रियल दोस्ती की बाट लगाती वर्चुअल दोस्ती और बढ़ता अकेलापन !
डॉ प्रेमचंद द्वितीय
पंडित शिवनारायण मानि॔ग वाॅक में रोज अकेले घूमते-घूमते जब उनके हाथ पैर फूल जाते तो बगीचे में नेताजी द्वारा उम्र दराज लोगों के लिए लगाई गई बैंच पर बैठ जाते, थोड़ी राहत की सांस लेते और खींसिए में रखे मोबाइल को बाहर निकलते और उसे अकेले ही बैठे-बैठे ओपन करते तो कोई दर्जन दो दर्जन से अधिक दोस्तों रिश्तेदारों ,मिलने वालो के जिन्हें किसी कार्यक्रम में आते हुए कभी नहीं देखा उनके मैसेजो से मोबाइल का सोशल मीडिया हाउसफुल था ।उन्होंने सोचा परिचितों, दोस्तों से सोशल मीडिया का तालाब इतना लबालब भरा है फिर भी मैं ,अकेला राम ,हूॅ ! लेकिन इस वर्चुअल दोस्ती ने रियल दोस्ती की बाट लगा दी है और मुझे जैसे अनेक उम्र दराजों के हकीकत की दोस्ती को अलमारी के दराजों में लाॅक कर दिया है ।
पंडित जी को अकेले बैठे देखकर यदा कदा मॉर्निंग वॉक करने वाले सुनील भैया ने उनके अकेलेपन में अपनापन बताते हुए पूछा पंडित जी रोज अकेले घूमते हो तो दो-चार यार दोस्त बना लेते, तो यह अकेलापन आपकी पेशानी पर पसीना नहीं लाता।उनके वास्तविक दोस्तों के अभाव को चुनौती देने वाली बात पर पंडित जी बोले क्या खास एक दो दोस्त बनाए , दज॔नों दोस्तों के मैसेज इस चलायमान डिब्बे में है मानो वे सब मेरे पास ही बैठे हुए हैं। वे बोले अरे एक दो चार यार साथ रख भी लो तो बातें मिनट में खत्म हो जाती है, लेकिन वाट्सपियों दोस्तों के मैसेज को पढ़ते पढ़ते घूमने का काम पूरा हो जाता है और पता ही नहीं चलता है ।पंडित जी द्वारा वास्तविक दोस्ती का दो टुक जवाब देने से सुनील भैया यह बडबडाते हुए रुखसत कर गए कि पंडित जी बड़े विद्वान बनते हैं लेकिन जिंदगी में एक भी दोस्त नहीं बना पाए ,अब अपनी ही रोज की हर छोटी बड़ी बात बताएं तो किसे बताएं और जब बातों को कोई सुनने वाला नहीं होता है तो वह हल्के नहीं होते हैं और जब घर जाते हैं तो बीवी बच्चों पर भारी पड़ते हैं।
जब पंडित जी मोबाइल के अनगिनत कांटेक्ट, फॉलोअर्स, व्हाट्सएप ग्रुप के मैसेज को पढ़ पढ़ कर आजीज हो गए तो धीरे-धीरे घर की और कदम बढा ही रहे थे कि अखिलेश जी मिल गए वे बोले पंडित जी आप कई लोगों से सोशल मीडिया से कनेक्ट हो लेकिन कनेक्ट होने के बावजूद भी हकीकत दोस्ती से डिस्कनेक्ट हो ।दोस्तों से कनेक्ट होने के लिए नगर के हजारीबाग के मंदिर में कुर्सियां लगी है । जिंदगी भर अकेले रहने के बाद जब रिटायर हुए तो अनेक इन कुसि॔यों पर बैठ बैठ कर दोस्त बनाने की जुगत में रहते हैं। जो रिटायर होने के पहले अपने पद अपनी कुर्सी और अपने वजूद में खोए रहे इन कुर्सियों पर घंटे बैठकर दोस्ती बना रहे हैं। इन कुर्सियों पर मदनलाल ,भरतलाल श्यामलाल ,रामलाल जी से अनेक लाल जिनके बाल पूरे सफेद हो गए हैं हर दिन छोटी बड़ी बात शेयर करके हल्के होकर घर पहुंचते हैं । वे बोले यारी दोस्ती के जंजाल से घिरे अनेक मांब लिंचिंग तो कोई दोस्तों के अभाव में अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं ।चाहे माॅब कनेक्शन हो या अकेलापन दोनों ही अपनापन के दुश्मन है ।
