अलविदा पच्चीस!-kavita-dr mueksh
वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला। कहीं हँसी थी, कहीं आँसू; कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ। यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।
वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला। कहीं हँसी थी, कहीं आँसू; कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ। यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।
चार दीवारों के भीतर धीरे-धीरे गलता जीवन, और बाहर चमकता ताला— संस्कार ज़िंदा थे, बस माता-पिता नहीं रहे।
“मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ, और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।” “‘राजभाषा’ कहलाती मैं, फिर क्यूँ हर वाक्य के बाद खिचड़ी सी हो जाती मैं।” “ये तालियाँ हैं या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—हिंदी दिवस।” “हमें हिंदी से मोहब्बत है—जीती-जागती, सुलगती, बोलती-लड़ती मोहब्बत!”
“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!” “चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!” “प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!” “अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”
साठ साल का आदमी दरअसल चलता-फिरता पेड़ है—अनुभव की जड़ों में धँसा, सद्भाव की शाखों से भरा और भीतर अब भी एक प्यारा बच्चा लिये हुए। उसकी बातें कभी जुगाली लगती हैं, पर उनमें समय का सच और जीवन का रस बहता है।”
यह कविता भारत-जन के महा स्वरों की गूंज “वंदेमातरम्” से शुरू होकर राष्ट्रहित, देशभक्ति, असल–नकली देशप्रेम, मीडिया की गिरावट, आतंकी तत्वों की धूर्तता और नागरिक कर्तव्यनिष्ठा जैसे मुद्दों पर तेज़ और सीधी चोट करती है। व्यंग्य और राष्ट्रभाव का मेल इसे और प्रभावी बनाता है। यह रचना केवल भावुक नहीं—एक चेतावनी, एक संदेश और एक सख्त सामाजिक निरीक्षण भी है।
यह कविता 1857 की क्रांति के उन ज्वलंत क्षणों को पुनर्जीवित करती है जब मंगल पांडे की हुंकार से लेकर झाँसी की रानी की तलवार तक हर दिशा में स्वाधीनता की आग भड़क उठी थी। साधु-संतों से लेकर बैरागियों तक सबने राष्ट्ररक्षा का संकल्प लिया। यह रचना वीरांगना लक्ष्मीबाई के साहस, अध्यात्म और बलिदान को स्मरण कराती है—एक ऐसी ज्वाला जो आज भी हमारी चेतना को आलोकित करती है।
“बहती प्रकाश की ओर अगर है ज़िंदगी, तो हर अंधकार भी एक पड़ाव मात्र है। जो दीप भीतर जलता है — वही अमर है, वही सत्य है, वही जीवन का उजास।”
डॉ. राम कुमार जोशी की कविता डूबने की फिलॉसफी जीवन के गहन व्यंग्य को सरल शब्दों में उभारती है। जीवित व्यक्ति काम-क्रोध-अभिमान के भार से डूबता जाता है, जबकि मृत देह जल पर तैर जाती है। संदेश यही है—पाप और मोह की गठरियाँ जीवन को भारी बनाती हैं।
इस कविता में एक रात का भावचित्र है — जहाँ चाँद नहीं निकला, फिर भी कोई और "चाँद सा" मौजूद है जो सबका ध्यान खींच रहा है। उसकी अदाएँ, शर्मीलापन, सौंदर्य और भावनाओं की सजीवता से पूरी महफिल रोशन है। वह निराशा के अंधेरे में भी एक दीपक सा जगमगा रहा है — शान-ए-महफिल बनकर।