प्रकृति के पास भाषा है—पूरी की पूरी प्रकृति के पास। लेकिन यह भाषा वैसी नहीं है जैसी हम मनुष्य समझते हैं। हमारे यहाँ शास्त्रों ने भाषा को तीन रूपों में पहचाना—एक वाणी की भाषा, जिसे हम बोलते हैं; दूसरी संकेतों की भाषा, जो इशारों, मुद्राओं और संकेतों से चलती है; और तीसरी स्पर्श की भाषा, जो छूने से, महसूस करने से, निकटता से जन्म लेती है। गूंगा भी बोलता है, अंधा भी संवाद करता है—बस उनका माध्यम अलग होता है। हर भाषा का अपना बल है, अपनी क्षमता है, अपनी सीमा है। पशु-पक्षियों के बीच जो संवाद चलता है, वह प्रायः संकेतों की भाषा है। उनके पास हमारी तरह की भाषा नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके पास संवाद नहीं है। कौआ कौए की आवाज़ समझता है, गिद्ध नहीं। पक्षियों की चहचहाहट, जानवरों की चेतावनी-ध्वनियाँ—सब कुछ एक प्रकार की कोडिंग है। जंगल में बंदर और हुदहुद जैसे जीव आपस में तालमेल रखते हैं; शेर के आने पर एक अलग संकेत, साँप के आने पर दूसरा। यह सब भाषा है—लेकिन हमारे संदर्भ में नहीं। हम मनुष्य भाषा उसी को कहते हैं जिसके पास अपना साहित्य हो, अपना अनुशासन हो, अपनी लिपि हो, अपना क्रम हो। जिसके पास साहित्य नहीं, वह बोली है, ज़बान है, संवाद है—भाषा नहीं।
भाषा वही है जिसमें अनुभव संरक्षित किए जा सकें, पीढ़ियों तक पहुँचाए जा सकें, क्रमबद्ध किए जा सकें। जब मैं “नदी” कहता हूँ, तो वह शब्द तभी अर्थपूर्ण होता है जब आप मेरी भाषा से जुड़े हों। अगर बचपन में किसी ने आपको बहते पानी को “नदी” कहकर दिखाया है, तभी आपके मस्तिष्क में वह दृश्य उभरता है। नहीं तो मैं नदी चिल्लाता रहूँ और आप प्यास—हम दोनों मदद करना चाहते हैं, लेकिन भाषा अलग होने के कारण एक-दूसरे को नुकसान पहुँचा बैठते हैं। पूरी दुनिया में झगड़े इसी वजह से होते हैं—हर कोई अपनी भाषा में समस्या कह रहा है, दूसरा अपनी भाषा में समाधान दे रहा है। मदद भी दरअसल तभी नुकसान बनती है, जब वह विचार-विमर्श, पोस्टरबाज़ी और प्रचार में बदल जाती है। जेब से तुरंत निकला पैसा मदद है; फेसबुक पोस्ट, पेटीएम क्यूआर और सेल्फी के बाद दिया गया पैसा व्यवसाय है। प्रकृति में कोई मदद करने में रुचि नहीं रखता। शेर हिरण को मारता है, बगल वाला हिरण चुपचाप घास चरता हुआ निकल जाता है। भैंसे चाहें तो शेरों को कुचल दें, लेकिन वे संगठन नहीं बनातीं। शेर जानता है—संगठन को तोड़ो, तभी शिकार मिलेगा। मज़ेदार यह है कि संगठन अक्सर मूर्ख लोग बनाते हैं, इसलिए उन्हें तोड़ना आसान होता है। यहीं से भाषा की असली शक्ति शुरू होती है। प्रकृति के पास अनुभव हैं, लेकिन अनुभवों का संचय नहीं। जानवर चालाक होते हैं, लेकिन अपनी चालाकी को अगली पीढ़ी तक भाषा में पहुँचा नहीं पाते। अगर ऐसा होता, तो हर बंदर टोपी वाली कहानी से सीख चुका होता। लेकिन भाषा न होने के कारण हर पीढ़ी वही गलती दोहराती है। मनुष्य ने यहीं बाज़ी मार ली।
मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार पहिया नहीं था—वह शब्द था। पहिया जीवन को चलाता है, लेकिन शब्द जीवन को समझाता है। अग्नि ने मनुष्य को आगे बढ़ाया, चक्र ने गति दी, लेकिन शब्द ने मनुष्य को मनुष्य बनाया। “शब्द ब्रह्म” इसलिए कहा गया, क्योंकि शब्द ने अनुभव को अभिव्यक्ति दी और संरक्षण भी। भावनाओं का एक्सप्रेशन तो सभी के पास है—कुत्ता, बिल्ली, तोता, मच्छर तक। लेकिन कोई जानवर अपनी आत्मकथा नहीं लिख सकता। अगर जानवरों की आत्मकथाएँ आने लगें, तो इतिहास रातों-रात बदल जाएगा। शेरखान अचानक हत्यारा घोषित हो जाएगा, शिकारी अपराधी, और जंगल में मानवाधिकार आयोग खुल जाएगा। लेकिन जानवरों के पास शब्द नहीं हैं, इसलिए उनका इतिहास कोई और लिखता है। शब्द ने मनुष्य को यह ताक़त दी कि वह अपने अनुभव को बचा सके। एक बार अगर किसी का हाथ तवे से जल गया, तो अगली पीढ़ी को जलाने की ज़रूरत नहीं पड़ी—उसने शब्दों में चेतावनी दे दी। यही से विकास शुरू हुआ। अनुभव जमा हुए, उदाहरण बने, उदाहरणों से तर्क जन्मा। तर्क कोई जादू नहीं है—एक उदाहरण पर दूसरा उदाहरण रख देना ही तर्क है। इसलिए मनुष्य की बातचीत का 90 प्रतिशत हिस्सा उदाहरणों से भरा होता है। जिसके पास जितने ठोस उदाहरण, वह उतना बड़ा तर्कशास्त्री। जब तर्क आया, तो निर्णय आया। निर्णय से न्याय जन्मा। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि मनुष्य का न्याय कभी पूर्ण सत्य नहीं होता—वह सिर्फ़ तर्क की जीत होता है।
अदालत न्यायालय नहीं, तर्कालय होती है। जिस वकील ने बेहतर तर्क रख दिया, वही जीत गया। न्याय उधर ही चला जाता है—या खोपड़ी में, या जेब में। फिर न्याय का संग्रह हुआ, विधियाँ बनीं। जहाँ विधान बना, वहाँ राज्य बना। जहाँ राज्य बना, वहाँ सभ्यता बनी। सभ्यता से संस्कृति आई, संस्कृति से संप्रदाय, और अंत में मज़हब। लेकिन शुरुआत में—सिर्फ़ भाषा थी। भाषा ने हमें मनुष्य बनाया, सभ्य बनाया, संस्कृत किया। भाषा के बाहर मनुष्य कुछ भी नहीं है। अगर मनुष्य से भाषा छीन ली जाए, तो वह फिर वही पशु रह जाएगा—संकेतों में जीने वाला, स्मृति से वंचित, इतिहासहीन। इसलिए भाषा सिर्फ़ संवाद नहीं है—वह शक्ति है। वह स्मृति है। वह भविष्य है। भाषा के बिना न तर्क है, न न्याय, न राज्य, न सभ्यता। और शायद यही वजह है कि भाषा का संकट दरअसल मनुष्यता का संकट है।
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