व्यंग्य की बाराखड़ी : समय, संवेदना और सच की वर्णमाला

व्यंग्य की बाराखड़ी : समय, संवेदना और सच की वर्णमाला
पुस्तक नाम –बाराखडी
लेखक- ज्ञान चतुर्वेदी
प्रकाशक –राजपाल एंड संस
पुस्तक मूल्य एमआरपी- ३९5/- पेपर बेक-amazon पर डिस्काउंट पर उपलब्ध

समकालीन हिन्दी व्यंग्य-जगत में यदि किसी नाम ने निरंतर अपनी वैचारिक दृढ़ता, भाषिक कौशल और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण विशिष्ट पहचान बनाई है, तो वे हैं डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी। बारामासीनरक यात्रामरीचिका जैसे चर्चित व्यंग्य-उपन्यासों के रचयिता और साहित्य में विशिष्ट सेवा के लिए पद्मश्री (2015) से सम्मानित डॉ. चतुर्वेदी का यह नया व्यंग्य-संग्रह ‘बाराखड़ी’ वस्तुतः हमारे समय की व्याकरणिक, नैतिक और वैचारिक उलझनों की वर्णमाला है।

‘बाराखड़ी’ केवल पाठकों के लिए नहीं, बल्कि हम जैसे व्यंग्यकारों के लिए भी व्यंग्य की पाठशाला है। यह संग्रह बताता है कि व्यंग्य का कलेवर कैसा हो, उसमें शिल्प और सरोकार का संतुलन कैसे साधा जाए, और यह भी स्पष्ट दर्शाता है कि संवेदना के बिना व्यंग्य सपाट हो जाता है। हास्य यहाँ उद्देश्य नहीं, साधन है—जो रचना को रोचक बनाता है; पर हर रचना किसी न किसी उद्देश्य, प्रश्न और हस्तक्षेप के साथ उपस्थित होती है।

पुस्तक की भूमिका ‘भूमिका जैसा कुछ’ केवल औपचारिक प्रवेश नहीं, बल्कि लेखक की आत्मालोचनात्मक दृष्टि और समय से जूझते व्यंग्यकार की मानसिकता का घोष है। इक्कीसवीं सदी की जटिलताओं—तेजी से बदलती दुनिया, बाज़ारवाद, मीडिया, राजनीति, प्रशासन और सामाजिक जीवन की विसंगतियों—को लेखक जिस ईमानदारी से दिखातेहैं , वही दृष्टि आगे की रचनाओं का वैचारिक आधार बनती है।

संग्रह की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक है। ‘खाली दिमाग और भूखी पंगत’‘चोर की साहूकारी’‘भ्रष्टाचार का बीज’‘भारतीय पुलिस की छठी इंद्रिय’‘मार्केट के बाहर भी दुनिया है’‘परीक्षा की घड़ी’‘गरीब के आँसू’ जैसी रचनाएँ बताती हैं कि लेखक की दृष्टि केवल सत्ता-तंत्र तक सीमित नहीं, बल्कि आम आदमी की रोज़मर्रा की त्रासदियों, विडंबनाओं और विवशताओं तक जाती है। यहाँ व्यंग्य प्रहार करता है—उस पर जो हमें सामान्य, स्वाभाविक या ‘नॉर्मल’ लगता है, पर भीतर से सड़ा हुआ है।

यह भी उल्लेखनीय है कि संग्रह की कुछ रचनाएँ पाठकों को पहले पत्र-पत्रिकाओं या स्तंभों में पढ़ी हुई लग सकती हैं—विशेषकर ‘बाराखड़ी’ नाम से प्रकाशित साप्ताहिक व्यंग्य-स्तंभ की रचनाएँ। किंतु इस संग्रह में वे नए कलेवर, नए क्रम और नए संदर्भ में पुनः पाठक को गुदगुदाती और विचलित करती हैं। यह पुनर्पाठ का सुख है—जहाँ परिचित व्यंग्य भी नए अर्थ रचता है।

