बीमार आदमी के समाचार लेने का विचार
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
किसी की तबीयत पूछने जाना बहुत ही बड़ा टास्क है जी! मतलब, बीमार का हाल जानने के लिए जाने की भी अपनी तैयारी है। उसे अपनी बीमारी का सामना करना है, मुझे उसकी बीमारी, अपने व्यवहार और वहाँ मौजूद रिश्तेदारों की निगाहों का। बुखार उसे आया है, लेकिन निकलने से पहले पत्नी मेरा माथा देखकर कहती है, “ऐसे क्यों दिख रहे हो, जैसे तुम्हें भर्ती कराने ले जा रहे हों?” लेकिन क्या करें! बीमार के समाचार लेने जाना, खासकर वह अगर आपके ससुराल पक्ष का हो, तो मजबूरी है।
मैं समझाता हूँ कि बीमार का हाल पूछने जा रहा हूँ। चेहरे पर कुछ चिंता होनी चाहिए। वह कहती है, “चिंता ठीक है, लेकिन तुम चेहरे पर जो भाव लाए हो, उनसे लग रहा है कि तीये की बैठक में जाने वाले हो।”
अब आप ही बताइए, आदमी कितना चिंतित दिखे? मुस्कुराते हुए पहुँचो तो लगता है बीमारी की खुशी मनाने आए हैं। गंभीर होकर पहुँचो तो मरीज अपने घरवालों की तरफ देखने लगता है कि मुझसे कोई रिपोर्ट छिपाई तो नहीं जा रही। इसलिए मैं निकलने से पहले आईने के सामने चेहरे का अभ्यास करता हूँ। एक ऐसा चेहरा चाहिए जिसमें स्नेह हो, चिंता हो, आश्वासन हो और मरीज की बाकी बची हिम्मत सुरक्षित रहे। इतने भाव तो मेरे चेहरे पर विवाह के फोटो खिंचवाते समय भी नहीं आए थे।
फिर पत्नी का सदाबहार सवाल है, “क्या लेकर जा रहे हो?”
मैं कहता हूँ, “अपनापन।”
वह थैला आगे कर देती है। सिर्फ अपनेपन से काम नहीं चलेगा। खाली हाथ जाएँगे वहाँ क्या?
फल लेने पहुँचता हूँ तो फलवाला पूछता है, “खाने के लिए या देखने जाने के लिए?”
मुझे अच्छा लगता है कि समाज में विशेषज्ञता बढ़ रही है। फलवाला भी जानता है कि फल पेट में जाने वाले, देव-मंदिर में चढ़ाने वाले और किसी के यहाँ बीमार के समाचार लेने जाने वाले—इन श्रेणियों में बँटे होते हैं। वह मेरा प्रयोजन जानकर उसी श्रेणी के फल निकालकर सामने रख रहा है। बिल्कुल चमकदार सेब हैं। “मौसमी फल हैं साहब!”
मैंने पूछा, “अंगूर नहीं हैं? अंगूर मीठे होते हैं। एक किलो में थैली अच्छी भर जाती है। सस्ते भी होते हैं, लेकिन वे हर मौसम में मिलते भी कहाँ हैं!” मैं पूछता हूँ, “मीठे हैं?”
कहता है, “दिखने में बहुत अच्छे हैं।”
मैं समझ जाता हूँ। मरीज को स्वस्थ होने तक इन्हें देखना है; खाने का निर्णय बाद में डॉक्टर करेगा।
फिर याद आता है कि उन्हें मधुमेह भी है। सेब उठाकर वापस रख देता हूँ। अनार लेता हूँ तो लगता है कौन छीलेगा। संतरे देखता हूँ तो सामने वाले की खाँसी याद आती है। केले उठाता हूँ तो किसी परिचित की सलाह कान में पड़ती है कि केले से यह होता है, उससे वह होता है। अंततः इतना सोचता हूँ कि फलवाले की दुकान पर खड़ा-खड़ा मुझे अपने लिए पानी मँगाना पड़ता है। वह पूछता है, “आपकी भी तबीयत ठीक नहीं है क्या?”
