अकेलेपन की महामारी: क्या हम जन्म से ही अकेले हैं?

अकेलेपन की महामारी: क्या हम जन्म से ही अकेले हैं?

कुछ वर्ष पहले World Health Organization ने अकेलेपन को एक उभरती हुई वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती माना। शोध यह बताने लगे हैं कि दीर्घकालिक अकेलापन हृदय रोग, अवसाद, नींद विकार और यहाँ तक कि समयपूर्व मृत्यु के जोखिम से भी जुड़ा हो सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि लोग अकेले क्यों हैं; प्रश्न यह है कि इतनी भीड़, इतने संपर्क और इतनी डिजिटल निकटता के बावजूद हम भीतर से खाली क्यों हैं?

शायद कारण यह है कि मनुष्य जैविक रूप से “सामाजिक प्राणी” होते हुए भी अस्तित्व की गहराई में मूलतः अकेला है। जन्म लेते समय हम अकेले आते हैं। मृत्यु के क्षण में भी भीतर की यात्रा अकेली ही होती है। बीच का सारा जीवन—रिश्ते, मित्र, परिवार, उपलब्धियाँ—मानो इस मूल अकेलेपन पर डाली गई परतें हैं।

हम नौकरी करते हैं, करियर बनाते हैं, पुरस्कार पाते हैं, सोशल मीडिया पर मुस्कुराते चेहरे पोस्ट करते हैं। हम प्रेम में पड़ते हैं, विवाह करते हैं, बच्चे होते हैं। हम व्यस्त रहते हैं—इतने व्यस्त कि स्वयं से मिलने का समय ही न बचे। पर क्या यह सब कहीं उस मौन डर से बचने का प्रयास तो नहीं—कि यदि एक क्षण को भी ठहर गए, तो भीतर की खामोशी हमें घेर लेगी?

एक प्रश्न उठता है क्या  असली उपचार “भीड़” है या जागरूकता” ?

अकेलापन केवल “लोगों की कमी” नहीं है; यह अपने ही अस्तित्व से अपरिचय है। भीड़ में खड़े होकर भी आदमी अकेला हो सकता है, और जंगल में रहकर भी पूर्ण। फर्क बाहर की संख्या का नहीं, भीतर की साक्षी का है।

हम अपने डर से भागने के लिए रिश्ते बनाते हैं। अपनी असुरक्षा को ढँकने के लिए पद और प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। अपने भीतर के खालीपन को भरने के लिए उपभोग करते हैं—खरीदते हैं, खाते हैं, देखते हैं, स्क्रॉल करते हैं। लेकिन जो खालीपन “अस्तित्वगत” है, वह वस्तुओं से नहीं भरता।

यहाँ एक सूक्ष्म मोड़ आता है। क्या अकेलापन वास्तव में बीमारी है? या वह एक संकेत है? जैसे शरीर में दर्द बताता है कि कहीं कुछ असंतुलित है, वैसे ही मन का अकेलापन संकेत देता है कि हम स्वयं से कट गए हैं।

अक्सर हम बाहरी संसार को दोष देते हैं—समाज बदल गया है, रिश्ते खोखले हो गए हैं, तकनीक ने दूर कर दिया है। पर क्या हमने कभी अपने भीतर झाँककर देखा? अपने डर, अपने सपनों, अपने शोर और अपने अलार्म को “ऑब्ज़र्व” किया? हम किससे भाग रहे हैं? किस सत्य से डरते हैं?

जब हम सचेत होकर अपने भीतर के अकेलेपन को देखते हैं—बिना उसे तुरंत भरने की कोशिश किए—तब एक अद्भुत परिवर्तन संभव है। वही अकेलापन ध्यान का द्वार बन सकता है। वही खालीपन सृजन का स्रोत बन सकता है। वही मौन हमें अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित करा सकता है।

अकेलेपन से भागना हमें भीड़ का हिस्सा बना देता है; अकेलेपन को समझना हमें स्वयं से मिलवा देता है।

शायद हमारी असली बीमारी अकेलापन नहीं, बल्कि स्वयं से दूरी है। और उसका इलाज भी बाहर नहीं—भीतर है।

जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि “हाँ, मैं मूलतः अकेला हूँ,” तब एक विचित्र शांति जन्म लेती है। क्योंकि तब हमें किसी से अपनी पहचान उधार लेने की आवश्यकता नहीं रहती। तब रिश्ते भी आवश्यकता नहीं, बल्कि उत्सव बन जाते हैं। तब करियर भी भागने का साधन नहीं, अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकता है।

प्रश्न यह नहीं कि दुनिया हमें समझती है या नहीं। प्रश्न यह है—क्या हम स्वयं को देखने का साहस रखते हैं?

हो सकता है WHO की चेतावनी हमें केवल सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि आत्म-संपर्क गहरा करने के लिए भी प्रेरित कर रही हो।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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