भाग 1
कल्पना कीजिए—आप एक साधारण गृहस्थ हैं। आपके घर में छोटे-छोटे विवाद हैं, कभी स्वास्थ्य बिगड़ता है, कभी व्यापार में बाधा आती है, तो कभी अनजाने भय दिल को घेर लेते हैं। आप चाहते हैं कि परिवार में शांति रहे, काम में सफलता मिले, शरीर निरोग रहे और मन स्थिर रहे। ऐसे ही साधारण लेकिन सबसे वास्तविक प्रश्नों का उत्तर है अथर्ववेद। यही कारण है कि इसे जीवन से सबसे ज़्यादा संबंधित वेद कहा गया है।
ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को त्रयी कहा गया, क्योंकि ये तीनों मिलकर यज्ञ, स्तुति और संगीत की वेदपरंपरा का आधार बने। लेकिन अथर्ववेद इस त्रयी से अलग खड़ा है। यह जीवन का चौथा खंभा है—गृहस्थ, आम नागरिक और साधारण व्यक्ति के लिए बनाया गया मार्गदर्शक। इसमें यज्ञ की जटिलता से अधिक रोज़मर्रा की समस्याओं का समाधान है। इसमें मंत्र हैं जो रोगों से मुक्ति दिलाते हैं, औषधियों का बखान है जो आयुर्वेद की नींव बनते हैं, प्रार्थनाएँ हैं जो परिवार को जोड़ती हैं, और सूत्र हैं जो व्यापार व यात्रा में सफलता दिलाने का आत्मविश्वास जगाते हैं।
अथर्ववेद का स्वरूप दो ऋषियों से जुड़ा माना जाता है—अथर्वण और अंगिरस। अथर्वण का ज्ञान शांति, स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित मंत्रों में व्यक्त हुआ; इन्हें भयज मंत्र कहते हैं। वहीं अंगिरस का ज्ञान रक्षा और शत्रु निवारण से संबंधित सूक्तों में प्रकट हुआ; इन्हें अभिचार मंत्र कहा जाता है। इन दोनों धाराओं के संगम ने अथर्ववेद को अद्वितीय बना दिया—एक ओर सुरक्षा, दूसरी ओर स्वास्थ्य; एक ओर सकारात्मक ऊर्जा, दूसरी ओर नकारात्मकता से बचाव।
कई विद्वानों ने लंबे समय तक इसे मुख्यधारा के वेदों से थोड़ा अलग रखा। कारण था इसका अत्यधिक लौकिक स्वरूप। इसमें यज्ञ के विशाल अनुष्ठानों की जगह घर-परिवार, खेत-खलिहान, पशुओं, यात्रा और व्यक्तिगत जीवन की व्यावहारिक बातें अधिक हैं। यही कारण है कि कुछ ने इसे ‘जादू-टोने का वेद’ कहकर खारिज करने की कोशिश की। लेकिन सच यही है कि अथर्ववेद ने सबसे पहले यह बताया कि आध्यात्मिकता और भौतिकता अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्वस्थ शरीर, स्थिर मन, सुरक्षित जीवन और संतुलित रिश्ते के बिना शांति और मोक्ष की कल्पना अधूरी है।
भाषा और शैली भी यही संकेत देती है। इसमें कठिन दार्शनिक सूत्रों की बजाय सहज और सीधे मंत्र हैं, जिन्हें कोई भी समझ सके। कुल 20 कांड, 730 सूक्त और लगभग 6000 मंत्र इसमें संकलित हैं। इसमें गद्य भी है, पद्य भी। यही इसे अन्य वेदों से अलग बनाता है। इसकी पंक्तियों में जल, वायु, अग्नि और औषधियों की महिमा गाई गई है। एक स्पष्ट संदेश है—मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है, उससे अलग नहीं। जब हम प्रकृति के साथ तालमेल रखते हैं तो स्वास्थ्य और शांति प्राप्त होती है; जब हम उसका संतुलन बिगाड़ते हैं तो रोग, भय और संकट सामने आते हैं।
इस दृष्टि से अथर्ववेद आधुनिक युग में और भी प्रासंगिक हो उठता है। जब हम मानसिक तनाव, पर्यावरण प्रदूषण और जीवनशैली संबंधी रोगों से जूझ रहे हैं, तब यह हमें याद दिलाता है कि समाधान बाहरी जटिलताओं में नहीं, बल्कि अपने मूल की ओर लौटने में है। आयुर्वेद का बीज इसी वेद में है। तुलसी, अश्वगंधा, गिलोय, मुलेठी जैसी वनस्पतियों के गुणों का वर्णन इसे एक चिकित्सा-ग्रंथ बनाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ औषधि नहीं—मंत्र और मानसिक शक्ति का भी उतना ही महत्व है।