मैं कहता हूँ, “अभी तो ठीक थी। किसी की पूछने जा रहा हूँ।”
फल तय हो गए हैं। अब बस बातचीत का सामान जुटाना है मुझे। केवल “कैसे हैं?” कहकर बैठ जाना भी ठीक नहीं। आदमी इतनी दूर से आया है तो उसके पास कुछ होना चाहिए। कुछ कहानियाँ, जो मरीज में आशा जगाएँ, उसे अपनी-सी लगें। उसकी दुखती रग पर हाथ रखने के लिए जरूरी हैं। इसलिए मैं दो-तीन किस्से याद करता हूँ। ऐसे किस्से जिनसे मरीज को लगे कि बीमारी केवल उसी के हिस्से में नहीं आई है, दुनिया में और भी लोग इस गम को लिए बैठे हैं।
लेकिन मेरे किस्सों के साथ समस्या है। जो सबसे अच्छी तरह याद हैं, उनमें मरीज आखिर में बचता नहीं है। जो बच गए, उनकी कहानी इतनी छोटी है कि सुनाने लायक नहीं—बीमार हुए, इलाज लिया, ठीक हो गए। ज्यादा बिल भी नहीं आया कि बताने लायक हो। यार, बीमारी ऐसी तो हो जिसमें ठीक करवाने के लिए घर-बार तक बिक जाए!
एक बार मैंने बड़ी आत्मीयता से कहना शुरू किया, “हमारे एक परिचित को भी बिल्कुल यही परेशानी हुई थी…”
मरीज ने तकिए से सिर उठा लिया।
“फिर?”
मुझे अचानक कहानी का अंत याद आ गया। मैंने कहा, “फिर उन्होंने डॉक्टर बदल लिया।”
“उसके बाद?”
अब कहानी बदलने के लिए भी डॉक्टर चाहिए था। मैंने तुरंत साथ लाई ‘सब्जी’ का थैला खोल दिया—“यह देखिए, आपके लिए कितने अच्छे सेब लाया हूँ!” क्या करें! काश, ‘सब्जी ले जाने’ के रिवाज में हकीकत में सब्जी ही ले जाने का चलन होता। ये फालतू की औपचारिकताएँ क्यों? सब्जी के नाम पर सेब ले जा रहा हूँ। मरीज को हरी पत्तेदार सब्जियाँ खाने के लिए बताते हैं, तो पालक, धनिया, बथुआ ले जाना चाहिए था।
पत्नी ने लौटकर समझाया कि किसी का हाल पूछने जाओ तो अपने परिचितों का अंतिम हाल सुनाना जरूरी नहीं है। तब से मैं किस्सों के अंत पहले जाँचता हूँ।
वैसे मेरे डॉक्टर होने से भी यह देखने जाने वाला मामला और पेचीदा हो गया है। मैं सामाजिक भेंट के लिए जाता हूँ, लेकिन मेरा पेशा मुझसे पहले पहुँच जाता है। मैं अभी चप्पल उतार रहा होता हूँ कि कोई रिपोर्ट लेकर खड़ा हो जाता है। मैं मरीज से पूछता हूँ, “कैसा लग रहा है?” और पीछे से आवाज आती है, “डॉक्टर साहब, यह भी देख लीजिए।”
मेरे सामने मेरे पेशे की धज्जियाँ उड़ रही हैं। “डॉक्टर लोग लुटेरे होते हैं जी! ये अस्पताल…”
अरे, दूसरा रिश्तेदार पास में ही कह रहा है, “यहाँ मेरे भतीजे को लाए थे। भाई साहब, एक दिन का दस हजार का बिल! बड़ी लूट है यहाँ। अरे, हमसे पूछा होता!”
मरीज मेरी तरफ देख रहा है—इन्होंने ही सुझाया था। वह रिश्तेदार मेरी तरफ देख रहा है। उसे विश्वास है कि डॉक्टरों की मिलीभगत है। जरूर मेरा कमीशन बँधा होगा। एक परिजन ड्रिप की गति कम-ज्यादा कर रहा है। शायद नर्स जो प्रति मिनट बूँदों की संख्या बताकर गई है, उसे एकदम सटीक बैठाने की जुस्तजू में है। एक रिपोर्ट को उलट-पलट रहा है और उसकी मोहनजोदड़ो जैसी लिपि को पढ़ना चाह रहा है। तीसरा बता रहा है कि उसके पड़ोसी ने यही बीमारी बिना दवा ठीक कर ली थी।
इस भीड़ में मेरा असली उद्देश्य कहीं बैठने की जगह खोज रहा होता है। मैं रिश्तेदार का हाथ पकड़कर दो मिनट बात करना चाहता हूँ, लेकिन पहले मुझे उस आदमी की चिकित्सा पद्धति पर प्रतिक्रिया देनी पड़ती है जिसने सुबह इंटरनेट पर पूरा रोग पढ़ लिया है और अब केवल डिग्री की औपचारिकता बाकी है।
सबसे कठिन प्रश्न है—“आप बताइए, चिंता की कोई बात तो नहीं?”
