# मेरी OPD का शीशा
मेरी OPD के दरवाज़े में एक शीशा लगा दिया गया था। जब लगाया गया था, तब कोई बहुत गहरी सोच-विचार नहीं हुई थी। बस किसी दूसरे अस्पताल में ऐसा शीशा लगा देखा और हमने भी उसकी नकल कर ली।
शीशा लगाने वाले ने बड़े गर्व से उसकी खासियत बताई,
“साहब, यह नया शीशा आया है बाज़ार में। इसे लगाइएगा तो बाहर से अंदर कुछ दिखाई नहीं देगा, लेकिन अंदर से बाहर सब कुछ साफ दिखाई देगा।”
वैसे ऐसा शीशा पहले गाड़ियों में भी खूब चला था, लेकिन बाद में गैंगस्टरों ने बेचारे शीशे को बदनाम कर दिया। पुलिस वालों को अपराधियों की धरपकड़ करनी हो, नेताओं की खरीद-फरोख्त का मामला हो, अपहरण की कोई गुत्थी उलझी हो, अपनी नाकामी का ठीकरा अक्सर इन्हीं शीशों पर फोड़ दिया जाता था। आखिरकार कई जगह इन्हें प्रतिबंधित करना पड़ा।
अच्छी बात यह है कि OPD में अभी तक इस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा है।
डॉक्टर वैसे जनता की नज़र में लुटेरे माने जाते हैं, लेकिन शायद पुलिस विभाग की नज़र में अभी हम इतने खतरनाक नहीं हुए हैं कि हमारी OPD के शीशे भी उतरवा दिए जाएँ।
वैसे इस शीशे का एक लाभ बड़ा व्यावहारिक है।
मान लीजिए, मैं अंदर OPD में बैठा हूँ और उस समय मेरे सामने कोई मरीज नहीं है। बाहर बैठे मरीज को इस शीशे के कारण अंदर कुछ दिखाई नहीं देता। इसलिए वह कम-से-कम इस विश्वास के साथ इंतज़ार करता रहता है कि डॉक्टर साहब अंदर किसी न किसी मरीज का भला तो कर ही रहे होंगे।
अब बीच में डॉक्टर दो मिनट के लिए नींद की झपकी ले ले, कोई जरूरी फोन उठा ले, कुर्सी पीछे करके कमर सीधी कर ले या पीछे वाले दरवाज़े से लघुशंका के लिए निकल जाए, बाहर बैठे आदमी के विश्वास पर कोई असर नहीं पड़ता।
उसे यही लगता है,
“अंदर डॉक्टर साहब बड़ी गंभीर चिकित्सा में लगे हुए हैं।”
लगभग बीस साल हो गए इस OPD में इस शीशे के साथ मेरा आमना-सामना होते हुए।
पहले मुझे लगता था कि यह शीशा केवल मेरी privacy के लिए लगाया गया है। धीरे-धीरे समझ आया कि यह तो मानव व्यवहार पर शोध करने के लिए ईश्वर द्वारा दिया गया कोई मुफ्त का CCTV है।
आपको psychology पढ़नी हो, body language समझनी हो, रिश्तों की असलियत जाननी हो, सामाजिक पद-प्रतिष्ठा का असर देखना हो या यह समझना हो कि आदमी डॉक्टर के कमरे में प्रवेश करने से ठीक तीन सेकंड पहले कैसे अपना पूरा व्यक्तित्व बदल लेता है, तो किसी विश्वविद्यालय में admission लेने की जरूरत नहीं।
बस मेरी कुर्सी पर आधा घंटा बैठ जाइए।
शीशे के उस पार पूरा शोध-संसार उपलब्ध है।
एक सज्जन आते हैं।
दरवाज़ा खटखटाने से पहले शीशे में अपनी टाई सीधी करते हैं। बालों पर हाथ फेरते हैं। शर्ट खींचकर ठीक करते हैं। पेट थोड़ा भीतर लेते हैं और पीछे खड़े अपने साथी से पूछते हैं,
“ठीक लग रहा हूँ न?”
