चिट्ठी-पाती का ज़माना: जब काग़ज़ों में रिश्तों की खुशबू बसती थी

प्रिय जेन-ज़ी के नाम एक पुरानी-सी चिट्ठी

अत्र कुशलं तत्रास्तु।
यहाँ कुशल सब भाँति सुहाई,
वहाँ कुशल रखे रघुराई।

आगे समाचार यह है कि…

प्यारे बच्चो,

बहुत दिनों से तुम्हें कोई चिट्ठी नहीं लिखी।
लिखता भी कैसे—तुम्हारे ज़माने में बातें अब काग़ज़ पर उतरती कहाँ हैं! वे स्क्रीन पर आती हैं, दो नीली टिक लगाती हैं, कभी एक इमोजी में मुस्कुरा देती हैं और फिर उँगली के एक झटके में ऊपर सरक जाती हैं।

सोचा, आज चिट्ठी दिवस पर तुम्हारे इनबॉक्स में संदेश नहीं, तुम्हारे नाम एक पुरानी-सी चिट्ठी भेजूँ।

वही चिट्ठी, जिसके ऊपर कभी नीली स्याही से नाम लिखा जाता था।
वही अंतर्देशीय पत्र, जिसके कोनों तक शब्द भर दिए जाते थे और जगह कम पड़ जाए तो किनारों पर भी टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में बाकी समाचार लिख दिए जाते थे।

हमारे समय में चिट्ठी सिर्फ़ सूचना नहीं होती थी—
घर का थोड़ा-सा हिस्सा डाकिए के थैले में बैठकर हमारे पास चला आता था।

नानाजी की चिट्ठी आती तो सबसे पहले उनके अक्षर पहचान में आते।
कहीं स्याही गहरी, कहीं हल्की; कहीं शब्द आपस में जुड़े हुए। ऊपर लिखा होता—

“अत्र कुशलं तत्रास्तु…”

फिर—

“आगे समाचार यह है कि हम सब यहाँ राजी-खुशी हैं और ईश्वर से तुम्हारी कुशलता की कामना करते हैं…”

और बस, इतना पढ़ते ही लगता था जैसे दूर बैठे अपने लोग अचानक पास आ गए हों।

उस काग़ज़ में न जाने कैसी खुशबू होती थी।
कभी पुराने संदूक की, कभी घर की मिट्टी की, कभी किताबों के बीच रखे सूखे फूल की… और शायद सबसे अधिक अपनेपन की।

चिट्ठियाँ पढ़ी नहीं जाती थीं, संभालकर रखी जाती थीं।

कई बार एक ही चिट्ठी घर में चार लोग पढ़ते।
माँ पढ़तीं, फिर पिता जी, फिर दादी कहतीं—
“ज़रा फिर से पढ़ना, उसने मेरे बारे में क्या लिखा है?”

किसी एक पंक्ति पर हँसी आती, किसी पर आँखें भर आतीं।

तुम्हारी पीढ़ी के पास हमसे कहीं तेज़ साधन हैं।
तुम एक पल में दुनिया के दूसरे कोने तक अपनी बात पहुँचा सकते हो। तस्वीर, आवाज़, वीडियो—सब कुछ भेज सकते हो।

लेकिन प्यारे बच्चो,
तेज़ी ने दूरी तो मिटा दी, कहीं ऐसा न हो कि ठहराव भी मिट जाए।

क्योंकि कुछ बातें “Seen” हो जाने के लिए नहीं होतीं,
वे महसूस किए जाने के लिए होती हैं।

कुछ रिश्ते केवल “Like” माँगने वाले नहीं होते,
वे दो पंक्तियाँ अपने हाथ से लिखे जाने के हक़दार होते हैं।

और हर भावना का उत्तर
❤️, 👍, 😂
नहीं हो सकता।

कभी किसी अपने को लिखकर देखना—

“आज अचानक तुम्हारी याद आई।”

काग़ज़ पर यह एक साधारण वाक्य भी मोबाइल स्क्रीन से कहीं अधिक देर तक जीवित रहता है।

चिट्ठी में Backspace नहीं होता था, इसलिए शायद शब्द बोलने से पहले मन उन्हें थोड़ा सँवारता था।

चिट्ठी में Typing… दिखाई नहीं देता था, इसलिए इंतज़ार करना आता था।

चिट्ठी में Last Seen नहीं था, इसलिए भरोसा थोड़ा अधिक था।

और चिट्ठी में Delete for Everyone भी नहीं था—
इसलिए लिखे हुए शब्दों की ज़िम्मेदारी भी होती थी।

तुमसे यह नहीं कह रहा कि मोबाइल छोड़कर फिर से डाकखाने की कतार में लग जाओ। समय आगे बढ़ता है और बढ़ना भी चाहिए।

बस इतनी गुज़ारिश है कि नई तकनीक के बीच
पुराने अपनत्व की भाषा मत खो देना।

कभी अपनी माँ के नाम चार पंक्तियाँ लिख देना।
कभी पिता के लिए।
कभी उस शिक्षक के लिए जिसने तुम्हें सँवारा।
कभी उस पुराने मित्र के लिए जिससे महीनों से केवल Reels साझा हो रही हैं, दिल की बात नहीं।

और कभी अपने ही भविष्य के नाम एक ख़त लिख देना—

“प्रिय मैं, पाँच साल बाद तुम जहाँ भी हो, उम्मीद है अपने सपनों के साथ अपने लोगों को भी याद रखे होगे…”

विश्वास मानो, वर्षों बाद वही काग़ज़ तुम्हें तुम्हारे पुराने रूप से मिलवाएगा।

हमारे ज़माने में चिट्ठी के अंत में अक्सर लिखा जाता था—

“थोड़े लिखे को बहुत समझना।”

कितनी सुंदर बात थी!
शब्द थोड़े थे, मगर उनके पीछे पूरा आदमी खड़ा होता था।

इसलिए आज तुम्हारे नाम भी यही लिखता हूँ—

स्क्रीन बदलती रहेंगी, ऐप बदलते रहेंगे, संवाद के साधन बदलेंगे;
बस अपने लोगों तक पहुँचने वाला मन का पता मत बदलने देना।

कभी किसी अपने को एक चिट्ठी ज़रूर लिखना।

हो सकता है वह चिट्ठी डाक से न जाए,
लेकिन उसे ऐसे लिखना कि उसमें तुम्हारे हाथ का स्पर्श हो, तुम्हारे मन की गर्माहट हो और तुम्हारे रिश्ते की खुशबू हो।

क्योंकि—

संदेश खबर पहुँचा देता है,
चिट्ठी आदमी पहुँचा देती है।

शेष मिलने पर।

घर के सभी बड़ों को प्रणाम, छोटों को स्नेह और तुम्हारे लिए ढेरों शुभकामनाएँ।

तुम्हारा ही,
एक उस ज़माने का आदमी
जिसने चिट्ठियों को आते हुए भी देखा है
और रिश्तों को उनका इंतज़ार करते हुए भी।

पुनश्च:
आज किसी एक ऐसे व्यक्ति का नाम सोचो, जिसे तुम्हारा संदेश नहीं—
तुम्हारी चिट्ठी चाहिए।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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