पंचांग: परंपरा नहीं, चलता हुआ गणित

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 18, 2026 India Story \बात अपने देश की 0

पंचांग कोई पोथी नहीं, हर साल दोहराई जाने वाली एक जीवित गणना है। पंडित भविष्यवाणी नहीं करता, वह खगोलीय मॉडल के आधार पर गणना करता है। सूर्य सिद्धांत आस्था नहीं, सूत्रों और गणित की भाषा में लिखा एक खगोल ग्रंथ है। पंचांग इसलिए जीवित है क्योंकि उसमें बदलाव को परंपरा का विरोध नहीं, उसका हिस्सा माना गया।

तिथि का विज्ञान-पंचांग का रहस्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 18, 2026 India Story \बात अपने देश की 0

अष्टमी कोई आस्था नहीं, एक सटीक खगोलीय मापन है—12 डिग्री का अंतर। तिथि समय नहीं, कोण है—घंटों में नहीं, डिग्री में मापी जाती है। पंचांग घड़ी से नहीं, आकाश से समय पढ़ता है—यही उसका विज्ञान और सौंदर्य है। जब हम तिथि को “डेट” समझते हैं, तब भ्रम पैदा होता है; जब उसे खगोलीय भाषा समझते हैं, सब स्पष्ट हो जाता है।

शक संवत और विक्रम संवत : दो घड़ियाँ, एक सभ्यता की

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 18, 2026 India Story \बात अपने देश की 1

विक्रम संवत और शक संवत का अंतर केवल दो कैलेंडरों का अंतर नहीं, बल्कि परंपरा और प्रशासन की दो अलग जरूरतों को समझने का विषय है। हमारे त्योहार जहाँ तिथि, नक्षत्र और मुहूर्त से संचालित होते हैं, वहीं राष्ट्रीय जीवन को एक स्थिर और सरल नागरिक कैलेंडर की आवश्यकता होती है। भारत की समय-परंपरा इतनी समृद्ध है कि यहाँ एक ही देश में धर्म के लिए अलग समय-भाषा और शासन के लिए अलग समय-व्यवस्था साथ-साथ चलती है। शक संवत को अपनाना विक्रम संवत का विरोध नहीं था, बल्कि आधुनिक प्रशासनिक सुविधा और वैज्ञानिक एकरूपता की आवश्यकता का परिणाम था।

समय का गणित बनाम समय का ज्ञान

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 17, 2026 India Story \बात अपने देश की 0

“समय को हमने अंक में बदल दिया है—और अंक को ही सत्य मान लिया है।” “ग्रेगोरियन कैलेंडर दिन गिनता है, पंचांग समय को पढ़ता है।” “जब तक हम तारीख़ से आगे नहीं बढ़ेंगे, समय का अर्थ हमारे लिए अधूरा ही रहेगा।”

भारतीय कैलेंडर और उसका वैज्ञानिक आधार: समय का जीवित व्याकरण

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 17, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

“यहाँ समय केवल गिना नहीं जाता, समझा भी जाता है—भारतीय पंचांग इसी जीवंत विज्ञान का प्रमाण है।”“चंद्र और सूर्य के संतुलन में बसता है भारतीय कालज्ञान—जहाँ तिथि भी बदलती है और सोच भी।”

घर: ईंट-पत्थरों से आगे, अपनेपन का निवास

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 6, 2026 Culture 1

घर और मकान के अंतर पर आधारित यह विचारात्मक आलेख बताता है कि घर केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि रिश्तों, स्मृतियों और अपनत्व की गर्माहट से निर्मित एक जीवित अनुभव है। जब तक उसमें अपने और अपनापन न हो, तब तक सबसे आलीशान मकान भी केवल एक खाली ढांचा रह जाता है।

पराधीनता का प्रश्न

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 18, 2026 India Story \बात अपने देश की 0

पराधीनता का प्रश्न—इतिहास का नहीं, मानसिकता का “भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ?”—यह सवाल सुनते ही हमारे भीतर एक तैयार-सा उत्तर उठता है: “बाहरी आक्रमणकारी ताक़तवर थे… हमारे पास हथियार नहीं थे… हमारी सेनाएँ कमज़ोर थीं… हम तकनीक में पीछे थे…”। ये सारे उत्तर आंशिक रूप से सही हैं, पर पूर्ण नहीं। क्योंकि दुनिया में बहुत-से […]

वैलेंटाइन डे: एक भारतीय परिप्रेक्ष्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 14, 2026 India Story \बात अपने देश की 0

“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?” “विशेष वैलेंटाइन डिश” दिल के आकार में, पर स्वाद में विस्फोटक! क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद सच में कम हो रहा है? अब सवाल यह है—दिल लाल रहेगा या बसंत पीला?

इलाज की भरमार, बीमारी ज़िंदा है

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 11, 2026 Health And Hospitals 0

“यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है। यह समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है, पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।” आज की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बीमारी का नहीं, बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है। मन की बीमारियों के लिए मोटिवेशनल वीडियो, पर्यावरण के लिए सम्मेलन, राजनीति के लिए भावनात्मक नारे— ये सब प्लेसीबो हैं। जब नक़ली इलाज सामान्य हो जाता है, तब असली मौतें सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह जाती हैं।