मैं भोले का दीवाना हूँ — जब शिव से प्रेम हो जाए तो दुनियादारी क्या?
“मैं भोले का दीवाना हूँ, मुझे जग से लेना क्या,
वो धड़कन में विराजे हैं, मुझे बाहर ढूँढ़ना क्या…”
शिव-भक्ति की सबसे सुंदर अनुभूति शायद वह है, जब भक्त और भगवान के बीच औपचारिकता समाप्त हो जाती है। तब शिव केवल मंदिर में स्थापित आराध्य नहीं रहते—वे मन के साथी, जीवन के सहारे और भीतर जागती चेतना बन जाते हैं।
इसी भाव से जन्मा है मेरा नया शिव-भक्ति गीत “मैं भोले का दीवाना हूँ”।
यह केवल भोलेनाथ की स्तुति का गीत नहीं, बल्कि उस अवस्था को शब्द देने का प्रयास है जहाँ मन संसार की भागदौड़ से कुछ देर मुक्त होकर कह उठता है—
“जहाँ शिव नाम की मस्ती हो, वहाँ होश में रहना क्या…”
शिव का ‘मस्ताना’ होने का अर्थ
यहाँ मस्ती का अर्थ संसार से भाग जाना नहीं है। यह उस आंतरिक निश्चिंतता का प्रतीक है जो विश्वास और समर्पण से आती है।
भगवान शिव का स्वरूप स्वयं हमें यही विरोधाभास सिखाता है। वे कैलाश की निस्तब्धता में समाधिस्थ योगी हैं, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर तांडव करने वाले महादेव भी। उनके मस्तक पर चंद्रमा की शीतलता है और कंठ में संसार का विष।
शायद इसीलिए शिव भक्त के लिए केवल पूजनीय देवता नहीं, बल्कि जीवन को समझने का एक दर्शन भी हैं।
“मुझे जग से लेना क्या…”
इस पंक्ति का भाव संसार को छोड़ देने का संदेश नहीं देता।
मनुष्य परिवार में रहे, अपने दायित्व निभाए, काम करे, सफलता के लिए प्रयास करे—लेकिन इन सबके बीच स्वयं को इतना न खो दे कि उसकी शांति ही संसार पर निर्भर हो जाए।
इसी भावना को गीत की ये पंक्तियाँ आगे बढ़ाती हैं—
“कोई दौलत के पीछे है, कोई शोहरत सँभाले है,
मेरे हिस्से में भोले हैं, मुझे सिक्के गिनना क्या।”
धन और उपलब्धियाँ जीवन का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन वे जीवन का अंतिम अर्थ नहीं हैं।
शिव बाहर भी हैं और भीतर भी
हम अक्सर ईश्वर को खोजने के लिए तीर्थों, मंदिरों और पवित्र स्थानों की ओर जाते हैं। ये स्थान हमारी श्रद्धा को केंद्रित करते हैं, लेकिन भक्ति की यात्रा अंततः मनुष्य को अपने भीतर भी ले जाती है।
इसीलिए गीत कहता है—
“न मंदिर में ही सीमित हैं, न पर्वत पर अकेले हैं,
वो कण-कण में समाए हैं, उन्हें आवाज़ देना क्या।”
जब मन में करुणा है, सत्य है, प्रेम है और किसी पीड़ित के लिए संवेदना है—वहीं शिवत्व की अनुभूति भी हो सकती है।
महादेव और अहंकार का विसर्जन
शिव का एक नाम महाकाल है।
समय के सामने पद, प्रतिष्ठा, धन और अहंकार—सब क्षणिक हैं। आज जिस उपलब्धि पर मनुष्य गर्व करता है, समय के विशाल प्रवाह में वह भी एक दिन स्मृति बन जाती है।
गीत की पंक्तियाँ इसी सत्य की ओर संकेत करती हैं—
“तू ऊँचे नाम पर इतराए, ये पद दो दिन का मेला है,
महाकाल के दरबार में, बड़ा क्या और छोटा क्या।”
शिव-भक्ति शायद यही याद दिलाती है कि ऊँचा उठना गलत नहीं, लेकिन ऊँचा उठकर दूसरों को छोटा समझना मनुष्य को अपने भीतर से छोटा कर देता है।
विष पीकर भी शांत रहने वाले शिव
समुद्र-मंथन की कथा में निकले हलाहल विष को शिव ने अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए।
यह प्रसंग भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अत्यंत गहरा प्रतीक बन गया है।
जीवन में भी कटु अनुभव आते हैं। अपमान, असफलता, बिछोह और निराशा मिलती है। हर विष को संसार में वापस उगल देना आवश्यक नहीं।
कुछ अनुभवों को ज्ञान में बदल देना भी जीवन की साधना है।
इसी भाव को गीत में कहा गया है—
“जटा में गंग बहती है, गले में नाग सजता है,
जो विष को भी पचा जाए, उसे संकट से डरना क्या।”
प्रेम की राह पर ‘मैं’ हल्का होने लगता है
भक्ति में सबसे कठिन त्याग शायद वस्तुओं का नहीं, बल्कि ‘मैं’ का है।
मेरी प्रतिष्ठा, मेरी उपलब्धि, मेरी बात, मेरा अहंकार—इन सबका भार जितना बढ़ता जाता है, मन उतना ही बेचैन होता जाता है।
इसलिए गीत का सूफ़ियाना भाव कहता है—
“जब ‘मैं’ मिटकर ‘शिव’ हो जाए,
फिर अपना और पराया क्या।”
यही वह बिंदु है जहाँ शिव-भक्ति और निर्गुण चिंतन एक-दूसरे के बहुत निकट दिखाई देते हैं—बाहर की यात्रा धीरे-धीरे भीतर की यात्रा बन जाती है।
🎵 सुनिए — “मैं भोले का दीवाना हूँ”
इन्हीं भावों को शब्द और संगीत में पिरोने का एक छोटा-सा प्रयास है मेरा नया शिव भजन—
मैं भोले का दीवाना हूँ
🎧 पूरा गीत YouTube पर सुनें:
इसे केवल एक भजन की तरह न सुनें। कुछ क्षण आँखें बंद करके शब्दों को महसूस करें।
हो सकता है गीत की कोई एक पंक्ति आपके अपने जीवन के किसी अनुभव से जुड़ जाए।
भक्ति, निर्गुण और भावपूर्ण संगीत की यात्रा
यदि आपको ऐसे शिव भजन, भक्ति गीत, कबीर-निर्गुण भजन, सूफ़ियाना रचनाएँ और प्रेरणादायक गीत पसंद हैं, तो मेरे YouTube चैनल Dr Mukesh Aseemit Creations | Music with Mukesh से जुड़ सकते हैं।
YouTube Channel:
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मेरे लिए संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शब्दों के भीतर छिपे भाव को सुरों के माध्यम से दूसरे हृदय तक पहुँचाने की कोशिश है।
और जाते-जाते बस इतना—
मैं भोले का दीवाना हूँ, मुझे जग से लेना क्या,
हर इक साँस में शंकर हैं, मुझे दुनियादारी क्या…
हर हर महादेव! 🔱🙏
— डॉ. मुकेश असीमित
Music with Mukesh
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