि कहीं असली खून से लिख दिया तो कहीं फॉरेंसिक जाँच में मामला खुल न जाए।

पत्र में दिल-जिगर को हमेशा काँच की माफिक चूर-चूर, बिखरा हुआ, तड़पता हुआ दिखाया जाता था… और लड़की को आकर इन्हें समेटने, बचाने की दुहाई दी जाती थी। यादों में तड़पना अनिवार्य था, चाहे अभी यादें बनाने का कोई अवसर प्रस्तावित या संभावित प्रेमिका ने दिया हो या नहीं।

यूँ तो पत्र उभयलिंगी होते थे—वक्त ज़रूरत प्रेमी और प्रेमिका दोनों के काम आ सकते थे—लेकिन कभी किसी लड़की ने हमसे यह शुभ कार्य नहीं करवाया। उन्हें शक था कि कहीं लिखते-लिखते हम ही प्रेम में न पड़ जाएँ।

कुछ ग़ालिब के नाम से प्रेमी संसार में पल रही अवैध शायरी, कुछ कालिदास के श्रृंगार चरित को मात देती पंक्तियाँ—जो शायद मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिली किसी लिपि को डिकोड करके लाई गई हों—इन्हीं से प्रेमपत्र लेखन की परंपरा का श्रीगणेश होता था। “लिखता हूँ खत तेरी याद में…” से शुरुआत—यह सबसे महत्वपूर्ण भाग था। बिना शायरी के प्रेमपत्र ऐसा ही होता जैसे दाल बिना तड़के।

प्रेमपत्रों में फ़िल्मी गीतों का अनोखा घालमेल होता था—आधा गुलज़ार, आधा आनंद बख्शी और थोड़ा-सा पड़ोस के कवि लड्डे के मंचीय अश्लील चुटकुलों का मिश्रण। इस भावनात्मक खिचड़ी को प्रेमिका को चांदनी रात में चांदी के चम्मच से चटाया जाता था।

कुछ प्रेमपत्रों में आशिक के दुस्साहस और अनियंत्रित भावनाओं के अनुसार शरीर के अधोभागों तक का बिहारी टाइप वर्णन भी कर दिया जाता था।

प्रेमपत्र में ब्लैकमेलिंग सेक्शन भी होता था—जब पत्र का जवाब न मिलने पर मर जाने, लटक जाने, डूब जाने या साथ में डुबो देने जैसी धमकियों का समावेश होता था। फिर गोपनीयता का आग्रह—पत्र पढ़कर जला देना, चबा जाना—ताकि किसी और के हाथ न लगे।

पत्रवाहक की जिम्मेदारी प्रायः छोटे बच्चों के कंधों पर होती थी, जिनका काम था पत्रों को इधर-उधर करना। बदले में उन्हें क्रिकेट की बॉल, टॉफ़ी, आइसक्रीम या गली का सिनेमा दिखाने की रिश्वत दी जाती थी।

एक बार तो ग़ज़ब हो गया—गाँव की एक कुलवधु सरीखी प्रेमिका पर कई प्रेमी ऐसे लट्टू थे जैसे अनारसौ बीमारी फैल रही हो। सभी ने पत्र मुझसे ही लिखवाए—लेखन और मजमून एक जैसा। अब उसकी मजबूरी यह कि जो पत्र रामसुख दे रहा है, वैसा ही धनसुख से भी मिला। उस समय न कॉपी-पेस्ट था, न ज़ेरॉक्स। हम भी एक ही प्रेमिका को लिखते-लिखते ऊब गए। जब यह रहस्योद्घाटन हमने उन प्रेमियों को बारी-बारी से किया, तो उस दिन हमने एक तीर से छह प्रेमियों के दिलों को बींध दिया—जितना प्रेमिका की आँखें भी न बींध पाई थीं।

पर विडंबना यह रही कि इस उच्च कोटि के साहित्य का संरक्षण कभी नहीं हुआ। किसी ने उसे गुड्ड-मुड्ड करके जेब में डाल दिया, किसी ने नाली में बहा दिया, और कुछ ने तो भावनाओं के साथ-साथ कागज़ भी कुतर डाला। कई बार प्रेमिका के घरवालों ने प्रेमी के सामने ही पत्र फाड़कर साहित्य की दुर्दशा की, और साथ ही शक भी किया—“यार, ये आठवीं पास ऐसा प्रेमपत्र नहीं लिख सकता, ज़रूर किसी से लिखवाया है!”

गाँव में ऐसे एक घोस्ट राइटर की सघन छानबीन हुई। तब हमने इस शौक से तौबा की।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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