साथी भी अनुभवी है। वह अंतिम briefing देता है,
“हाँ, ठीक है। बस अंदर जाते ही पहले मौसम की बात करना। कहना, सर, आज तो बड़ी उमस है।”
मुझे अंदर थोड़ा-बहुत सुनाई भी दे रहा है और दिखाई तो पूरा दे ही रहा है।
असल में ये मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव हैं।
रिसेप्शन पर काफी देर से गुहार लगा रहे हैं,
“बस दो मिनट के लिए डॉक्टर साहब से मिलना है।”
रिसेप्शन वाला कहता है,
“ठीक है, ये मरीज अंदर चला जाए, उसके बाद चले जाना।”
लेकिन उन्हें रिसेप्शन वाले की बात पर पूरा भरोसा नहीं है।
अब वे शीशे के बिल्कुल पास आकर एक हाथ माथे के ऊपर छज्जे की तरह लगाते हैं, आँखें सिकोड़ते हैं और भीतर झाँकने की कोशिश करते हैं कि मैं सचमुच मरीज देख रहा हूँ या रिसेप्शन वाला उन्हें बेवकूफ बना रहा है।
बेचारे को पता नहीं कि बाहर से उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा, मगर अंदर से मैं उसकी आँखों की पुतलियों तक देख रहा हूँ।
कभी-कभी वह अपना चेहरा शीशे से इतना पास ले आता है कि मुझे लगता है अभी नाक का निशान भी शीशे पर छोड़ जाएगा।
यह शीशा कई बार दर्पण का काम भी करने लगता है।
और इसका सबसे अधिक लाभ महिलाएँ उठाती हैं।
Waiting time बिताने का इससे सस्ता और प्रभावी साधन शायद अभी तक किसी mobile app ने नहीं बनाया।
कोई शीशे में देखकर अपनी बिंदी सीधी कर रही है।
कोई बालों की लट कान के पीछे कर रही है।
कोई साड़ी का पल्लू ठीक कर रही है।
कोई अपनी चोटी को पीछे घुमाकर देख रही है कि आखिर वह सीधी हुई या अभी भी कुत्ते की पूँछ की तरह टेढ़ी होने पर ही अड़ी हुई है।
किसी के हाथ में रिपोर्ट है, मगर नजर रिपोर्ट पर कम और अपने reflection पर ज्यादा है।
बीमारी इंतज़ार कर सकती है, बिंदी का सेंटर में होना जरूरी है।
कई बार मुझे लगता है कि मेरी OPD के बाहर शीशा नहीं, किसी beauty parlour का trial mirror लगा हुआ है।
एक बार तो एक महिला काफी देर तक खुद को शीशे में निहारती रही।
पहले बाल ठीक किए।
फिर बिंदी सीधी की।
फिर चेहरे को दाईं तरफ से देखा।
फिर बाईं तरफ से।
फिर एक बार पीछे हटकर पूरा चेहरा देखा।
फिर थोड़ा पास आईं।
मैं अंदर बैठा सोचता रहा,
शायद इनको बीमारी इतनी गंभीर नहीं है। शायद डॉक्टर के साथ कोई selfie खिंचवानी होगी और उसकी तैयारी अभी से चल रही है।
और फिर आती है, टीना।
टीना को आप जानते ही हैं।
हमारे यहाँ काम करने वाली बाई।
उसके लिए यह शीशा किसी काँच का दरवाज़ा नहीं बल्कि एक विशाल whiteboard है, जिस पर उसे रोज अपनी कला का प्रदर्शन करना होता है।
जब से मैंने उसे मेरी टेबल पर गीला पोछा मारने से मना किया है, उसने शायद यह तय कर लिया है कि गीले पोछे के लोकतांत्रिक अधिकार का कहीं न कहीं प्रयोग तो होना ही चाहिए।
और अब उसके इस मौलिक अधिकार का सबसे बड़ा क्षेत्र है, मेरी OPD का शीशा।
