बेग़म अख़्तर : सुरों की मलिका


फैज़ाबाद की एक पुरानी हवेली की खिड़की से झांकता धूप का एक टुकड़ा, भीतर बैठी एक नन्ही लड़की के चेहरे पर गिर रहा है। उसका नाम अख़्तरी बाई है—एक ऐसी बच्ची जिसकी आँखों में बहुत कम उम्र में ही दुनिया का संघर्ष तैरने लगा था। पिता का साया न होना, परिवार की टूटन, एकाकीपन—सब उसके आसपास मौजूद हैं, जैसे किसी अनलिखी ग़ज़ल की शुरुआती पंक्तियाँ। पर उस बच्ची के भीतर जो सबसे गहरा था, वह था सुर—एक ऐसा सुर जिसे कोई शोर दबा नहीं सकता।

यह कहानी उसी सुर की है—जो बाद में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का दर्द, उसका प्यार, उसकी नफ़ासत बन गया। यह कहानी है बेग़म अख़्तर की—भारत की मल्लिका-ए-ग़ज़ल।

बचपन में ही अख़्तरी की आवाज़ में अजीब-सी खनक थी—मानो जन्म से ही कोई रूमानियत, कोई कसक, कोई बीता हुआ दुःख उसमें बसा हो। घर के लोग शायद इसे एक सामान्य शौक कहते हों, पर यह कोई शौक नहीं था। यह उनकी नियति थी। संगीत ने उन्हें पुकारा और अख़्तरी बाई ने इस पुकार को उसी तरह सुना जैसे कोई यात्री रेगिस्तान में दूर से आती सरसराहट को सुनता है—क्योंकि वही उसकी दिशा दिखाती है।

उस्ताद इमामदाद ख़ान, उस्ताद अता मोहम्मद ख़ान, और फिर बनारस–पटना–कोलकाता के बड़े घराने। सुर उनके चारों ओर ऐसे फैल गया जैसे कोई नई दुनिया उभर रही हो। उस्ताद सिर्फ़ राग सिखाते हैं, दर्द नहीं। वह दर्द अख़्तर के जीवन ने पहले ही दे दिया था—और शायद इसी वजह से उनकी ठुमरी किसी किताब का पाठ नहीं लगती थी, बल्कि किसी टूटी हुई स्मृति की तरह फिसलती हुई दिल तक पहुँच जाती थी।

समय बीता और अख़्तरी बाई रंगमंच पर आईं। नाटक, मंच, आर्केस्ट्रा, पंडाल—हर जगह लोग कहते—“ये लड़की गाती नहीं, जीती है।” 1930 के दशक में उन्होंने फिल्मों में भी काम किया।
रोती तस्वीर, किंग फॉर अ डे जैसी फिल्मों में उनकी स्क्रीन प्रेज़ेन्स उतनी प्रभावी नहीं थी जितनी उनकी आवाज़।
क्योंकि बेग़म अख़्तर को स्क्रीन नहीं चाहिए थी—उन्हें एक ऐसा मंच चाहिए था जहाँ आँखें बंद कर भी सुना जा सके।

धीरे-धीरे उनकी ग़ज़लें हवा में फैलने लगीं—मीर की उदासी, फ़ैज़ की बेबसी, जिगर की रवानी, ग़ालिब की तल्ख़ी—सब उनकी आवाज़ में आकर ऐसे घुल जाते जैसे चीनी गर्म पानी में।
सुनने वाले कहते—“ये सिर्फ़ आवाज़ नहीं है, एक अधूरी दुआ है।”

फिर आया जीवन का वह मोड़ जिसने उनकी रूह पर सबसे गहरी चोट की: शादी।
1945 में उन्होंने लखनऊ के प्रतिष्ठित वकील इस्माइल अख़्तर से विवाह किया।
शादी होते ही समाज ने कहा—“अब घर की औरत गायन नहीं करेगी।”
संगीत, जो उनका श्वास था, उनसे छीन लिया गया।
मंच की रोशनी बुझ गई।
मंदिर की घंटी जैसे अचानक थम जाए, उनकी रूह में वैसा ही सन्नाटा छा गया।

कुछ ही वर्ष में अवसाद उनके जीवन पर धुंध की तरह छा गया। वह जो हमेशा गाती थीं, वह जो अपनी आवाज़ में दर्द का इलाज करती थीं—वही भीतर बदलने लगीं। डॉक्टरों ने कहा—“इन्हें गीतों में लौटाइए, नहीं तो ये खो जाएँगी।”
और उस दिन—बेग़म अख़्तर पुनर्जीवित हुईं।

