बचपन जीवन का वह उजला-सा मोड़ है जहाँ मनुष्य सबसे पहले मनुष्य होना सीखता है—नागरिक, प्रतियोगी या “भविष्य की फ़ाइल” नहीं। वहाँ न कोई सिलेबस होता है, न रिज़ल्ट की घड़ी, न सफलता का तय पैमाना। वहाँ केवल जिज्ञासा होती है—छूने की, गिरने की, उठने की, पूछने की, बिगाड़ने की और फिर से बनाने की। बच्चा संसार को एक्सप्लोर नहीं करता—वह संसार को जीता है।
पर सभ्य कहलाने वाले हम बड़े लोग इस जीते-जागते अध्याय को बहुत जल्दी पाठ्यक्रम में बदल देते हैं। हम बच्चे के हाथ में खिलौना नहीं, भविष्य थमा देते हैं; उसके कंधे पर बस्ता नहीं, अपेक्षाओं का बोझ लाद देते हैं; और उसके मन में सवाल नहीं, तैयार जवाब भर देते हैं।
शरारत : दोष नहीं, प्रशिक्षण है
बच्चे की शरारत हमें अव्यवस्था लगती है, जबकि वही जीवन की पहली प्रयोगशाला है। पेड़ पर चढ़ना गुरुत्वाकर्षण को समझना है; कूदना डर से संवाद करना है; गलती करना निर्णय की कीमत सीखना है। जो बच्चा शरारत नहीं करता, वह अक्सर इसलिए नहीं करता कि वह बहुत समझदार है—बल्कि इसलिए कि वह बहुत डरा हुआ है। डरा हुआ इस बात से कि गलती पर प्यार कम हो जाएगा, स्वीकृति छिन जाएगी।
और जो बच्चा बचपन में गलती नहीं करता, वह जीवन में निर्णय नहीं ले पाता। हर मोड़ पर वह किसी “सही-गलत” की पर्ची खोजता है, क्योंकि उसने कभी ठोकर खाकर सीखने का अधिकार पाया ही नहीं।
संस्कार : जड़ नहीं, संवाद होने चाहिए
संस्कार अगर बाँध बन जाएँ, तो संस्कृति नहीं—कैद बन जाते हैं। और अगर संवाद बनें, तो विवेक रचते हैं। हम बच्चे को बहुत जल्दी समझा देते हैं—यह धर्म है, वह अधर्म; यह नैतिक है, वह अनैतिक; यह करियर सही है, वह व्यर्थ। पर क्या हमने कभी उससे पूछा—तुम क्या महसूस करते हो? तुम किससे डरते हो? तुम्हें किसमें आनंद मिलता है?
संस्कार तब तक मूल्य नहीं होते, जब तक वे चयन का अधिकार न दें। थोपे गए संस्कार केवल अनुशासन पैदा करते हैं—चेतना नहीं।
निर्णय थोपना : सपनों की हत्या का सभ्य तरीका
“डॉक्टर बनना है”, “इंजीनियर बनना है”, “यही धर्म है”, “यही रास्ता है”—ये सब भविष्य की योजना कम, वर्तमान का अपमान ज़्यादा हैं। बच्चे को वह बनने पर मजबूर करना, जो हम खुद नहीं बन पाए—यह महत्वाकांक्षा नहीं, अधूरी इच्छाओं का स्थानांतरण है। जब हम उसके लिए सब कुछ तय कर देते हैं, तो हम उसके जीवन से सबसे कीमती चीज़ छीन लेते हैं—खुद को खोजने का अवसर।
गलती : जीवन की नैतिक पाठशाला
गलती करना अनैतिक नहीं होता; गलती न करने का अभिनय अनैतिक होता है। जीवन उन लोगों से नहीं डरता जिन्होंने गलतियाँ कीं—जीवन उनसे डरता है जिन्होंने कभी जोखिम नहीं लिया। जो बच्चा गिरकर उठना सीखता है, वही बड़ा होकर सफलता में विनम्र और असफलता में स्थिर रह पाता है।
अंत में
हमें बच्चे को “अच्छा इंसान” बनाने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए—हमें उसे स्वतंत्र इंसान बनने देना चाहिए। संस्कार दें, पर साँस लेने की जगह भी दें। सीमाएँ हों, पर सवाल पूछने की आज़ादी भी हो। अनुशासन हो, पर अनुभव से उपजा हुआ।
क्योंकि जिस बचपन में शरारत मर जाती है, उस जीवन में साहस कभी जन्म नहीं लेता। और बिना साहस के जी गई ज़िंदगी सिर्फ़ सुरक्षित होती है—जीवंत नहीं।
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