वह बड़े इत्मीनान से पोछा फेरती है।
पहले ऊपर से नीचे।
फिर नीचे से ऊपर।
फिर दाईं ओर गोलाई।
फिर बाईं ओर अर्धवृत्त।
फिर कुछ लहरदार रेखाएँ।
फिर अचानक बीच में एक लंबा स्ट्रोक।
ऐसी ज्यामिति बनती है जैसे किसी नदी के नक्शे में अचानक कई सहायक नदियाँ निकल आई हों।
कहीं चंबल बह रही है।
कहीं बनास उससे मिल रही है।
कहीं कोई अनाम बरसाती नाला अचानक पैदा हो गया है।
और पोछा लगाने के बाद भी कार्य पूरा नहीं होता।
अंत में टीना अपने हस्तचिह्न अवश्य छोड़ती है।
चार उँगलियाँ यहाँ।
एक हथेली वहाँ।
कहीं अंगूठे का निशान।
कहीं पोछे की गोल घूमती हुई लकीरें।
कभी-कभी शीशे पर इतने निशान रह जाते हैं कि लगता है पाँच हजार साल बाद पुरातत्व विभाग यहाँ खुदाई करवाकर घोषणा करेगा,
“इस स्थान पर कभी एक विकसित ‘टीना सभ्यता’ हुआ करती थी। इसके लोग काँच पर अर्धवृत्त, हथेलियों और गीले पोछे के माध्यम से अपनी भावनाएँ व्यक्त करते थे।”
बेचारी टीना को मालूम ही नहीं कि जिस शीशे को वह पूरी निष्ठा, समर्पण और कलात्मक स्वतंत्रता से मल रही है, उसके दूसरी ओर मैं कुर्सी पर बैठा उसकी पूरी कला-प्रक्रिया लाइव देख रहा हूँ।
कभी-कभी तो वह इतना मन लगाकर शीशा साफ करती है कि मुझे डर लगने लगता है, कहीं एक दिन साफ करते-करते शीशा ही साफ न हो जाए और वह सीधे OPD में आ टपके।
अब बात उन खास मरीजों की, जो मेरे तथाकथित “साले” हैं।
मैं “जगत जीजा” हूँ, कम-से-कम OPD में बैठने पर यह पदवी मुझे अक्सर मिल ही जाती है। इसका एक कारण शायद यह भी है कि मेरा ससुराल इसी शहर में है, इसलिए इस रिश्ते की वैधता से मैं पूरी तरह इनकार भी नहीं कर सकता।
ऐसे कई मरीज हैं जो मुझे डॉक्टर कम और अपना “जीजा” ज्यादा मानते हैं। हमारे यहाँ रिश्तेदारी बनाना बड़ी उपयोगी सामाजिक तकनीक है।
रिसेप्शन पर आते ही घोषणा करेंगे,
“डॉक्टर साहब से कह देना, उनका साला आया है।”
रिसेप्शन वाला भी अब अनुभवी हो चुका है। वह कहता है,
“ठीक है, जीजाजी को दिखा तो लेना, लेकिन एक बार ऊपर अपनी बहन से भी मिल लेना।”
दरअसल यह व्यवस्था मैंने ही कर रखी है कि कोई “साला” आए तो उसे उसकी बहन, यानी श्रीमतीजी, से मिले बिना नहीं जाने देना।
अब क्या है, मैं तो उससे फीस ले नहीं सकता। कम-से-कम अपनी बहन को कुछ देकर जाएगा, भाई होने का फर्ज तो कहीं अदा करेगा!
ऐसे सालेनुमा सज्जन इधर-उधर नजर दौड़ाते रहते हैं कि डॉक्टर साहब खुद बाहर आएँ, उन्हें सम्मानपूर्वक साथ लेकर अंदर जाएँ और बाकी जनता समझे,
“ओहो! बड़े खास आदमी हैं।”
मैं अंदर शीशे के पीछे बैठा उन्हें काफी देर तक देखता रहता हूँ।
जानबूझकर बाहर नहीं निकलता।
इस अवैध रिश्ते को दुनिया से छिपाना भी तो मेरी जिम्मेदारी है।
वैसे यह रिश्ता बनाने की उनकी भी मजबूरी है।
जब जरूरत पड़ने पर आदमी गधे को बाप बना सकता है, तो दो सौ रुपये बचाने के लिए डॉक्टर को जीजा बनाने में क्या हर्ज है!
