अभी न जाओ छोड़कर… — एक स्वर का अवसान

“अभी न जाओ छोड़कर…” — एक स्वर का अवसान

“अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं…”
सच में, आज दिल यही कह रहा है—अभी नहीं जाना चाहिए था तुम्हें।

Asha Bhosle और Lata Mangeshkar—इन दोनों स्वरों के साथ मानो भारतीय संगीत का एक पूरा युग ही अपने अंतिम पड़ाव पर आ खड़ा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे पूरी एक पीढ़ी, और उसके बाद की कई पीढ़ियाँ, एक साथ हाथ जोड़कर कह रही हों—रुक जाइए… अभी तो बहुत कुछ सुनना बाकी था।

Asha Bhosle—यह नाम महज़ एक गायिका का नहीं ; यह भारतीय संगीत की बहुरंगी आत्मा का पर्याय है । उनकी आवाज़ में केवल सुर नहीं थे, उसमें समय की धड़कन थी—हर दशक का मिज़ाज, हर भाव का विस्तार।

उनकी गायकी का जादू यही था कि वह किसी एक खांचे में कभी बंधी ही नहीं।
कभी वही चुलबुली, चहकती आवाज़—“पिया तू अब तो आजा…” में शरारत की पराकाष्ठा बन जाती,
तो कभी वही स्वर “दिल चीज़ क्या है…” में अदब, नज़ाकत और तहज़ीब की मिसाल रच देता।

Rahul Dev Burman के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत को जैसे नए पंख दिए—पश्चिमी धुनों और भारतीय भावों का ऐसा संगम, जिसमें प्रयोग भी था और लोकप्रियता भी। वे केवल गाती नहीं थीं, वे गीत को जीती थीं—हर शब्द को अपने स्वरों में ढालकर, उसे आत्मा तक पहुँचा देती थीं।

लेकिन आज जब यह खबर आयी है कि वह आवाज़ अब हमेशा के लिए शांत हो गई—तो भीतर एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया है। वही सन्नाटा, जो किसी विशाल वृक्ष के अचानक गिर जाने पर पूरे जंगल में फैल जाता है।

पर सच यह भी है—क्या सचमुच वे चली गई हैं?

क्योंकि
जब कहीं दूर रेडियो पर “इन आँखों की मस्ती…” बजेगा,
जब किसी शादी में “चुरा लिया है तुमने…” गूंजेगा,
जब किसी अकेली रात में “मेरा कुछ सामान…” कोई गुनगुनाएगा—
तो सच मानिए, दिल के कोनों को छू जाएगा… और तब कैसे कह पाएँगे कि आशा कहीं चली गईं?

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उनकी आवाज़ में एक अजीब सा जीवन था—जैसे कोई नदी, जो हर मोड़ पर अपना रंग बदलती है, पर बहना नहीं छोड़ती।
वे दुख भी गा सकती थीं, और उसी सहजता से उत्सव भी।
वे विरह की टीस को भी स्वर दे सकती थीं, और प्रेम की चंचलता को भी।

आज जब हम कहते हैं—“अभी न जाओ छोड़कर…”
तो शायद यह कहना भी ज़रूरी नहीं रह जाता।

क्योंकि
कुछ लोग जाते नहीं—बस समय के एक कोने में बैठकर,
हमारी स्मृतियों के रेडियो पर हमेशा बजते रहते हैं।

Asha Bhosle भी उन्हीं में से एक हैं—
एक ऐसी आवाज़, जो शरीर से मुक्त होकर अब और भी व्यापक हो गई है।

वे अब हर उस क्षण में होंगी—
जब कोई पुराना गीत दिल को झनझना देगा,
जब कोई धुन अचानक आँखों को नम कर देगी,
जब किसी के चलते कदम महफ़िल में अचानक ठिठक जाएँगे और रंगत घुल जाएगी,
और कोई न कोई कद्रदान मुस्कुराकर कहेगा—

“यह गाना सुना है आपने…?”

और कहीं भीतर से वही स्वर उठेगा—
“अभी न जाओ छोड़कर… कि दिल अभी भरा नहीं…”

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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