डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 28, 2025
Cinema Review
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पंचायत सीज़न 4 फुलेरा की उसी मिट्टी से शुरू होता है, जिसमें पहले हँसी और सादगी उगती थी — लेकिन इस बार राजनीति की परतें ज़्यादा गाढ़ी हैं। सचिव जी की सीएटी में सफलता, रिंकी का प्रेम प्रस्ताव, और प्रधान जी की हार – सब मिलकर इसे इमोशन, ड्रामा और स्थानीय राजनीति का दिलचस्प मिश्रण बनाते हैं। कहानी में थोड़ी खिंचावट ज़रूर है, लेकिन अंतिम दो एपिसोड्स में जो भावनात्मक टर्न है, वो पूरी सीरीज़ को देखने लायक बना देता है।
“गाँव वही है, कहानी गहरी हो गई है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 27, 2025
Blogs
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डॉक्टर साहब की जिंदगी पेन की कैप पर अटक गई है। कभी स्टाफ फेंक देता है, कभी चूहा चुरा लेता है! कैपविहीन पेन की स्याही उनकी जेब पर हमला बोल देती है। यह मज़ेदार व्यंग्य बताता है — असली ताक़त अब कैप में है, पेन में नहीं!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 24, 2025
Poems
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एक मुखौटा जो क्रांति का नाम लेता है, और एक जाम जो सिंगल मॉल्ट से छलकता है।
डॉ. मुकेश 'असीमित' की यह तीखी व्यंग्यात्मक कविता उन स्वघोषित चिंतकों पर करारा कटाक्ष है — जो शब्दों से सर्वहारा का राग अलापते हैं, पर जीवन में सुविधाओं के सहारे सांस लेते हैं।
"बेसहारा सर्वहारा चिन्तक" सत्ता, दिखावे और वैचारिक दोगलेपन की उस रंगभूमि पर प्रहार करती है, जहाँ विमर्श क्लाइमेट चेंज और स्त्री अधिकारों पर होता है, पर ए.सी. और इंटर्न की सुविधा भी नहीं छोड़ी जाती।
यह रचना नारे और नैतिकता के बीच के खोखलेपन को उजागर करती है — तीखी, मार्मिक और असीमित शैली में।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 22, 2025
Blogs
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तुम भगवान हो, तो गलती नहीं कर सकते — क्योंकि इंसान की तो गलती माफ़ होती है। अब जब भगवान बना दिया है, तो ये भी जान लो... इंसानों के हक़ मांगोगे, तो चोला उतार फेंका जाएगा। क्या कहा? छुट्टी चाहिए? भगवानों को छुट्टी नहीं मिलती... बस पूजा मिलती है या पत्थर!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 8, 2025
Blogs
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"डॉक्टर साहब, आपकी पढ़ाई अपनी जगह… हम तो इसे 'नस जाना' ही मानेंगे!"
ग्रामीण चिकित्सा संवादों में हर लक्षण का एक लोकनाम है — 'चक चली गई', 'हवा बैठ गई', 'गोड़ा बोल गया', 'ऊपर की हवा का असर है'। ये केवल शब्द नहीं, एक पूरी चिकित्सा-व्याख्या है, जिसमें विज्ञान, विश्वास और व्यंग्य की त्रिवेणी बहती है। गाँव के मरीज डॉक्टर से नहीं, खुद अपनी बीमारी का निदान लेकर आते हैं। इस लेख में इन्हीं रंग-बिरंगे अनुभवों, प्रतीकों और मुहावरों के ज़रिए एक लोक-चिकित्सा संस्कृति का हास्य-चित्रण किया गया है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 22, 2025
Blogs
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“गालियों का बाज़ार” नामक उस लोकतांत्रिक तमाशे का प्रतीक है जहाँ भाषाई स्वतंत्रता के नाम पर अपशब्दों की होड़ है। हर कोई वक्ता है, हर गाली एक ब्रांड। संविधान की आड़ में तर्क नहीं, तापमान बढ़ाया जा रहा है। यह व्यंग्य मौजूदा सोशल-मीडिया और राजनीति की भाषा पर करारा प्रहार है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 13, 2025
Blogs
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पुरस्कारों की चमक साहित्यकारों को अक्सर पितृसत्ता की टोपी पहना देती है। ये ‘गुप्त रोग’ बनकर छिपाया भी जाता है और पाया भी जाता है, झाड़-पोंछकर अलमारी में रखा जाता है। साहित्यिक संसार में आज पुरस्कार एक ‘औषधि’ है – बिना मांगे मिल जाए तो शक होता है, न मिले तो रोग गहराता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 11, 2025
Blogs
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एक तीखा हास्य-व्यंग्य जो दिखावे के मदर्स डे और असल माँ के संघर्षों के बीच की खाई को उजागर करता है। सोशल मीडिया की चमक के पीछे वो माँ छुपी है, जो आज भी बिना शिकायत अपने बच्चों की खुशियाँ बुन रही है — रोटी सेंकते हुए, ममता लुटाते हुए। पढ़िए, मुस्कुराइए और सोचिए — क्या एक पोस्ट ही काफी है उस ममता के लिए?
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 9, 2025
Blogs
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बेवकूफ बनना कोई साधारण काम नहीं, यह भी एक कला और तपस्या है, जिसमें सामने वाले को यह आभास भी न हो कि आप अभिनय कर रहे हैं। यह समझदारी का मुखौटा पहनकर मूर्ख दिखने की युक्ति है। हर कोई जन्मजात बेवकूफ नहीं होता, बल्कि कई बार जो दूसरों को बेवकूफ बना रहा होता है, वही सबसे बड़ा बेवकूफ सिद्ध हो जाता है। आजकल के घोटाले, फ्रॉड और योजनाएँ इसी बेवकूफी की ज़मीन पर फलते-फूलते हैं। लोकतंत्र में तो वोट तभी मिलते हैं जब मतदाता को बेवकूफ बनाए रखा जाए। बाज़ार में 'वन गेट वन फ्री' जैसे ऑफर इसी मानसिकता का हिस्सा हैं। सनातन काल में भी देवताओं को मोहिनी अवतार लेना पड़ा था — यानी तब भी यह कला प्रचलित थी। अतः प्रस्ताव है कि “राष्ट्रीय मूर्ख आयोग” की स्थापना की जाए, क्योंकि अब नीतियाँ यही कहती हैं: "समझदारी सवाल उठाती है, समाधान तो बेवकूफी ही देती है।" जय बेवकूफी! जय भारत!
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 6, 2025
Blogs
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A darkly humorous satire on modern-day healthcare, portraying a doctor's hospital as a “Kaliyug temple” where survival needs CCTV, bouncers, panic buttons, and soundproof walls. Packed with witty metaphors, real-world ironies, and tongue-in-cheek advice for new doctors, it exposes the chaos of violence, politics, and DJ culture outside hospital doors — where healing meets havoc in India’s twisted reality.