मेवाड़ की लाज बचा जावाँ: महाराणा प्रताप, चेतक और हल्दीघाटी की अमर वीरगाथा

कुछ नाम इतिहास की पुस्तकों तक सीमित नहीं रहते। वे किसी भूमि के स्वाभिमान, किसी समाज की चेतना और आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बन जाते हैं। महाराणा प्रताप ऐसा ही एक अमर नाम हैं।

उनकी कहानी केवल युद्ध की कहानी नहीं है। यह विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान की रक्षा करने, शक्तिशाली साम्राज्य के सामने न झुकने और मातृभूमि की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानने की कहानी है।

इसी शौर्य, त्याग और राष्ट्राभिमान को स्वर देता है वीर-रस से परिपूर्ण गीत—

“मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
केसरिया बन लहरावाँ।”


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महाराणा प्रताप: स्वाधीनता और स्वाभिमान का प्रतीक

अरावली की पर्वत-शृंखलाओं और दुर्गम घाटियों से घिरा मेवाड़ सदियों से वीरता, स्वाधीनता और आत्मसम्मान की भूमि रहा है। इसी मेवाड़ की धरती ने महाराणा प्रताप जैसे योद्धा को जन्म दिया। राजस्थान पर्यटन विभाग कुम्भलगढ़ दुर्ग को महाराणा प्रताप की जन्मस्थली के रूप में प्रस्तुत करता है। वे 1572 में मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठे और जीवनपर्यंत अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे।

उस समय मुगल सम्राट अकबर का साम्राज्य लगातार विस्तृत हो रहा था। अनेक राजघरानों ने मुगल आधिपत्य स्वीकार कर लिया था, लेकिन महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की स्वतंत्र अस्मिता से समझौता नहीं किया।

उनके लिए राजसिंहासन केवल वैभव का साधन नहीं था। वह मातृभूमि की रक्षा का दायित्व था। यही कारण है कि कठिन जंगलों, पहाड़ों और अभावों में जीवन बिताना उन्हें स्वीकार था, लेकिन अधीनता स्वीकार करना नहीं।


हल्दीघाटी: जहाँ स्वाभिमान रणभूमि में उतरा

सन् 1576 में अरावली के संकरे पहाड़ी दर्रे हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की सेना और अकबर की ओर से आमेर के राजा मानसिंह के नेतृत्व वाली सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस स्थान का नाम वहाँ की हल्दी जैसे पीले रंग की मिट्टी के कारण पड़ा।

हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं था। वह दो विचारों का संघर्ष था—एक ओर विशाल साम्राज्य की विस्तारवादी शक्ति और दूसरी ओर अपने छोटे से राज्य की स्वतंत्रता के लिए अडिग खड़ा एक स्वाभिमानी शासक।

इस युद्ध के परिणाम को लेकर इतिहासकारों और लोकप्रिय परंपराओं में अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं। इतना निर्विवाद है कि महाराणा प्रताप युद्धभूमि से जीवित निकले, मुगल सेना उन्हें बंदी नहीं बना सकी और उनका प्रतिरोध इसके बाद भी समाप्त नहीं हुआ।


मेवाड़ की शक्ति: राजपूत, भील और समर्पित सहयोगी

महाराणा प्रताप का संघर्ष केवल किसी एक राजा का संघर्ष नहीं था। उनके साथ मेवाड़ के सैनिक, सामंत, वनवासी भील योद्धा और अनेक निष्ठावान सहयोगी खड़े थे।

कठिन पर्वतीय भूगोल में भील समुदाय की सहायता, मार्गदर्शन और धनुर्विद्या ने मेवाड़ के प्रतिरोध को शक्ति प्रदान की। हकीम खाँ सूरी जैसे योद्धाओं की भागीदारी ने यह भी सिद्ध किया कि महाराणा प्रताप का संघर्ष किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि स्वाधीनता और सम्मान का संघर्ष था।

महाराणा प्रताप की सेना संख्या और संसाधनों में भले सीमित रही हो, लेकिन उसका मनोबल विशाल था। यह भावना गीत की पंक्तियों में मुखर होकर सामने आती है—