कुछ लोग OPD में आते ही अपनी बीमारी से ज्यादा अपनी पहचान का इलाज करवाना चाहते हैं।
एक मोबाइल लेकर घूम रहा है,
“चाचा विधायक जी का फोन बस आता ही होगा।”
वह हर तीस सेकंड में mobile screen देखता है।
कभी network देखता है।
कभी शीशे के आर-पार मुझे देखने की असफल कोशिश करता है।
एक साहब लाइन में पीछे खड़े हैं, मगर शरीर लगातार आगे की तरफ बढ़ रहा है।
उनका एक पैर तीसरे नंबर पर है, धड़ दूसरे नंबर पर और आत्मा पहले नंबर के मरीज के साथ chamber में प्रवेश कर चुकी है।
लाइन में आगे बढ़ने की यह भारतीय कला केवल OPD में नहीं, रेलवे प्लेटफॉर्म, शादी के buffet और लोकतंत्र, तीनों जगह समान रूप से विकसित है।
कुछ लोग X-ray ऐसे पकड़कर खड़े होते हैं जैसे Cannes Film Festival में award लेकर आए हों।
उसे उल्टा पकड़ा है या सीधा, इससे कोई फर्क नहीं।
ये X-ray विशेषज्ञ केवल अपना X-ray ही नहीं देखते, आसपास खड़े दूसरे मरीजों के X-ray का भी बाकायदा मुआयना करते नजर आते हैं।
चेहरे पर भाव,
“मामला गंभीर है।”
पास खड़ा attendant भी गर्दन हिलाकर ऐसा expression देता है जैसे X-ray देखकर उसने स्वयं diagnosis कर लिया हो।
दो मरीज आपस में रिपोर्टों की तुलना करते दिखाई देंगे।
“आपकी MRI हुई?”
“हाँ।”
“Contrast वाली?”
“हाँ।”
अब दूसरे का चेहरा उतर जाता है।
उसे बीमारी से ज्यादा दुख इस बात का है कि उसकी MRI में contrast नहीं लगा।
एक तीसरा तुरंत कहेगा,
“मैं तो जयपुर दिखाकर आया हूँ।”
दूसरा अपने आपको हीन समझने लगता है।
उसे लगता है कि उसकी बीमारी इतनी गंभीर क्यों नहीं हुई कि वह भी जयपुर दिखाकर आता और आज यहाँ अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर पाता।
फिर खुद को संभालते हुए कहेगा,
“दिखाना तो वहीं था। डॉक्टर साहब जानकार हैं… एक बार इनसे पूछ लेते हैं कि किसको दिखाना है।”
फिर कोई कहेगा,
“दिल्ली में भी दिखाया था।”
दूसरा मुंबई जोड़ देगा।
और इस सबका मूक गवाह है, मेरा शीशा।
उसके सामने आदमी वह होता है, जो वास्तव में है।
दरवाज़ा खुलते ही वह बदल जाता है।
बाहर जो आदमी लाइन तोड़ रहा था, अंदर आते ही कहता है,
“डॉक्टर साहब, लोग बड़े बदतमीज हैं। बताओ, धक्का-मुक्की कर रहे हैं!”
जो बाहर attendant पर चिल्ला रहा था, अंदर आवाज में शहद घोल लेता है,
“सर, आप तो भगवान का रूप हैं।”
जो अभी पाँच मिनट पहले विधायक चाचा को फोन लगा रहा था, मेरे सामने बैठते ही अत्यंत विनम्र होकर कहता है,
“सर, जैसे आप उचित समझें।”
और शायद जिंदगी भी ऐसी ही है।
हम सब किसी न किसी शीशे के सामने खड़े हैं।
कोई टाई ठीक कर रहा है।
कोई पल्लू।
कोई पहचान।
कोई रिश्तेदारी।
कोई अपनी social position।
कोई अपने अहंकार की बिंदी सीधी कर रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें लगता है,
अंदर कोई देख नहीं रहा।
और मैं अपनी कुर्सी पर बैठा सोचता हूँ,
“भाई साहब… शीशा सिर्फ आपकी शक्ल नहीं दिखा रहा, पूरा चरित्र telecast कर रहा है।”
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