डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 18, 2025
व्यंग रचनाएं
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लोकतंत्र आश्वासनों पर टिका है, जहाँ हर पार्टी का घोषणा-पत्र वादों का कठपुतली शो होता है। जनता वोट रूपी टिकट से यह खेल देखती है, अपनी गरीबी और भुखमरी के बावजूद। नेतागण पांच साल में एक बार उन्हें खास महसूस कराते हैं, जिससे सरकारें बनती हैं। आश्वासन बाहर से मिलें या अंदर से, यही सरकार के गठन का आधार है। जनता भी आश्वासन की घुट्टी चाहती है, चाहे नेताओं से मिले या बाबाओं से, क्योंकि "अच्छे दिन" का यही आश्वासन है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 16, 2025
Blogs
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इस रचना में किराएदार की ज़िंदगी की उन अनकही व्यथाओं को हास्य और व्यंग्य के लहज़े में उजागर किया गया है, जिन्हें हम सभी कभी न कभी भुगत चुके हैं। मकान मालिक की एक्स-रे दृष्टि, दूध की बाध्यता, रद्दी की एफडी और ‘बेटे समान’ किराएदार बनने की त्रासदी — सबकुछ इतने रोचक ढंग से बुना गया है कि हँसी के साथ एक टीस भी उभरती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 16, 2025
हिंदी लेख
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महर्षि वाल्मीकि और क्रौंच पक्षी का ऐतिहासिक प्रसंग
संस्कृत साहित्य में भावनात्मक संवेदना का महत्व
कालिदास की काव्य कृतियों का मूल्य और समकालीन साहित्य
साहित्य का उद्देश्य और संवेदनशीलता
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 15, 2025
व्यंग रचनाएं
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बाढ़ आई नहीं कि सरकारी महकमें ‘आपदा प्रबंधन’ में ऐसे सक्रिय हो गए जैसे ‘मनौती’ पूरी हो गई हो। नदी उफनी नहीं कि पोस्टर लग गए, हेलिकॉप्टर उड़ गए, और राहत की थैलियाँ गिरने लगीं। मगरमच्छ तक घरों में घुस आए और मंत्रीजी बोले—“हर घर नल-जल योजना अब पूरी हो चुकी है।” प्रेस कांफ्रेंस में ठंडा पिलाकर सवाल बंद करवाना ही शायद सरकार का असली राहत प्रबंधन है।
Pradeep Audichya
Jul 14, 2025
व्यंग रचनाएं
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सेठजी को अब ‘सेठ’ होने से संतोष नहीं, उन्हें ‘समाजसेवी’ भी बनना है—वो भी बिना समाज की सेवा किए! अखबार, होर्डिंग, माला और माइक की व्यवस्था है, गाय तक बुलवाई गई है फोटो के लिए। जीवन पर प्रकाश डालते मास्टर साहब बिजली चोरी, मंदिर पर कब्ज़ा और गरीबों की "सुरक्षा" के किस्से खोल देते हैं। मुनीम तुरंत टोका — “अब ज्यादा प्रकाश ठीक नहीं है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 14, 2025
संस्मरण
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हॉस्टल की 'थ्रिल भरी' दुनिया से निकली एक रोमांचक रेल यात्रा की कहानी, जहाँ एक मेडिकल छात्र पुरानी आदतों के नशे में बिना टिकट कोटा पहुँचने की जुगत भिड़ाता है। कभी पचास के खुले न मिलने की मजबूरी, कभी टीटी से आँख-मिचौली, तो कभी जनरल डिब्बे में ‘इंच भर की सीट’ पर संतुलन साधना — हर दृश्य हास्य से लबरेज़ है। डर की कई 'किश्तों' के बीच चलती ट्रेन में 'किक' का अहसास, और आखिर में स्टेशन पर छलांग मारकर जीत का रोमांच। एक बेधड़क, बेपरवाह, लेकिन दिलचस्प रेल यात्रा — सिर्फ़ व्यंग्य की भाषा में!
Prahalad Shrimali
Jul 13, 2025
व्यंग रचनाएं
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मुंगेरीलाल केवल एक चरित्र नहीं, हर आम आदमी की अंतरात्मा है जो कठिन यथार्थ के बीच भी सुनहरे सपने देखता है। वह न पाखंडी है, न अवसरवादी—बल्कि एक ऐसा मासूम है जो बिना किसी प्रचार के देश की खुशहाली का सपना पालता है। उसकी दुनिया रंगीन जरूर है, लेकिन अहिंसक, नेकनीयत और हानिरहित है। ऐसे मुंगेरीलाल देश पर बोझ नहीं, बल्कि भावना के सच्चे वाहक हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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गुरु अब ज्ञान के प्रतीक नहीं, शॉर्टकट और टिप्स देने वाले बाज़ारू ब्रांड बन चुके हैं। चेला बनना खतरे से खाली नहीं, क्योंकि हर चेला गुरु बनने की फिराक में है। गुरु-शिष्य परंपरा अब कोर्ट-कचहरी, दलाली, और सट्टे की दुनिया में ‘गुरु मंत्र’ से ज़्यादा ‘टिप्स मंत्र’ में बदल चुकी है।
Sunil Jain Rahee
Jul 8, 2025
व्यंग रचनाएं
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जब देव सोते हैं तो देश की नींव भी ऊंघने लगती है। जनता, बाबू, साहब और चपरासी सब अपनी-अपनी तरह से नींद का महिमामंडन करते हैं। जागने की ज़िम्मेदारी बस सेना और कुछ अदृश्य प्रहरी निभाते हैं। इस नींद में सत्ता फलती है, और जनहित सो जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 8, 2025
व्यंग रचनाएं
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ए.आई. अब सिर्फ इंटेलिजेंस नहीं, अब वह 'आई' भी है! तकनीक की इस नई छलांग में अब प्रेम, गर्भ और पालन-पोषण भी कोडिंग से संभव है। रोबोट अब लैब में पालना झुला रहे हैं और इंसान हैरत से देख रहे हैं — यह भविष्य है या व्यंग्य! इस लेख में तकनीक और परवरिश का अद्भुत संगम दिखाई देता है — मानो ‘माँ’ अब मशीन बन गई हो।