“मंच पर माला किसे मिले – माला समिति की महागाथा”
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निमंत्रण देते समय आयोजक ने कहा, “आपको बस दो शब्द बोलने हैं।”
मैंने कहा, “ज़रूर आऊँगा। लेकिन देखिए, मेरे लिए माला-वाला का इंतज़ाम मत कीजिएगा।”
वह बोला, “जी, बिल्कुल।”
उसने इतनी जल्दी मेरी बात मान ली कि मुझे वहीं अपनी विनम्रता पर पछतावा होने लगा। कम से कम एक बार तो कहता, “अरे, ऐसा कैसे हो सकता है!”
समारोह में पहुँचा तो मंच के पीछे बड़ा-सा बैनर लगा था—‘स्वागत एवं सम्मान समारोह’। सामने की कुर्सियाँ ख़ाली थीं, लेकिन मंच की कुर्सियों पर रूमाल पड़ चुके थे। मंच पर भी बस और ट्रेन की तरह कुर्सियाँ आरक्षित की जा चुकी थीं। मैंने भी एक किनारे की कुर्सी पर अपना चश्मे का डिब्बा रख दिया। आदमी को अपनी जगह बनाने में बरसों लगते हैं। चश्मे के डिब्बे को दो सेकंड लगे।
तभी परदे के पीछे से कुछ खुसुर-पुसुर की आवाज़ आई, “माला किस-किस को पहनानी है?”
आयोजन की तारीख़, बजट और मुख्य अतिथि का फैसला जिस बैठक में दस मिनट में हो गया था, उसी आयोजन का यह सवाल आधे घंटे से अटका पड़ा था। यक्ष ने युधिष्ठिर से यह सवाल पूछा होता तो शायद युधिष्ठिर इस यक्षप्रश्न का जवाब हरगिज़ नहीं दे पाते। युधिष्ठिर कहते, “माला किसे मिले, किसे नहीं… आप मुझे इस बात से धर्मसंकट में डाल रहे हैं। मैं भाइयों के बीच पक्षपात कैसे करूँ?”
ख़ैर, संस्थाएँ इस सवाल के लिए बाक़ायदा माला समिति बनाती हैं। यहाँ भी परदे के पीछे उन्हीं सदस्यों का गहन विचार-विमर्श चल रहा था। ये तीन सदस्य बाहर मुझे घूरते नज़र आए थे, तब पहली नज़र में मैंने उन्हें चायवाला समझ लिया था। बाद में पता चला, मंच पर कौन बैठा रहेगा और कौन माला पहनकर नीचे आ जाएगा, इसका फैसला उन्हीं के हाथ में था। चायवाला तो बेचारा सबको बराबर चाय दे रहा था।
मैं पानी पीने के बहाने परदे के पास खड़ा हो गया। भीतर एक सदस्य कह रहा था, “शर्मा जी को माला मत देना। पिछली बार बीच कार्यक्रम में उठकर चले गए थे।” दूसरे ने कहा, “इसीलिए तो इस बार उनकी माला आख़िर में रखो। बैठे रहेंगे।” शर्मा जी का पत्ता कटते देखकर मेरी गर्दन थोड़ी और लंबी हो गई। शायद एक माला इसमें भी पड़ जाने की संभावनाएँ प्रबल हो चुकी थीं।
वर्मा जी के नाम पर सब सहमत थे। उन्होंने चाय-पानी का पूरा इंतज़ाम किया था। उनके लिए दो मालाएँ निकलीं। गुप्ता जी का मामला और साफ़ था। वे सिर्फ़ फोटो खिंचाने आते थे। तय हुआ कि उन्हें शुरुआत में ही माला पहना दी जाए। पिछली बार बेचारे को फोटो के लिए पूरा स्वागत भाषण सुनना पड़ा था।
फिर मेरा नाम आया। एक ने पूछा, “डॉक्टर साहब का क्या करें?”
