मौत की पटरी पर विकास की रेल

मौत की पटरी पर विकास की रेल

वंदे भारत से आगे—हर यात्री की जान भी अनमोल है

डॉ. मुकेश असीमित

भारतीय रेल आज आधुनिकता की नई इबारत लिखने का दावा कर रही है। चमचमाते स्टेशन, वंदे भारत जैसी तेज रफ्तार ट्रेनें, आधुनिक कोच और विश्वस्तरीय सुविधाओं की घोषणाएँ हमें विकसित देशों से होड़ करने का सपना दिखाती हैं। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक स्याह सच भी है—हर वर्ष हजारों लोग ट्रेन से गिरने अथवा रेलवे ट्रैक पर ट्रेन की चपेट में आने के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।

NCRB के वर्ष 2023 के आँकड़ों के अनुसार देश में कुल 24,678 रेलवे दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें 21,803 लोगों की मृत्यु हुई। इनमें “ट्रेन से गिरने अथवा रेलवे ट्रैक पर ट्रेन की चपेट में आने” की संयुक्त श्रेणी में 18,480 घटनाएँ और 15,878 मौतें दर्ज हुईं। अर्थात इस श्रेणी में औसतन लगभग 44 लोगों की प्रतिदिन मृत्यु हुई।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन आँकड़ों में चलती ट्रेन से गिरने के साथ-साथ रेलवे ट्रैक पर ट्रेन की चपेट में आने की घटनाएँ भी सम्मिलित हैं। केवल चढ़ते या उतरते समय हुई दुर्घटनाओं का अलग राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह संख्या इतनी भयावह है कि इसे केवल यात्रियों की लापरवाही बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रेलवे के लिए ये महज आँकड़े हो सकते हैं, लेकिन उस परिवार से पूछिए जिसने अपना इकलौता कमाने वाला सदस्य खो दिया। उस मां से पूछिए जिसका बेटा शाम को घर लौटने वाला था, उस पत्नी से पूछिए जिसके बच्चों का भविष्य एक क्षण में उजड़ गया। प्रत्येक संख्या के पीछे एक व्यक्ति, एक परिवार और अधूरी रह गई पूरी जिंदगी छिपी है।

चेतावनी देकर क्या रेलवे की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?

रेलवे बार-बार घोषणा करता है—

“चलती ट्रेन में न चढ़ें और न उतरें।”
“पीली रेखा से पीछे खड़े रहें।”
“पायदान पर यात्रा न करें।”

निस्संदेह यात्रियों को नियमों का पालन करना चाहिए। चलती ट्रेन में चढ़ना या उतरना जानलेवा हो सकता है। लेकिन केवल चेतावनी प्रसारित कर देना क्या रेलवे को अपनी संस्थागत जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है?

देश में आज भी अनेक छोटे स्टेशन और प्लेटफॉर्म ऐसे हैं, जहां पीली सुरक्षा रेखा तो दूर, प्लेटफॉर्म की सतह तक सुरक्षित और समतल नहीं है। कहीं फर्श उखड़ा हुआ है, कहीं गड्ढे हैं, कहीं प्लेटफॉर्म पर काई और फिसलन है। बारिश में इनकी स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। कोटा स्टोन अथवा चिकनी टाइलों वाले प्लेटफॉर्म भीगने पर ऐसे फिसलन भरे हो जाते हैं कि थोड़ी-सी असावधानी जानलेवा साबित हो सकती है।

रेलवे ने देर से ही सही, अनेक प्लेटफॉर्मों की ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय लिया है, ताकि यात्री कोच की सीढ़ियों के बजाय लगभग सीधे प्लेटफॉर्म पर पैर रख सकें। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन छोटे स्टेशनों पर आज भी अनेक प्लेटफॉर्म इतने नीचे हैं कि बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग यात्रियों को चढ़ने-उतरने के लिए खड़ी सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ता है।

जब रेलगाड़ी का ठहराव केवल एक या दो मिनट का हो, भीड़ पीछे से धक्का दे रही हो और यात्री के हाथ में सामान भी हो, तब एक गलत कदम उसे कोच और प्लेटफॉर्म के बीच खींच सकता है।