रोग को केवल शारीरिक नहीं, मानसिक और आत्मिक असंतुलन का परिणाम माना गया। इसलिए चिकित्सा का आधार था शरीर, मन और आत्मा का एक साथ उपचार। यही समग्र चिकित्सा—holistic healing—की जड़ है। औषधि के साथ मंत्र का विधान रोगी को विश्वास और सकारात्मकता देता था। यह केवल आस्था नहीं, गहरी मनोवैज्ञानिक समझ थी। आज जिसे हम placebo effect कहते हैं, वही बात अथर्ववेद हजारों साल पहले मंत्रों और आशीर्वचनों के रूप में समझा चुका था।
बीमारियों की सूची में बुखार, सिरदर्द, हृदय रोग, त्वचा रोग, कृमि (कीटाणु), यहाँ तक कि मानसिक रोग भी शामिल थे। हर रोग के लिए विशेष सूक्त हैं। रोग को कई बार दुष्ट आत्मा के रूप में चित्रित किया गया—यह प्रतीकात्मक भाषा रोगी के मन पर गहरा असर डालती थी। वह मानता था कि मंत्र उच्चारण के साथ वह आत्मा निकल जाएगी, और उसका भय घट जाता था। यही भय-निवारण चिकित्सा का सबसे पुराना रूप है।
पानी और अग्नि की शक्ति का भी भरपूर उल्लेख है। जल को शुद्धता और ऊर्जा का स्रोत माना गया। नदियों के पवित्र जल से स्नान, मंत्रोच्चार के साथ उसका सेवन रोग निवारण का साधन माना गया। अग्नि को रूपांतरण का प्रतीक बताया गया—जो अशुद्धि को जलाकर शुद्धता में बदल देती है।
यहीं से हम समझते हैं कि अथर्ववेद केवल रस्मों का संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य की सामूहिक चेतना का जीवन-दस्तावेज है। इसमें यह बताया गया कि भय को कैसे काबू किया जाए, आशा को कैसे जीवित रखा जाए और असुरक्षित संसार में सुरक्षा की अनुभूति कैसे मिले। यह हमें यह भरोसा देता है कि हर चुनौती का समाधान हमारे भीतर है, बस उसे जागृत करना है।

भाग 2
अथर्ववेद का दूसरा बड़ा आयाम है—सकारात्मकता और शांति कर्म। स्वास्थ्य और सुरक्षा के बाद जीवन का अगला प्रश्न यही है—क्या परिवार में प्रेम और सामंजस्य है? क्या काम और व्यापार में सफलता मिल रही है? क्या समाज में सम्मान और एकता बनी हुई है? अथर्ववेद ने इन प्रश्नों का उत्तर शांति और पौष्टिक कर्मों के माध्यम से दिया।
संज्ञान सूक्त और सामनस्य सूक्त इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इनमें प्रार्थना की जाती है कि परिवार के सब लोग एक साथ चलें, एक साथ बोलें और उनके मन एक हो। यह पारिवारिक थेरेपी की तरह था—जब पूरा परिवार एक साथ मंत्रोच्चार करता था, तो उनके बीच की खटास कम हो जाती थी और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था। यह हमें याद दिलाता है कि रिश्तों की नींव संवाद और आपसी सम्मान है।
कृषि और व्यापार में सफलता के लिए भी विशेष प्रार्थनाएँ थीं। किसान फसल बोने से पहले धरती माँ से अच्छी उपज की कामना करता था। व्यापारी यात्रा पर निकलते समय सफल सौदे की प्रार्थना करता था। यह सब केवल देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नहीं था, बल्कि अपने काम के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव था। जब काम को श्रद्धा से शुरू किया जाए, तो आत्मविश्वास और मेहनत मिलकर सफलता की संभावना बढ़ा देते हैं। यही बात आज हम positive affirmations या visualization के रूप में जानते हैं।
यात्रा, गृह-प्रवेश, सभा-भाषण—हर स्थिति के लिए मंत्र मिलते हैं। नए घर में प्रवेश करते समय मंत्रोच्चार का उद्देश्य स्थान को शुद्ध करना और सकारात्मक ऊर्जा से भरना था। सभा में बोलने से पहले मंत्र व्यक्ति को आत्मबल और वाणी में ओज देते थे। यह भय घटाते और आत्मविश्वास बढ़ाते थे—आज के public speaking psychology की तरह।