दूसरा बोला, “इन्होंने ख़ुद मना किया है। ये माला वैसे भी साथ ही ले जाते हैं। ऐसा जोखिम नहीं ले सकते।”
मैंने गिलास ज़रा ज़ोर से रखा। समिति ने समझा, पानी ख़त्म हो गया है। एक सदस्य ने बड़ी तत्परता से मेरा गिलास फिर भर दिया।
कार्यक्रम शुरू हुआ। संचालक ने कहा, “अब मैं आमंत्रित करता हूँ…” और परदे के पीछे ऐसी दौड़ मची जैसे मोर्चे पर रसद पहुँचाई जा रही हो। एक सज्जन माला लाए, दूसरे ने अतिथि को झुकाया, तीसरे ने माला का जोड़ पीछे किया। अतिथि सीधे हुए तो फ़ोटोग्राफ़र बोला, “सर, एक बार फिर झुकिए। पहनाते हुए चाहिए।” माला उतरी, फिर चढ़ी। इस बार पहनाने वाले ने ख़ुद फ़ोटोग्राफ़र को टोका, “भाई, मुझे भी पूरा लेना।” अतिथि का आधा चेहरा आया। सम्मान देने वाले पूरे आए। माल्यार्पण का शिष्टाचार पूरी तरह निभाया गया।
इसी भागदौड़ में एक सज्जन को भूल से दो मालाएँ पड़ गईं। पहली पर उन्होंने हाथ जोड़े थे। दूसरी पर सिर्फ़ गर्दन झुकाई, जैसे समिति को आख़िरकार अपनी भूल समझ में आ गई हो। एक सदस्य उनकी तरफ़ बढ़ा भी, शायद दूसरी माला वापस लेने। सज्जन ने दोनों मालाएँ दोनों हाथों से सँभाल लीं। सदस्य ने वहीं से हाथ जोड़ दिए। मंच पर हर ओछी हरकत का एक सम्मानजनक अर्थ निकल सकता है, बशर्ते समय पर हाथ जुड़ जाएँ।
मेरी बारी आई तो मैंने दो शब्दों के आग्रह का पूरा मान रखा। पहले शब्द पर बोलने में चार मिनट लगे, दूसरे पर छह। दो बार अच्छी तालियाँ भी बजीं। तालियों की गूँज से मुझे लगा कि अब कोई माला लेकर आएगा। मैं माइक के सामने थोड़ा झुक भी गया। संचालक ने समझा कि माइक नीचा है। उसने उसे ऊपर कर दिया।
बोलकर लौटा तो मेरा चश्मे का डिब्बा कुर्सी से हटकर सामने मेज़ पर आ गया था। कुर्सी पर गुप्ता जी थे। उन्होंने डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया और बोले, “डॉक्टर साहब, ज़रा मेरी एक फोटो खींच दीजिए। दोनों मालाएँ दिखनी चाहिए।” उनकी अपनी एक ही थी। दूसरी उन्होंने बगल वाले सज्जन से फोटो भर के लिए उधार ली थी। मैंने फोटो खींची। इस बार सम्मान देने वाला तस्वीर से पूरी तरह बाहर था।
आख़िर में संचालक ने परदे की तरफ़ देखा। उधर से किसी ने ख़ाली थैली उलटकर दिखाई। संचालक ने उसी क्षण कार्यक्रम समेटा और बड़ी आत्मीयता से कहा, “शेष अतिथियों को हम मन से माला पहनाते हैं।” मैंने गर्दन सीधी रखी। मन की माला के लिए बार-बार झुकने की ज़रूरत नहीं पड़ती। बजट में भी उसका हिसाब बड़ी आसानी से बैठ जाता है।
घर पहुँचा तो श्रीमती जी ने पूछा, “कैसा रहा सम्मान?”
मैंने कहा, “बहुत अच्छा। मुझे तो उन्होंने मन से माला पहनाई।”
“अच्छा! और गुप्ता जी को?”
“दो,” मैंने फ़ौरन कहा। फिर अपनी तरफ़ से सफ़ाई दी, “हालाँकि उनमें से एक उधार की थी।”
श्रीमती जी ने मेरी तरफ़ देखा। “तुम तो माला लेने गए ही नहीं थे। तुम्हें उधार वाली का भी पता है?”
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