हाँ, मैं जलकुकड़ा हूँ!
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
हाँ, मैं जलकुकड़ा हूँ! आप मुझे जलनखोर कह सकते हैं। इसमें छिपाने जैसी कौन-सी बात है? जलना मेरी जन्मजात प्रतिभा है। जलने के लिए जिगरा चाहिए, जो मेरे पास है। मैं जलता हूँ। जलना मेरी मजबूरी है। मुझे जब से पता लगा कि साहित्यकारों में श्रेष्ठता हासिल करने के लिए यह गुण होना आवश्यक है, तब से मैंने इसे अपनी साहित्य-साधना का अनिवार्य अंग बना लिया है।
लोग कहते हैं, जलने से क्या मिलेगा?
यार, आपसे कौन कह रहा है कि आप अपनी बीड़ी मेरे जलते जिगर से सुलगाइए! हम खुद ही अपनी बीड़ी जला लेंगे। ताप लेंगे। दूसरों की तरक्की देखकर जो कंपकंपी छूटने लगती है, उसे भगाने का यही एक तरीका है हमारे पास। खुद ही जलते हैं, अपनी ही आग में तपते हैं।
मैं कहता हूँ, हर काम कुछ पाने के लिए थोड़े ही किया जाता है! कुछ काम आत्मसंतुष्टि के लिए भी किए जाते हैं। जलना मेरा मौलिक अधिकार है। मेरा दिल है, मेरा जिगर है, मेरी आग है। जलाऊँगा! किसी के बाप का थोड़े ही जला रहा हूँ!
साहित्य में शायद इसी जलन से हम भी ‘हॉट साहित्यकार’ की श्रेणी में आ जाएँ। कुछ अपनी खिचड़ी भी इसी आग में पक जाए।
मुझे सबसे अधिक जलन इस बात की है कि मेरी जलन की लपटें अड़ोसी-पड़ोसी तक पहुँच ही नहीं रहीं। जिनके लिए मैं दिन-रात जल रहा हूँ, वे आराम से सो रहे हैं। मैंने कितनी बार चाहा कि मेरी छाती में उठता धुआँ उनके ड्राइंगरूम में घुसे। कम-से-कम खाँसकर इतना तो पूछें कि भाई साहब, आपको हमसे क्या परेशानी है? मगर नहीं! वे अपनी तरक्की में व्यस्त हैं और मैं अपनी तबाही में।
दुनिया बड़ी निष्ठुर हो गई है। हम जलेंगे, इतना जलेंगे कि लोग ननद-भौजाई, सास-बहू और अड़ोसी-पड़ोसी की जलन को भूल जाएँगे। साहित्य जगत में जलन के नए आयाम स्थापित करेंगे। साहित्य को जलाकर राख न कर दें, तब तक जलेंगे। साहित्य में आलोचना गई आलू-चना बेचने! अब सही आलोचना वही है, जहाँ किसी और की रचना, पुरस्कार, सम्मान या पुस्तक-प्रकाशन पर आप अपने जिगरे को जला सकें।
जैसे-जैसे मैं वरिष्ठ होता जा रहा हूँ, यह जलन पूरी आग पकड़ने लगी है। पहले हल्का-सा धुआँ उठता था। हम सीने में उसे दबाकर रखते थे। लेकिन अब मुखर होकर उसे जलने देते हैं। औरों को भी तपने देते हैं। बिठा लेते हैं अपने जैसे दूसरे जलनखोरों को इस आग के आसपास। सब हाथ फैलाकर तापते भी हैं और आग में अपनी-अपनी तरफ से फूँक भी मारते रहते हैं।
सबसे बड़ा अन्याय यह है कि पुरस्कार समितियाँ मेरे जलने की तपस्या का कोई मूल्यांकन ही नहीं करतीं।
मैं वर्षों से जल रहा हूँ। कितने लेखकों को अपनी आँखों के सामने सम्मानित होते देखा है। कितनी पुस्तकों के प्रकाशन की खबरें सहन की हैं। कितने युवा रचनाकारों की प्रशंसा सुनकर अपना रक्तचाप बढ़ाया है। लेकिन किसी निर्णायक मंडल ने आज तक मुझसे नहीं पूछा कि साहित्य के विकास में आपकी जलन का कितना योगदान है?
आप मेरी जलन की लपटों को पहचान पाएँगे? देखिए, मेरा सोशल मीडिया इन लपटों की फुफकार से भरा पड़ा है।
“आज साहित्य का काला दिन है!”
“पुरस्कारों का स्तर गिर गया है!”
कोई कहता है, “ये तो जलने का कोई कारण नहीं हुआ, भाई साहब! ये तो सेल्फ इग्निशन टाइप का मामला है। जब मन किया, तब जल लिए। आपने तो पुरस्कृत पुस्तक पढ़ी भी नहीं!”