एक छोटी-सी सुरक्षा प्लेट बचा सकती है अनेक जिंदगियां

रेलवे कोच के दरवाजे पर लगी सीढ़ियों के पीछे अथवा अंदर की ओर सुरक्षा-प्लेट या उपयुक्त अवरोध लगाया जा सकता है, जिससे पैर फिसलने पर वह सीढ़ियों के बीच या कोच के नीचे की ओर न जाए। सीढ़ियों पर बेहतर एंटी-स्किड सतह, चमकीली किनारी और मजबूत ग्रिप भी आवश्यक है।

बारिश में दरवाजे के पास लगी स्टील की रेलिंग भी फिसलन भरी हो जाती है। उस पर रबरयुक्त या टेक्सचर्ड ग्रिप क्यों नहीं लगाई जा सकती? यह कोई असंभव अथवा अत्यधिक महंगा तकनीकी सुधार नहीं है। यदि एक साधारण सुरक्षा-प्लेट, एंटी-स्किड सीढ़ी या बेहतर हैंडग्रिप किसी यात्री का पैर फंसने अथवा हाथ छूटने से बचा सकती है, तो इसे प्रत्येक कोच में अनिवार्य क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

दुर्घटना होने के बाद मुआवजा देना समाधान नहीं है। सच्ची सुरक्षा वह है जिसमें दुर्घटना होने से पहले उसके संभावित कारणों को पहचानकर दूर किया जाए।

क्या चलती ट्रेन के खुले दरवाजे स्वीकार्य हैं?

मेट्रो ट्रेन में दरवाजे स्वतः बंद होते हैं। जब तक दरवाजे सुरक्षित रूप से बंद नहीं हो जाते, ट्रेन आगे नहीं बढ़ती। फिर सामान्य रेलगाड़ियों में स्वचालित दरवाजे अनिवार्य क्यों नहीं किए जा सकते?

यह परिवर्तन एक दिन में संभव नहीं होगा, लेकिन इसकी समयबद्ध योजना तो बनाई जा सकती है। नए बनने वाले सभी कोचों में स्वचालित दरवाजे अनिवार्य किए जाएं और पुराने कोचों को चरणबद्ध तरीके से बदला अथवा उन्नत किया जाए। यदि ट्रेन चलते ही दरवाजे अपने आप बंद हो जाएं तो फुटबोर्ड यात्रा, दरवाजे पर खड़े रहने और चलती ट्रेन में चढ़ने-उतरने की अनेक घटनाएं स्वतः कम हो सकती हैं।

सवाल यह नहीं कि यात्री जोखिम क्यों उठाता है। बड़ा सवाल यह भी है कि व्यवस्था ने जोखिम उठाने की गुंजाइश ही क्यों छोड़ी हुई है।

छोटे स्टेशन के यात्री की मजबूरी कौन समझेगा?

महानगर में रहने वाला व्यक्ति आसानी से कह सकता है—“उसे चलती ट्रेन में नहीं चढ़ना चाहिए था, अगली ट्रेन पकड़ लेता।”

लेकिन किसी छोटे स्टेशन पर खड़े दैनिक यात्री की परिस्थिति भी समझनी होगी। उसे समय पर नौकरी या मजदूरी पर पहुंचना है। वहां प्रत्येक ट्रेन नहीं रुकती। जिस स्थानीय ट्रेन को वह पकड़ना चाहता है, उसके छूट जाने पर अगली ट्रेन कई घंटे बाद या शाम को मिल सकती है। ट्रेन कुछ क्षण रुकती है, प्लेटफॉर्म नीचा है, भीड़ अधिक है और कोच के दरवाजे पर पहले से यात्री खड़े हैं। ऐसे में उसकी गलती के साथ-साथ व्यवस्था की कमी का मूल्यांकन भी जरूरी है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि चलती ट्रेन में चढ़ना उचित है। लेकिन सुरक्षा नीति केवल आदर्श यात्री को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती। उसे वास्तविक परिस्थितियों, मानवीय व्यवहार, भीड़, जल्दबाजी, सीमित ट्रेन सेवाओं और छोटे स्टेशनों की समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है।

क्या रेलवे को राजस्व केवल महानगरों और बड़े स्टेशनों से मिलता है? यदि नहीं, तो सुरक्षा और सुविधाओं का अधिकार भी केवल बड़े शहरों तक सीमित क्यों रहे?

