क्या होती देशभक्ति?-कविता-बात-अपने-देश-की

Dr Mahima Shreevasav Jun 30, 2025 Poems 0

देशभक्ति केवल नारों या गीतों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के उन छोटे-छोटे कर्मों में छिपी होती है जो सादगी से, ईमानदारी से, कर्तव्य की भावना से जन्म लेते हैं। कविता में देशभक्ति की परिभाषा शोर में नहीं, बल्कि खामोश अच्छाइयों में मिलती है।

जगाते है-कविता-बात अपने देश की

Sanjaya Jain Jun 29, 2025 Poems 0

यह आत्मपरिचयात्मक कविता एक लेखक के अंतरमन की झलक देती है — जहाँ लेखनी के गुण-दोष, धनहीनता में भी मन की समृद्धि, और समाज को जाग्रत करने की शक्ति निहित है। यह भावनाओं, चेतना और सभ्यता को एक नए रूप में ढालने का आह्वान करती है।

द्रोपदी का चीर हरण -कविता-बात-अपने-देश-की

Uttam Kumar Jun 29, 2025 Poems 0

द्रोपदी की पुकार, कृष्ण की कृपा और महारथियों की चुप्पी — यह कविता महाभारत की उस घड़ी का चित्रण है जहाँ न्याय मौन हो गया, और एक स्त्री की पीड़ा ने देवता को पुकारा। चीरहरण नहीं रुका, पर चीर बढ़ता गया — और मौन महारथियों की हार दिखी।

एक डॉक्टर की अंतर्वेदना-कविता-बात अपने देश की

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 29, 2025 Poems 1

एक डॉक्टर की आत्मा में दबी हुई करुण पुकार — जो हर दिन दूसरों के लिए जीवन की लड़ाई लड़ता है, पर खुद की वेदना अनकही रह जाती है। ऑपरेशन की छुरी थामे वो दिल थामे रहता है, जीवन और मृत्यु के द्वंद्व में उलझा, पर स्वयं के दर्द का कोई उपचार नहीं।

“जय जगन्नाथ”-कविता-बात अपने देश की

Neha Jain Jun 29, 2025 Poems 0

पुरी का जगन्नाथ धाम, आस्था और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। रथयात्रा के उत्सव में धड़कता है प्रभु का हृदय, जो भक्तों से मिलने स्वयं निकलते हैं। रथ, ढोल-नगाड़े, भक्तों का प्रेम – सब मिलकर इस दृश्य को अलौकिक बना देते हैं। यहाँ आकर आत्मा भी ‘जय जगन्नाथ’ गाने लगती है।

उनके होंठ-कविता -बात अपने देश की

Veerendra Narayan jha Jun 26, 2025 Poems 0

उनके होंठ बस होंठ नहीं, सत्ता के हथियार हैं — हवा में तैरते छल्लों जैसे, जो कभी बयान बनते हैं, कभी धमकी। दिल और दिमाग के ताले में बंद आत्मा, जब बोलने लगे बिना सोचे, तो सीज़फायर से स्ट्राइक तक का फ़ैसला भी होंठ ही करते हैं।

संगिनी-कविता-बात अपने देश की

Aasha Pallival Purohit Aashu Jun 26, 2025 Poems 0

यह कविता एक मौन, निःस्वार्थ संगिनी की बात करती है — परछाई की, जो जीवन भर साथ चलती है, बिना शिकायत, बिना अपेक्षा। वो सिर्फ साथ नहीं होती, बल्कि हर क्षण हमें अनुशासन, त्याग और अस्तित्व की सार्थकता सिखाती है। यही छाया, असली संगिनी है आत्मा की।

“सिसकियों से स्वर तक”-कविता रचना

Neha Jain Jun 26, 2025 Poems 0

यह कविता स्त्री की आंतरिक वेदना से उपजे साहस की गाथा है। रुदन और मौन के बीच खड़ी वह स्त्री, जो अब हार नहीं, संकल्प धारण करती है। आँसुओं को छोड़, आत्मविश्वास का दुशाला ओढ़ती है। यही उसकी नई पहचान है — परिवर्तन की ओर बढ़ती, एक जाग्रत चेतना।

हमें दिल का ज़माना चाहिए-गजल

Shakoor Anvar Jun 26, 2025 Poems 0

दिल के दौर में दुनिया ने खज़ाने मांगे। भूख से लिपटी आत्मा को सिर्फ़ आसरा चाहिए था। शिकारी ने निशाना ढूंढ़ा, और प्यार को बस ठिकाना चाहिए था। इस ग़ज़ल में जज़्बात, भूख, बेवफ़ाई और बेघरी की स्याही एक ही पन्ने पर फैली है।

मातृभूमि-कविता देश भक्ति की

Meenakshi Anand Jun 25, 2025 Poems 1

यहकविता मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, बलिदान और गौरव की भावना को दर्शाती है। हिमालय से सागर तक फैली इस पुण्यभूमि को नमन करते हुए व्यक्ति की भक्ति और भारत माता की आभा इस चित्र को भावपूर्ण बनाती है।