“या तो जीत के लौटेंगे,
या माटी में मिल जाना था।”


चेतक: स्वामिभक्ति की अमर पहचान

महाराणा प्रताप की कथा चेतक के बिना अधूरी है। चेतक केवल उनका घोड़ा नहीं, बल्कि रणभूमि का विश्वसनीय साथी था।

राजस्थान पर्यटन के अनुसार हल्दीघाटी के युद्ध के बाद घायल चेतक महाराणा प्रताप को सुरक्षित स्थान तक ले गया और अंततः उसने अपने प्राण त्याग दिए। आज चेतक वीरता, निष्ठा और स्वामिभक्ति का अमर प्रतीक बन चुका है।

लोकगाथाओं और काव्य-परंपरा में चेतक की छलाँग, उसकी गति और युद्धभूमि में उसके साहस का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है। गीत का चौथा अंतरा उसी अद्भुत संबंध को समर्पित है—

“चेतक चौकड़ियाँ भरता था,
बिजली सा लहराता था।”


हल्दीघाटी के बाद भी जारी रहा संघर्ष

हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने अरावली के दुर्गम क्षेत्रों को आधार बनाकर अपना प्रतिरोध जारी रखा। बाद में उन्होंने चावंड को अपनी राजधानी बनाया और वहाँ से प्रशासन तथा पुनर्निर्माण का कार्य किया। राजस्थान सरकार से संबंधित विवरण के अनुसार उन्होंने 1585 में चावंड को नई राजधानी के रूप में स्थापित किया और वहीं 1597 में उनका निधन हुआ।

उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल जीते गए भूभाग नहीं थे। उनकी सबसे बड़ी विजय यह थी कि कठिनतम परिस्थितियों में भी उनका संकल्प पराजित नहीं हुआ।

उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दिया—

संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन साहस कम नहीं होना चाहिए।
परिस्थितियाँ कठिन हो सकती हैं, लेकिन स्वाभिमान का मूल्य कम नहीं हो सकता।


गीत “मेवाड़ की लाज बचा जावाँ” के बारे में

“मेवाड़ की लाज बचा जावाँ” महाराणा प्रताप, चेतक, मेवाड़ के रणबांकुरों और हल्दीघाटी की पवित्र भूमि को समर्पित एक ओजपूर्ण वीर-रस गीत है।

गीत में सैनिकों की प्रतिज्ञा, केसरिया ध्वज का गौरव, रणभेरी की गूँज, भीलों की धनुर्विद्या, चेतक की गति और महाराणा प्रताप का अडिग स्वाभिमान एक संगीतमय कथा के रूप में सामने आता है।

इस गीत का केंद्रीय भाव है—

व्यक्ति का जीवन सीमित हो सकता है, लेकिन मातृभूमि के लिए दिया गया बलिदान अमर हो जाता है।

ऐतिहासिक टिप्पणी

यह गीत एक काव्यात्मक और वीर-रस प्रधान रचना है। युद्ध से संबंधित कुछ दृश्य, संवाद और संख्याएँ इतिहास, लोकगाथाओं तथा रचनात्मक कल्पना का संयोजन हैं। इन्हें शाब्दिक ऐतिहासिक विवरण के बजाय मेवाड़ की वीरता की कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा और सुना जाना चाहिए।


मेवाड़ की लाज बचा जावाँ — संपूर्ण गीत

[आलाप / Intro]

जय एकलिंग… जय मेवाड़…
ओ ओ ओ ओ…


[मुखड़ा / Hook]

ये धरती माँ पुकारे रे,
मेवाड़ की धरती को नाज़ है।
राणा के संग चलना है,
अब जीवन क्या, क्या ताज है।

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
माटी में आज समा जावाँ।
इतनी सी अरदास हमारी,
राणा के काम आ जावाँ।

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
केसरिया बन लहरावाँ।
इतनी सी अरदास हमारी,
मेवाड़ की लाज बचा जावाँ।


[अंतरा 1]

जब सुनते राणा अत्याचार,
खड्ग स्वयं ललकार उठी।
मुगलों की हर काली करनी,
ज्वाला बन धधकार उठी।

