नवराष्ट्रवाद : भावना की 5G स्पीड वाला देशप्रेम
“नवराष्ट्रवाद वह चूर्ण है जिसमें दो चुटकी डालते ही कोई भी बहस राष्ट्रभक्ति की आँच पर तवे की तरह लाल हो जाती है।” “आजकल सवाल पूछना विचार नहीं, ‘कौन भेजा तुम्हें’ परीक्षा का पहला प्रश्नपत्र बन गया है।”
“नवराष्ट्रवाद वह चूर्ण है जिसमें दो चुटकी डालते ही कोई भी बहस राष्ट्रभक्ति की आँच पर तवे की तरह लाल हो जाती है।” “आजकल सवाल पूछना विचार नहीं, ‘कौन भेजा तुम्हें’ परीक्षा का पहला प्रश्नपत्र बन गया है।”
कला का ब्रह्मांड जहाँ खत्म होता है, समोसा वहीं से अपना दर्शन शुरू करता है—तीन कोनों में आत्मा, पदार्थ और ऊर्जा समाहित।” “यूरी मायस्को ने शायद संगमरमर देखने से पहले भारतीय कैंटीन का समोसा खाया होगा—नहीं तो ‘ट्रिनिटी’ इतनी भूख-भरी क्यों बनती?” “संगमरमर की मूर्ति प्रकाश पकड़ती है, और समोसा हमारे दिल… और पेट।” “अगर इस देश की असल त्रिमूर्ति कोई है, तो वह तेल, आलू और मैदा है—बाकी सब कलात्मक विस्तार हैं।”
“व्यंग्य हँसाने की कला नहीं, हँसी के भीतर छुपी बेचैनी को जगाने की कला है। वह पल जब मुस्कान के बाद एक सेकंड की चुप्पी उतरती है—वही असली व्यंग्य है।” “व्यंग्यकार हर दृश्य को तिरछी आँख से देखता है—क्योंकि सीधी आँख से देखने पर आजकल सब कुछ सामान्य लगने लगा है, और यही सबसे असामान्य बात है।”
आज गीता जयंती है—वह दिन जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जन्मा कृष्ण का अमर संदेश मानवता को मार्ग दिखाता है। भय, दुविधा और मोह से जूझते अर्जुन को मिला यह उपदेश आज भी हर मनुष्य के भीतर के संघर्ष को दिशा देता है। गीता केवल ग्रंथ नहीं, जीवन का शाश्वत प्रकाश है।”
“डा. रामकुमार जोशी की यह व्यंग्यात्मक आत्मकथा सड़कों की भीड़ से ज्यादा वैवाहिक भीड़भाड़ की कहानी कहती है। सड़क पर दिखी ‘अज्ञात मोहतरमा’ ने एक क्षण को ड्राइविंग भी भुला दी और विवेक भी। पत्नी की तिरछी नजर, इश्क का भूत, भीड़ का षड्यंत्र और नंबर प्लेट खोजने की जद्दोजहद—यह पूरा प्रसंग पति-पत्नी मनोविज्ञान पर एक बेहतरीन, हंसोड़ टिप्पणी है, जिसमें इश्क भी है, रश्क भी और भारतीय दांपत्य की शाश्वत नोकझोंक भी।”
“समोसा सिर्फ नाश्ता नहीं—भारतीय समाज, राजनीति और प्रेमकथाओं का सबसे स्थायी त्रिकोण है। डॉक्टर से लेकर दफ़्तर और दाम्पत्य तक, हर मोड़ पर यह तला-भुना फल अपना प्रभाव दिखाता है। बर्गर रोए या बाबू सोए—पर समोसा आए तो सब जग जाएं! यही है समोसे का सार्वभौमिक सत्य।”
“पुरुष सूक्त हमें बताता है कि ब्रह्मांड कोई जड़ मशीन नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रेक्षक की चेतना में जागता हुआ दृश्य है, जिसके ‘सहस्र सिर’ अनगिनत जीवों की आँखों से दुनिया को देख रहे हैं।” “जैसे ही प्रेक्षक देखता है, संभावनाएँ ठोस रूप ले लेती हैं — यही वह दार्शनिक सेतु है जो क्वांटम भौतिकी और संख्य दर्शन को जोड़ता है।” “वेदांत का पुरूष कहता है — ब्रह्मांड 25% दृश्य, 75% अदृश्य है; और यह अदृश्यता ही चेतना का विशाल क्षेत्र है जहाँ से प्रकृति अपनी अभिव्यक्ति पाती है।” “सृष्टि तब जन्म लेती है जब चेतना प्रकृति को ‘देखती’ है — वही क्षण है जहाँ विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म एक बिंदु बनकर खड़े हो जाते हैं।”
“जब कुछ भी नहीं था—न आकाश, न पृथ्वी—तब भी एक चमकता बीज था, ‘हिरण्यगर्भ’। यही वह आदिम स्वर्ण-कोष है, जहाँ ब्रह्मांड समय और स्थान बनने से पहले ही संभावनाओं की तरह छिपा पड़ा था, और जहाँ से सृष्टि की पहली धड़कन जन्मी।”
“सिनेमाघर कभी मनोरंजन का देवालय था, जहाँ चाय-कुल्फी की आवाजें, तंबाकू की पिचकारियाँ, आगे की सीटों की रुई निकालने की परंपरा और इंटरवल का महाभारत—सब मिलकर एक सामूहिक उत्सव बनाते थे। वह जमाना गया, जब फिल्में हमें हमारी रियलिटी से कुछ पल उड़ा ले जाती थीं।”
युद्ध का इतिहास दरअसल मनुष्य नहीं, तकनीक की कहानी है। नरमार की भोथरी गदा से लेकर ड्रोन, AI, सैटेलाइट और हाइपरसोनिक मिसाइलों तक—हर दौर में विजेता वही बना जिसने दूर से, सस्ते में और सुरक्षित प्रहार करने की कला सीख ली। युद्धभूमि बदल चुकी है, हम अब भी पुराने सपनों में अटके हैं।