बुनियादी सुधारों की तत्काल आवश्यकता

रेलवे को देशभर में यात्री-सुरक्षा का स्वतंत्र ऑडिट कराकर निम्न सुधार समयबद्ध तरीके से लागू करने चाहिए—

  1. सभी छोटे-बड़े स्टेशनों के प्लेटफॉर्म मानक ऊंचाई तक लाए जाएं।
  2. प्लेटफॉर्म की टूटी सतह, गड्ढों, काई और फिसलन की नियमित जांच हो।
  3. प्लेटफॉर्म किनारों पर स्पष्ट पीली रेखा और स्पर्शनीय सुरक्षा-पट्टी लगाई जाए।
  4. कोच की सीढ़ियों पर एंटी-स्किड सतह और अंदर की ओर सुरक्षा-प्लेट लगाई जाए।
  5. दरवाजे की रेलिंग पर मौसमरोधी, फिसलन-रहित ग्रिप उपलब्ध कराई जाए।
  6. नए कोचों में स्वचालित दरवाजे अनिवार्य किए जाएं और पुराने कोचों के लिए चरणबद्ध योजना बने।
  7. छोटे स्टेशनों पर पर्याप्त ठहराव और व्यावहारिक ट्रेन-आवृत्ति सुनिश्चित की जाए।
  8. भीड़ वाले समय पर RPF तथा प्लेटफॉर्म कर्मचारियों की पर्याप्त तैनाती हो।
  9. ट्रेन से गिरने और चढ़ते-उतरते समय होने वाली घटनाओं का अलग राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाए।
  10. प्रत्येक दुर्घटना के बाद यात्री को दोषी मानकर फाइल बंद करने के बजाय तकनीकी और व्यवस्थागत कारणों की जांच हो।

पहले सुरक्षित पहुंचाइए, फिर समय पर पहुंचाइए

भारतीय रेलवे की पहली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि यात्री जीवित और सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचे। इसके बाद यह जिम्मेदारी आती है कि वह सही समय पर पहुंचे। आज स्थिति यह है कि रेलवे की लेटलतीफी पर तो लगातार चर्चा होती है, लेकिन ऐसी टाली जा सकने वाली असमय मौतों पर उतनी गंभीरता से बात नहीं होती।

वंदे भारत ट्रेन चलाना प्रगति है। स्टेशनों का सौंदर्यीकरण भी प्रगति है। तेज रफ्तार, डिजिटल टिकट और आधुनिक प्रतीक्षालय भी विकास के संकेत हैं। लेकिन यदि छोटे स्टेशन का टूटा और फिसलन भरा प्लेटफॉर्म ठीक नहीं होता, यदि कोच के खुले दरवाजे से यात्री गिरता रहता है और यदि एक साधारण सुरक्षा-प्लेट के अभाव में किसी का पैर ट्रेन के नीचे चला जाता है, तो विकास के बड़े-बड़े दावे अधूरे और खोखले लगते हैं।

सच्चा विकास रेलगाड़ी की गति से नहीं, उसमें यात्रा करने वाले सबसे साधारण यात्री की सुरक्षा से मापा जाना चाहिए।

इस लेख को अधिक से अधिक साझा कीजिए। शायद इसकी आवाज उन नीति-निर्धारकों तक पहुंच सके जो विश्वस्तरीय रेलवे का दावा करते हैं। उनसे हमारा केवल इतना प्रश्न है—

क्या विश्वस्तरीय रेल वही है जो सबसे तेज दौड़े, या वह जो अपने प्रत्येक यात्री को सुरक्षित घर भी पहुंचाए?

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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