यह बड़ा असाहित्यिक प्रश्न है। पुस्तक पढ़कर जलने लगे तो हमारी मौलिक जलन का क्या होगा? पढ़ने के बाद कहीं रचना अच्छी निकल आई तो हमारे जलने पर ही प्रश्न उठाए जाएँगे। नहीं भाई, मैं यह जोखिम नहीं ले सकता।
कोई युवा लेखक पुरस्कार पा जाए तो मेरी अंतरात्मा धू-धू करके जलने लगती है। साहित्य में इतनी कम उम्र में आगे निकलना देखकर लगता है कि हम साहित्य के ठूँठ क्या सिर्फ जलने के लिए ही रह गए हैं? क्या साहित्य के जंगल में भी ग्रीन ट्रिब्यूनल वालों ने नई कोंपलों और हरे पेड़ों को संरक्षण दे दिया है?
ऐसे ही साहित्य के ठूँठ नहीं बने हैं हम! तीस-चालीस वर्ष साहित्यिक उपेक्षा के दुख के थपेड़े सहे हैं। पत्रिकाओं से रचनाएँ वापस आने की मार खाई है। संपादकों को कोसने की आँधियाँ झेली हैं। मंचों पर कुर्सियों के लिए संघर्ष की धूप में तपे हैं। तब कहीं जाकर साहित्य के ठूँठ बन पाए हैं हम। इसीलिए तो अब हमने अपने आपको साहित्य की भट्टी में जलने के लिए छोड़ दिया है।
मैं तो इसीलिए महिला लेखकों को सलाह देता हूँ कि लिखने के बजाय चूल्हे-चौके पर ध्यान दें। भाई, वे चूल्हे-चौके पर ध्यान देंगी, तभी तो हम जैसे साहित्य के ठूँठ उनकी रसोई में जलने के काम आ सकेंगे!
हालाँकि मेरी पत्नी ने यह सुनकर पूछा, “तो तुम्हें भी चूल्हे-चौके पर लगा दूँ? तुम्हारा लेखन भी कोई बहुत काम का नहीं है।”
देखिए, मेरी जलन का तो क्या ही कहें! एक स्तरीय जलन है यह। साहित्य जगत में आदमी जितना गिरता है, उसकी जलन का स्तर उतना ही उठने की संभावना रहती है। पहले मेरी जलन जीवित साहित्यकारों तक सीमित थी। किसी की प्रसिद्धि, पुरस्कार, पुस्तक या प्रशंसा देखकर जल लिया करता था। लेकिन धीरे-धीरे मेरी साधना में परिपक्वता आई। अब मैं दिवंगत साहित्यकारों से भी जल सकता हूँ।
लोग कहते हैं कि मृत्यु के बाद किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए।
मैं कहता हूँ, साहित्य में जलन जीवित और मृत में कोई भेद नहीं करती। बस जलन को थोड़ी-सी हवा चाहिए, थोड़ी-सी फूँक!
मुझे कभी-कभी अपनी इस साधना पर गर्व होता है। मैंने दूसरों की सफलता की चिंगारी से अपने आपको जलाया है।
एक दिन श्रीमतीजी ने पूछा, “जिस लेखक से तुम इतने जलते हो, उसने तुम्हारा बिगाड़ा क्या है?”
मैंने कहा, “यही तो बिगाड़ा है कि कुछ बिगाड़ा ही नहीं! वह अपनी जिंदगी में मस्त है। मेरी परवाह तक नहीं करता। मैं उसके लिए इतना जलता हूँ और वह मेरा नाम तक नहीं लेता!”
वे सिर पकड़कर बैठ गईं।
अब मेरी एक ही माँग है कि साहित्य अकादमियों और संस्थाओं को तत्काल ‘राष्ट्रीय जलकुकड़ा साहित्यकार सम्मान’ की स्थापना करनी चाहिए। इसमें लेखन की गुणवत्ता नहीं, जलन की तीव्रता देखी जाए। किसने कितने पुरस्कारों पर आपत्ति की, कितने नवोदित लेखकों का मनोबल तोड़ा, कितनी पुस्तकों को बिना पढ़े खारिज किया और कितनी श्रद्धांजलियों में दिवंगत की कमियाँ निकालीं—इन सबका बाकायदा मूल्यांकन हो।
मुझे पूरा विश्वास है कि इस क्षेत्र में मेरा चयन निर्विरोध होगा।
हाँ, एक कठिनाई अवश्य है। यदि यह पुरस्कार किसी दूसरे जलकुकड़े को मिल गया तो?
इस आशंका से अभी से मेरे सीने में जलन होने लगी है।
मेरी जलन अपना ही घर फूँक रही है।
श्रीमतीजी ने हारकर कहा, “जरा पड़ोसियों को तो देखो!”
मैंने खिड़की से पड़ोसी के घर की तरफ देखा। वहाँ रोशनी थी। हँसी-खुशी थी। लोग आराम से चाय पी रहे थे।
मुझे फिर जलन होने लगी।
उधर जिनसे मैं जलता हूँ, उनके घर का एक परदा तक नहीं झुलसा!
अब आप ही बताइए, ऐसी जलन भी किस काम की, जिसकी आग अपने घर से निकलकर अड़ोसी के यहाँ तक न पहुँच सके!
फिर भी जलूँगा।
आखिर जलना मेरी फितरत है।
किसी के बाप का थोड़े ही जला रहा हूँ!
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