व्यंग्य में नित नए व्यंग्यकार प्रसूत हो रहे हैं।कई चौकन्नी नज़रों से विसंगतियों को पकड़ रहे हैं तो कई उन्मीलित अवस्था में परिदृश्य को निहार रहे हैं।पिछले चंद वर्षों में सक्रिय हुए व्यंग्यकार मुकेश असीमित रोज कुछ न कुछ लिखकर फेसबुक पर बेहद सक्रिय हैं।उनके पास व्यंग्य दृष्टि भी है।”अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र” उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह है जो भावना प्रकाशन से 2026 में आया है।इस व्यंग्य संग्रह में कुल 30 व्यंग्य शामिल हैं जो आकार में भले ही छोटे हों, अपने शीर्षक और कंटेंट से आकर्षित करते हैं।मुकेश असीमित के लेखन में क्षिप्रता है जो गंभीर लेखन के लिए अक्सर अच्छी नहीं मानी जाती।चलते फिरते व्यंग्य लिखने वालों ने किताबों के पहाड़ खड़े कर लिए पर साहित्य में वे कहां हैं,खुद भी नहीं जानते हैं।पर मुकेश असीमित की शैली अलग से पहचानी जाती है। यह विशेषता सामान्यतौर पर कम ही व्यंग्यकारों में मिलती है।आप किसी व्यंग्य को पढ़कर कह सकते हैं यह मुकेश असीमित ने लिखा है।यहां शैली का आशय लेखक की भाषा संबंधी विशेषता।व्यंग्य में भाषा सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है।कई व्यंग्यकार भाषा के मामले में बेहद दरिद्र हैं। मेरा मानना है व्यंग्य लेखन दो घटकों से निर्मित है।एक विसंगति को पकड़ना,दूसरा विसंगति के लिए जिम्मेदार पर प्रहार करना।कई व्यंग्यकार विसंगति पकड़ने में कामयाब हो जाते हैं पर प्रहार शिथिल रहता है।मुकेश असीमित ने दोनों घटकों का ध्यान रखा है फिर भी कुछ व्यंग्य लेखों में प्रहार और तीखा होता तो बढ़िया रहता।इस संग्रह के ज्यादातर व्यंग्य हमारे परिवेश को लेकर रचे गए हैं।सामाजिकता व्यंग्य का महत्वपूर्ण तत्व है।यह अच्छी बात है इस संकलन में सियासत पर बहुत ज्यादा व्यंग्य नहीं हैं।विषयों में विविधता है।पुलिस, ए आई से लेकर शमशान तक के विषय शामिल हैं। मुकेश जी से व्यंग्य साहित्य को बहुत उम्मीदें हैं।आशा है भविष्य में वह और श्रेष्ठ लिखकर व्यंग्य साहित्य को सुदृढ़ करेंगे। ।मेरी शुभकामनाएं। कुछ पंच देखें। “देख सरकार ने क्या किया है
तुझे इज्जत से मरने का इंतजाम।”
“तू बच गया तो योजनाओं का सारा टेंशन है।मुआवजा किसको बांटेंगे?”
“कोई भी रोग जो किसी स्पष्ट बीमारी में फिट न बैठे,वह वात का ही रूप माना जाता है।”
“इन ठूंठों का बस एक ही एजेंडा है
हर उगते पौधे की जड़ों में घुन लगाना।” (साहित्य के मठाधीशों पर व्यंग्य)
“बीवी ने माथे पर बल डालते हुए कहा,’अरे ये कैसा नौ लखा।’
‘देखो पूरे नौ लाख पच्चीस हजार का बिल” (सोने के चढ़ते भाव पर व्यंग्य)
“चीलें देखिए बिना बुलाए,बिना शर्त,हर आपदा में हाजिर। बाढ़, सूखा, रेल एक्सीडेंट,लैंडस्लाइड,अस्पतालजहां मौत का तमाशा है वहां चीलों की परेड।”
(“चीलों का लोकतंत्र” शीर्षक से व्यंग्य जो एक बेहतरीन व्यंग्य है)
“विमोचन भी लूज मोशन की तरह है, एक बार लग जाए तो करने वाला और कराने वाला,इस हाजत का मारा मारा फिरता है।” यह पुस्तक रोचक और पठनीय है।इस पुस्तक का मूल्य 350/है
समीक्षक -अरविन्द तिवारी
वरिष्ठ व्यग्यकार एवं उपन्यासकार
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
मेरी व्यंग्यात्मक पुस्तकें खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें – “Girne Mein Kya Harz Hai” और “Roses and Thorns”
Notion Press –Roses and Thorns अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र
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