जब दोस्तों के अभाव और अकेलेपन की चर्चा चल रही थी तो नरेंद्र स्वामी जी आए और बोले हकीकत में असली दोस्त न होना भी फायदेमंद है पड़ोसी लक्ष्मण जी के परिवार में उनके कोई पुराने दोस्त मिलने आते तब वे मोबाइल के सोशल मीडिया के स्क्रीन में मशगुल रहते तो बच्चों से कहलवा देते कि बाबूजी तो घर में नहीं है । उनकी इस मशगुली में उन्हें फिजिकल दोस्त की जरूरत ही नहीं पड़ती है ।वे वर्चुअल दोस्त में व्यस्त और मस्त है और कहते हैं बाहर निकाल कर फालतू की भांजगढ़ कौन करें ! मोबाइल पर मौन सवाल जवाब से बड़ा कोई कहने वाला और बडा सुनने वाला नहीं है ।
इस दौरान हाल ही में रिटायर में लचकराम जी बोले अकेलापन ठीक नहीं है लेकिन आज के जमाने में भरोसेमंद दोस्त कहां मिलते हैं। मैं अफसर से रिटायर हुआ हूं ।कॉलोनी का कर्मचारी और चपरासी जिंहें मै ऑफिस में भटकने नहीं देता था ,वे घूमने में मिल जाते हैं तो वह जब लेफ्ट में घूमते हैं तो मुझे राईट में घूमना पड़ता है। वह चाहते हैं कि उन्हें घूमने वाला दोस्त बना ले । लेकिन यदि इनसे मुई इस की तरह दोस्ती बनाना है तो लेफ्ट राइट खत्म करना पड़ेगी। हकीकत में दोस्त बनना भी एक चुनौती है और उस दोस्ती को मेंटेन करना उससे भी बड़ी चुनौती है ।
दोस्ती और अकेलेपन की बात चली रही थी की प्रोफेसर कामेश्वर जी आए और बोले चेन्नई की डॉन बॉस्को इंस्टीट्यूशन ने एक सर्वे कराया था जिसमें बताया था की कई लोग दोस्तों से घिरे रहते हैं बावजूद इसके अकेलापन महसूस करते हैं, जब अकेला ही रहना है तो खाक दोस्ती क्या करेगी । यह कहकर पंडित जी तन्ना कर बोले दोस्तों के जंजाल से घिरने रहने से और उन रिश्तेदारों से दोस्ताना रिलेशन बनाना अकेलेपन से भी ज्यादा खतरनाक है। जिसमें वे अक्सर उनसे पैसों की मांग पूरी न करने और अन्य, इगो, को सेटिस्फेक्शन न करने पर मुॅह मोड़ लेते हैं ।जमाना आर्टिफिशियल हो गया है सैकड़ो दोस्तों से लबालब वर्चुअल फ्रेंड से दूर की राम-राम ,गुड मॉर्निंग ,गुड नाइट ही अच्छे दोस्त होने की मिसाल है। वे बोले लंबा स्क्रीन टाइम ,वर्चुअल रिलेशन, वर्क फ्रॉम होम, मोबाइल की व्यस्त दिनचर्या के बाद समय ही कहां मिलता है जो वास्तविक दोस्त बनाएं। मोबाइल की दोस्ती जितना आटि॔फिशियल अपनापन बढ़ाती है उतना ही अकेलापन घटाती है !
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