डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 17, 2026
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डॉ. मुकेश असीमित का व्यंग्य संग्रह “गिरने में क्या हर्ज़ है” समकालीन समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करता है। वरिष्ठ व्यंग्यकार श्रवण कुमार उर्मलिया की यह समीक्षा न केवल इस संग्रह की साहित्यिक शक्ति को उजागर करती है, बल्कि व्यंग्य लेखन के मूल तत्वों और उसकी सामाजिक भूमिका पर भी गहन दृष्टि प्रस्तुत करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 22, 2026
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आनंदमठ केवल एक कथा नहीं, एक चेतना है—जहाँ भूख विद्रोह को जन्म देती है, भक्ति शक्ति में बदल जाती है और मातृभूमि एक भाव नहीं, एक पुकार बन जाती है। बंकिमचंद्र का यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल मानचित्र नहीं, त्याग और तपस्या से निर्मित एक जीवित अनुभव है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 20, 2026
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हम दुर्गा सप्तशती को अक्सर केवल पूजा का ग्रंथ मानते हैं, लेकिन यह हमारे भीतर चल रहे संघर्षों की कथा है। मधु-कैटभ से लेकर रक्तबीज तक—हर असुर हमारे मन के किसी विकार का प्रतीक है, और देवी वह चेतना है जो हमें इनसे मुक्त करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 8, 2026
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यह भूमिका लेखक के आत्म-व्यंग्य, समाज से संवाद और व्यंग्य की सीमाओं पर एक चुटीला दार्शनिक वक्तव्य है। लेखक गंभीरता के पारंपरिक आग्रह को चुनौती देता हुआ बताता है कि व्यंग्य का उद्देश्य न तो अंतिम सत्य देना है, न उपदेश—बल्कि मुस्कान के बीच सोच का एक क्षण पैदा करना है। पुस्तक, पाठक और समाज—तीनों के बीच चलने वाली इस शाश्वत गलतफहमी को लेखक ने हल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 5, 2026
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‘बाराखड़ी’ केवल व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की वर्णमाला है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी अपने तीखे लेकिन संतुलित व्यंग्य के माध्यम से पाठक को हँसाते नहीं, बल्कि सोचने को विवश करते हैं।
इस समीक्षा में ‘लड़की का बाप’, ‘घोटालाटूर’, ‘खाली देगची और भूखी पंगत’, ‘गरीबी हटेगी’, ‘पहचान हो तो ठीक रहता है’ जैसी रचनाओं के चयनित उद्धरणों के सहारे यह दिखाने का प्रयास है कि कैसे लेखक हास्य को साधन बनाकर गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं।
यह संग्रह पाठकों के साथ-साथ व्यंग्यकारों के लिए भी एक पाठशाला की तरह है, जहाँ शिल्प, संवेदना और सरोकार का संतुलन सीखने को मिलता है। ‘बाराखड़ी’ आज के समय को समझने के लिए एक अनिवार्य व्यंग्य-पाठ है।
Vivek Ranjan Shreevastav
Jan 30, 2026
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यह पुस्तक भारत के उस आदिवासी राबिनहुड की कथा है, जिसने जंगलों से निकलकर अंग्रेजी सत्ता और जमींदारी शोषण को खुली चुनौती दी।
टंट्या मामा केवल योद्धा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी जननायक थे, जिनका जीवन जल-जंगल-जमीन के संघर्ष को समर्पित रहा।
उपन्यास आदिवासी समुदाय की सामूहिक चेतना, साहस और न्यायप्रियता को सरल, रोचक और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 22, 2025
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समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है।
यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है।
जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है।
डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है।
यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 29, 2025
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“विवेक रंजन श्रीवास्तव की ‘व्यंग्य—कल, आज और कल’ हिंदी व्यंग्य को एक गंभीर, बहुस्तरीय और विश्लेषणात्मक विधा के रूप में स्थापित करती है। यह पुस्तक बताती है कि व्यंग्य केवल हँसी की सतह नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की गहरी परतों तक जाने वाली विचार-शक्ति है, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों को जोड़ती है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 17, 2025
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संघ-साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मसंयम और सेवा की जीवंत साधना है। यह परंपरा के मौन और आधुनिकता के संवाद के बीच बहने वाला विचार-सरोवर है, जिसमें हर पन्ना अनुशासन की साँस लेता है। यह नारा नहीं देता, विचार बोता है; विरोध को अस्वीकार नहीं करता, उसे आत्मसात करता है। यही साहित्य संघ की वह आत्मा है, जो शब्दों से कर्म तक, और कर्म से विचार तक अपना चक्र पूरा करती है — निरंतर, भारतीय और जीवंत।
Mahadev Prashad Premi
Sep 17, 2025
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यह संग्रह पाठकों को समर्पित है—उन सभी साहित्यप्रेमियों को, जो कविता को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर जीवन-सत्य का आईना समझते हैं। प्रस्तुत संकलन “महादेव प्रसाद ‘प्रेमी’ की कुण्डलियाँ” उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें छंद की गेयता और लय के माध्यम से नीति, हास्य, व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ का सहज चित्रण हुआ […]