“कितने सर हैं?” राणा बोले,
“कितनी धरा रंगानी है?”
सैनिक बोले, “आज्ञा दे दो,
रण में जान लुटानी है।”

वचन सुनाकर एकलिंग का,
सबने शीश झुकाया था।
या तो जीत के लौटेंगे,
या माटी में मिल जाना था।


[कोरस]

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
माटी में आज समा जावाँ।
राणा के चरणों में हँसकर,
जीवन अपना चढ़ा जावाँ।


[ब्रिज]

ओ हो…
जय जय एकलिंग…

ओ हो…
जय जय मेवाड़…


[अंतरा 2]

मान चला अभिमान लिए,
अकबर का आदेश था।
राणा ने सिंहनाद किया,
वीरोचित गणवेश था।

“जिसने बेची अपनी आत्मा,
वो सम्मान क्या माँगेगा?
मेवाड़ी सिर कट सकता है,
पर झुकना कब जानेगा?”

तिलमिल कर दरबार गया वो,
लेकर मन में आग बड़ी।
फिर हल्दीघाटी की धरती पर,
काल बनी थी रणघड़ी।


[कोरस – बड़ा]

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
केसरिया बन लहरावाँ।
दस-दस शत्रु काट गिरावाँ,
राणा का मान बढ़ा जावाँ।


[अंतरा 3 – युद्ध]

रणभेरी जब गूँजी रण में,
अम्बर तक कम्पन छाया।
दस हज़ारों ने लाखों को,
सिंह-हुंकार सुनाया।

तीरों की वर्षा होती थी,
भीलों का अद्भुत निशाना।
कटकर गिरते थे शीश मगर,
धड़ लड़ता था मर्दाना।

तोपों ने जब आग उगली,
धरती रक्त नहाती थी।
माटी की लाज बचाने को,
वीरों की टुकड़ी जाती थी।

तोपों के मुख में कूद पड़े,
हँसते-हँसते बलिदानी।
ऐसे रणधीरों से रोशन,
मेवाड़ हुई अभिमानी।


[महा कोरस]

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
रक्त से इतिहास लिखा जावाँ।
राणा के संग जीना-मरना,
युग-युग तक मैं निभा जावाँ।

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
केसरिया बन लहरावाँ।
धरती माँ की आन बचाने,
अमर कहानी बन जावाँ।


[अंतरा 4 – चेतक]

चेतक चौकड़ियाँ भरता था,
बिजली सा लहराता था।
राणा की पुतली फिरने से पहले,
राह नई दिखलाता था।

दूर कहीं हाथी पर बैठा,
मान सिंह अभिमान लिए।
चेतक उड़ता पहुँचा वहाँ,
एकलिंग का वरदान लिए।

पलक झपकते हाथी ऊपर,
वीर प्रताप राणा धाए।
देख उन्हें रणभूमि में जैसे,
स्वयं महाकाल उतर आए।


[अंतिम कोरस]

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
माटी में फूल बना जावाँ।
राणा प्रताप के नाम का दीपक,
युग-युग तक मैं जला जावाँ।

मेवाड़ की लाज बचा जावाँ,
केसरिया बन लहरावाँ।
इतनी सी अरदास हमारी,
मेवाड़ की लाज बचा जावाँ…


[आउट्रो]

ओ ओ ओ…
जय एकलिंग…
जय मेवाड़…

ओ ओ ओ…
राणा… राणा…
महाराणा प्रताप…


महाराणा प्रताप की कहानी हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी कठिनाई नहीं आएगी। वह हमें सिखाती है कि कठिनाइयों के बीच भी अपने मूल्यों, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा कैसे की जाती है।

“मेवाड़ की लाज बचा जावाँ” उन्हीं मूल्यों को संगीत के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।

🚩 जय एकलिंग!
🚩 जय मेवाड़!
🚩 महाराणा प्रताप की जय!

गीत को सुनें, अपने मित्रों के साथ साझा करें और भारत की इस अमर वीरगाथा को जन-जन तक पहुँचाएँ।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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