1950 के दशक में जब वह मंच पर लौटीं, तो अब वे सिर्फ़ अख़्तरी नहीं रहीं—बेग़म अख़्तर बन चुकी थीं।
अब उनके गले से निकलने वाला हर सुर किसी साधना का नतीजा लगता।
उनकी ग़ज़लें अब केवल गाई नहीं जाती थीं—वे उतरती थीं—दिलों में, रगों में, तन्हाइयों में।

कहते हैं कि ग़ज़ल का असली स्थान श्रोता की आँखों में जमा वह नमी है, जो गीत के ख़त्म होने के बाद भी बनी रहे। बेग़म अख़्तर हर ग़ज़ल में वह नमी पैदा करतीं।
“ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”—जब उन्होंने यह गाया, तो ऐसा लगा मानो वे किसी शेर को नहीं, अपनी ज़िंदगी को गा रही हों।
“हमरी अटरिया पे आओ संवरिया”—में उनकी स्वर-माधुरी में ऐसा मासूम चंचलपन था कि लगता था यह वही बच्ची है जो कभी फैज़ाबाद की खिड़की में बैठकर गुनगुनाती थी।

लखनऊ उनकी गायकी का घर बना। वहाँ की तहज़ीब, नवाबी नफ़ासत, अदब और शेरो-शायरी—सब उनके अन्दर ऐसे बस गए जैसे कोई नदी समुद्र से मिलने को व्याकुल हो। उनकी महफ़िलों में शायर, साहित्यकार, संगीतकार, रईस, साधारण जन—सब बराबर की श्रद्धा से बैठते।
क्योंकि बेग़म अख़्तर सिर्फ़ कलाकार नहीं—एक अनुभव थीं।

समय बीतता गया, पर उनके सुर ठहरे नहीं। वे हर ग़ज़ल में कुछ नया जोड़तीं—कभी ठहराव, कभी टूटन, कभी उभरता दर्द, कभी हल्की सी मुस्कान।
उनकी आवाज़ में कभी कोई बनावट नहीं होती थी। जो था—सच्चा था, कच्चा था, गहरा था।
उनकी गायकी में कोई मंचीय प्रदर्शन नहीं—एक आत्मा की पुकार थी।

फिर 1974 आया—अहमदाबाद का एक कार्यक्रम। बेग़म अख़्तर की तबीयत पहले से ठीक नहीं थी, पर मंच का आकर्षण, संगीत का खिंचाव ऐसा था कि अपने आप को रोक नहीं सकीं।
मंच पर गाते हुए उनकी सांसें कमजोर होती रहीं, पर आवाज़ में वही मिठास, वही दर्द बना रहा।
कुछ ही दिनों बाद लखनऊ लौटकर उन्होंने अंतिम सांस ली।
ऐसा लगता है कि सुरों की देवी सुरों में ही विलीन हो गईं।

आज भी जब उनकी ग़ज़ल बजती है, तो महसूस होता है कि कहीं कोई पुराना घाव हल्का-सा हिल गया है।
कहीं कोई दबा हुआ दुख सतह पर आ गया है।
कहीं कोई पुरानी याद धुंध से निकल आई है।
बेग़म अख़्तर की आवाज़ वह दवा है जो जख्म दिखाती भी है और मरहम भी रख देती है।

वे क्यों थीं?
क्योंकि भारतीय संगीत में एक जगह खाली थी—दर्द की।
जिस पर कोई राज नहीं कर पाया।
और बेग़म अख़्तर ने उस दर्द को अपना साम्राज्य बना लिया।

वे आज भी क्यों हैं?
क्योंकि उनकी आवाज़ ने समय पर ठहराव की मुहर लगा दी।
क्योंकि उनका सुर सदी नहीं, दिल में बसता है।
क्योंकि उनकी ग़ज़लें आज भी उतनी ही ताज़ा, उतनी ही नम, उतनी ही चुभनभरी हैं जितनी उनके जीवन में थीं।

बेग़म अख़्तर चली गईं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी धड़कनों में उतरती है—
और हर ग़ज़ल सुनकर दिल कहता है—
“कुछ लोग सचमुच मरते नहीं… सुर बनकर रह जाते हैं।”

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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