लेकिन जीवन में केवल सकारात्मकता ही नहीं, भय और नकारात्मकता भी होती है। अथर्ववेद ने इसे भी स्वीकारा। इसलिए इसमें विशेष रक्षा सूक्त हैं—सांप और बिच्छू से बचाव, विषहरण, युद्ध में विजय, चोरी और आपदा से रक्षा। मंत्र का वैज्ञानिक प्रभाव यह था कि वह भय को घटाकर व्यक्ति के शरीर को बेहतर प्रतिक्रिया देने की क्षमता देता था। सैनिक जब युद्ध से पहले मंत्र पढ़ते, तो उनका आत्मविश्वास दोगुना हो जाता था।
भीतरी शत्रुओं—भय, चिंता, दुःस्वप्न और ईर्ष्या—से बचाव के लिए भी सूक्त हैं। सोने से पहले प्रार्थना करने की परंपरा इसी समझ पर आधारित थी कि सकारात्मक विचार नींद की गुणवत्ता सुधारते हैं। कृत्या निवारण (दूसरे की बुरी नीयत से रक्षा) भी इसी मनोविज्ञान पर आधारित था। जब व्यक्ति को यह विश्वास होता है कि वह सुरक्षित है, तो नकारात्मकता का असर कम हो जाता है। यह सुरक्षा कवच केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि भीतर की मानसिक शक्ति का प्रशिक्षण था।
अथर्ववेद ने रिश्तों और प्रेम को भी गहराई से छुआ। विवाह सूक्तों में पति-पत्नी को एक-दूसरे का पूरक माना गया। पत्नी को सम्मान और अधिकार दिए गए, पति को जिम्मेदारी और सुरक्षा का कर्तव्य। प्रेम को आकर्षित करने वाले सूक्त किसी को जबरन वश में करने के लिए नहीं, बल्कि योग्य साथी को आकर्षित करने और स्वयं को योग्य बनाने की प्रक्रिया थे। यही वास्तविक law of attraction है—जैसे आप हैं, वैसी ही ऊर्जा आप आकर्षित करेंगे।
लेकिन अथर्ववेद ने केवल उजला पक्ष नहीं दिखाया। इसमें अभिचार और शत्रुनाशक मंत्र भी हैं—जिन्हें अंतिम उपाय माना गया। ये सामाजिक यथार्थ के प्रमाण हैं कि मानव मन में घृणा और प्रतिशोध भी रहते हैं। इन्हें नियंत्रित करने के लिए विधि दी गई, ताकि वे अनियंत्रित होकर विनाशकारी न बन जाएँ। यह स्वीकारोक्ति है कि जीवन में प्रकाश और अंधकार दोनों हैं—और बुद्धिमानी यह है कि हम प्रकाश का मार्ग चुनें।
व्यक्तिगत जीवन से परे अथर्ववेद राष्ट्र और शासन की भी बात करता है। राजा को गाय की तरह प्रजा की रक्षा करने वाला बताया गया। कर को फूल से रस लेने वाली मधुमक्खी जैसा होना चाहिए—जो न फूल को तोड़े, न रस से वंचित रखे। सभा और समिति जैसी संस्थाएँ लोकतांत्रिक भावनाओं की झलक देती हैं। पृथ्वी सूक्त राष्ट्र की एकता का अद्भुत घोष है—विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग एक माँ की संतान हैं।
अंततः अथर्ववेद हमें दार्शनिक शिखर तक ले जाता है। स्तंभ सूक्त और प्राण सूक्त बताते हैं कि यह ब्रह्मांड एक अदृश्य आधार पर टिका है—वही ब्रह्म। आत्मा उसी का अंश है, अमर है, और प्राण उसी की ऊर्जा है। मृत्यु को अंत नहीं, यात्रा का अगला चरण माना गया। जीवन के संस्कार—गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक—अथर्ववेद ने दिशा दी।
इस तरह अथर्ववेद जीवन का संपूर्ण दस्तावेज है—शरीर और मन से लेकर राष्ट्र और ब्रह्मांड तक। यह हमें बताता है कि असली आध्यात्मिकता भागने में नहीं, जीवन के बीच रहते हुए संतुलन साधने में है। स्वास्थ्य की जड़ मन की शांति है, सफलता की जड़ सकारात्मक सोच है, सुरक्षा की जड़ आत्मबल है, प्रेम की जड़ आत्म-सुधार है, और मोक्ष की जड़ आत्मज्ञान। यही अथर्ववेद का सार है—जीवन का वेद, हर मानव का वेद।
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