असभ्यता का उद्घोष और सभ्यता की चुप्पी
वे कहते हैं—
असभ्यताएँ
सभ्यता को निगल जाएँगी एक दिन,
जैसे कोई भूखा विज्ञापन
सच को चबा जाता है
ब्रेकिंग न्यूज़ के बीच।
वे कहते हैं—
और कहते हुए
उनकी आँखों में चमकती है
मुनाफ़े की लोलुप लौ,
जैसे इतिहास कोई शेयर मार्केट हो
और युद्ध—
एक लंबी अवधि का निवेश।
पर देखो—
सभ्यता कोई नाज़ुक शीशा नहीं
कि पहली ठोकर में टूट जाए,
वह तो वह नदी है
जो पत्थरों के बीच से भी
अपना रास्ता बना लेती है,
और कभी-कभी
पत्थरों को ही
कंकड़ बना देती है।
असभ्य अट्टहास
दरअसल एक मुखौटा है—
डर का,
अधूरेपन का,
और उस खालीपन का
जिसे वे
टैरिफ़, टैंक और ट्वीट से भरना चाहते हैं।
वे पुल तोड़ते हैं,
क्योंकि उन्हें रास्तों से डर लगता है।
वे इमारतें गिराते हैं,
क्योंकि उन्हें छतों के नीचे
जुड़ते हुए लोग नहीं सुहाते।
उनकी भाषा में
“राष्ट्र” एक सौदा है,
“सीमा” एक सौदा है,
और “मानवता”—
एक ऐसा शब्द
जिसका अनुवाद
उनके शब्दकोश में नहीं मिलता।
वे इतिहास लिखना चाहते हैं
अपने हस्ताक्षर से,
पर इतिहास—
उनकी स्याही को
पसीने की तरह पोंछ देता है।
क्योंकि
सभ्यता
सिर्फ़ इमारतों में नहीं बसती,
वह बसती है
एक माँ की आँखों में
जो अपने बच्चे को
युद्ध के नाम पर नहीं,
जीवन के नाम पर पुकारती है।
वह बसती है
उन हाथों में
जो मलबे से
फूल उगाने की ज़िद रखते हैं।
असभ्यता
चीखती है—
लाउडस्पीकर पर,
मंचों पर,
और बाज़ारों में।
सभ्यता
धीरे से कहती है—
और उसकी आवाज़
इतनी धीमी होती है
कि वही सुन पाता है
जो अभी तक
मनुष्य बचा हुआ है।
हाँ,
पुतले गिरते हैं एक दिन,
और अट्टहास—
अपने ही प्रतिध्वनि से
घबराकर
खुद में सिमट जाता है।
बाकी बचता है—
एक लंबी चुप्पी,
जिसमें इतिहास
धीरे-धीरे लिखता है—
कि
असभ्यता
कभी सभ्यता को नष्ट नहीं करती,
वह सिर्फ़
अपना ही मज़ाक बनाती है
समय के सामने।
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