यूं तो ‘बाराखड़ी’ की प्रत्येक रचना अपने-आप में व्यंग्य का एक सम्पूर्ण अध्याय है। फिर भी कुछ रचनाओं को मैं यहाँ सैंपल के तौर पर उद्धरणों के सहारे रख रहा हूँ—मेरी समझ के अनुसार, जिनकी व्याख्या मैं कर सकता हूँ। शेष संग्रह आप पढ़ेंगे तो तभी आप जान पायेंगे ।

1) लड़की का बाप

रचना पितृसत्ता के उस मौन अपराधबोध को उजागर करती है, जो समाज में लड़की के जन्म के साथ ही पिता के कंधों पर लाद दिया जाता है।

“लड़की का बाप होना जैसे अपने-आप में माफी माँगता हुआ व्यक्तित्व हो।”
एक सवाल करती हुई रचना —जो समाज बेटी को लक्ष्मी कहता है, वही पिता को अपराधी क्यों ठहराता है? यह रचना संवेदना और आक्रोश का संतुलित शिल्प है।

2) घोतालातुर

हमारे समय की नैतिक उलटबाँसी का घोषणापत्र कह सकते है।

“ईमानदारी अब व्यक्तिगत शौक है, घोटाला सामूहिक कर्तव्य।”
व्यंग्य यहाँ सीधे कहता है—यदि सब कर रहे हैं, तो न करना असामान्य है। लेखक ‘शरीफ’ होने की सामाजिक कीमत पर तीखा प्रहार करता है।

3) खाली देगची और भूखी पंगत

राजनीति के रसोईघर में पकते बयान-भोजन पर यह तीखी टिप्पणी है।

“देगची खाली है, पर बयान भरपूर हैं।”
जाहिर है कैसे शब्दों से पेट भरने की कोशिश की जाती है—और भूख को देशभक्ति के मसाले में ढक दिया जाता है।

4) गरीबी हटेगी

यह रचना सरकारी शब्दावली और जमीनी यथार्थ के बीच की खाई को नापती है।

“गरीबी गई नहीं, घोषणा के नीचे दब गई।”
यहाँ गरीब खुद अपने ‘गरीब’ होने का सबूत देने को मजबूर है—एक करुण लेकिन सटीक विडंबना।

5) केच यही है!

काले धन और सामाजिक स्वीकार्यता पर यह रचना सबसे नंगी सच्चाई कहती है।

“पकड़े जाने का डर न हो, तो पाप भी प्रतिष्ठा बन जाता है।”
नैतिकता के बाजारूकरण की शिनाख्त करता हुआ ।

6) मैं नास्तिक क्यों हो रहा हूँ?

यह नास्तिकता नहीं, आडंबर-विरोध की रचना है।

“ईश्वर से नहीं, उसके ठेकेदारों से दिक्कत है।”
व्यंग्य आस्था का अपमान नहीं करता, बल्कि उसके व्यवसायीकरण पर सवाल उठाता है।

ऐसे ही एक वाक्य लें -“बड़ा आदमी आते ही कुर्सियाँ सीधी हो जाती हैं।”
व्यंग्य सत्ता के दृश्य-अदृश्य अनुशासन को उजागर करता है।

7 ) पहचान हो तो ठीक रहता है

सिफ़ारिश संस्कृति पर यह सटीक कटाक्ष है।

“पहचान न हो, तो भगवान भी दफ्तर में इंतज़ार कराएँ।”
सही तो कहा है ,पहचान आज की सबसे प्रचलित मुद्रा है l

डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य नारेबाज़ नहीं, बल्कि नैतिक दबाव बनाता है। वे समाधान नहीं परोसते, सवाल छोड़ जाते हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि व्यंग्य का अंतिम लक्ष्य हँसी नहीं, चेतना है—और यही ‘बाराखड़ी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

कुल मिलाकर, ‘बाराखड़ी’ एक ऐसा व्यंग्य-संग्रह है जो अपने समय का सच लिखता है, बिना चीखे, बिना उपदेश दिए। यह संग्रह पाठकों को पढ़ने का आनंद देता है और व्यंग्यकारों को लिखने की प्रेरणा। आज के जटिल समय को समझने और उसे व्यंग्य की भाषा में साधने के लिए यह पुस्तक निस्संदेह एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य पाठ है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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