मैं कहूँ “नहीं” तो अगले छह महीनों तक हर नई तकलीफ मेरे खाते में आएगी। कहूँ “देखना पड़ेगा” तो घरवाले एक-दूसरे को देखने लगेंगे। इसलिए मैं बड़ी सावधानी से कहता हूँ, “इलाज चल रहा है, डॉक्टर की सलाह मानिए।” शायद मुझसे वह शपथपत्र भरवा रहा है। आगे कुछ भी वादे के मुताबिक नहीं हुआ तो वही शपथपत्र मेरे खिलाफ अदालत में पेश करेगा।
वे कुछ निराश होते हैं। इतनी तैयारी से आए डॉक्टर ने वही बात कह दी जो पर्चे के नीचे पहले से छपी थी।
मरीज की खुद की अपनी समस्या है। जैसे परीक्षा के दौरान रटे गए पाठ्यक्रम का दोहराव कर रहा हो। सुबह से जो भी आया, उसे बीमारी के आरंभ से अभी तक का हाल बताना पड़ा। शाम तक उसका गला बैठ गया है, लेकिन आगंतुकों की उत्सुकता स्वस्थ रहती है। मैं भी पहुँचकर पूछता हूँ, “शुरू कैसे हुआ?” मुझे लगता नहीं कि इसके अलावा कुछ और कहकर मौन नीरवता को तोड़ा जा सकता था।
वह पत्नी की तरफ देखता है। पत्नी बेटे की तरफ देखती है। बेटा रिपोर्ट की तरफ देखता है। मुझे लगता है संवाद की पटकथा को परिवार में बाँट दिया गया है। शुरुआत पत्नी बताएगी, जाँच बेटा समझाएगा, खर्च बड़े भाई के पास है और दर्द अभी भी मरीज को स्वयं सँभालना है।
मैं उसे आराम करने की सलाह देता हूँ। फिर आराम के महत्त्व पर विस्तार से बोलने लगता हूँ। वह बीच-बीच में आँखें बंद करता है तो मैं पूछता हूँ, “सुन रहे हैं न?” ऐसा कहकर उसके आराम में खलल देने लगता हूँ।
इसी बीच चाय आ जाती है। मैं मना करता हूँ—“अरे, इसकी क्या जरूरत थी!”
“अरे, लीजिए भाई साहब! अब ये घर नहीं है तो क्या चाय-पानी की भी नहीं पूछेंगे?”
चाय के साथ बिस्कुट आते हैं तो मैं सोचता हूँ, केवल एक लूँगा। बातचीत में तीसरा उठा लेता हूँ। फिर मरीज से कहता हूँ, “खान-पान का ध्यान रखिए।”
उसकी आँखें मेरे हाथ की तरफ चली जाती हैं। मैं बिस्कुट नीचे रख देता हूँ। स्वास्थ्य संबंधी सलाह खाली हाथ ज्यादा प्रभावशाली लगती है।
कहना कुछ चाहता हूँ, लेकिन क्या कहूँ मैं! मौन नीरवता फिर पूरे वातावरण को अपने आगोश में ले लेती है। दुख अपना काम करता रहता है और भाषा पुराने रास्तों पर निकल जाती है।
मैं कह बैठता हूँ, “अच्छा, फिर मिलेंगे।”
कहने के बाद इतना असहज हुआ कि तुरंत जोड़ दिया, “मतलब… घर पर। भगवान करे आपको आज ही छुट्टी मिल जाए।”
अब मैं वहाँ जाने से पहले विदाई के शब्द भी तैयार करता हूँ। संवेदना व्यक्त करनी है, उपस्थिति दर्ज करानी है, लेकिन ऐसा भी नहीं लगना चाहिए कि मैं पूरा संवाद याद करके आया हूँ। हालाँकि आया मैं वही होता हूँ।
कल फिर एक मित्र का हाल पूछने जाना है। इस बार तय किया है कि कम बोलूँगा, ध्यान से सुनूँगा और जल्दी उठ आऊँगा। पत्नी ने पूछा, “इस बार तैयारी हो गई?”
मैंने कहा, “पूरी। कौन-कौन से किस्से नहीं सुनाने हैं, उनकी सूची बना ली है।”
वह बोली, “तब तो जाकर चुपचाप बैठ जाना।”
मैंने सूची दोबारा देखी। चुप रहने का निर्णय अच्छा है, लेकिन इतने अच्छे किस्से छोड़ने के लिए भी आदमी को काफी स्वस्थ होना चाहिए।
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