हां मैं एक औरत हूं-Kavita-Hindi

Vidya Dubey Jul 5, 2025 Poems 6

यह कविता स्त्री के संघर्ष, सहनशीलता और उसकी शक्तियों का गान है। माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, देवी — हर भूमिका में वह समाज की नींव है। वह कमजोर नहीं, संसार की रचयिता है। उसकी जात सिर्फ 'औरत' नहीं, एक सम्पूर्ण सृष्टि है। यही उसका आत्मघोष है: हां मैं एक औरत हूं।

मैं तेरे नाम से-कविता -हिंदी

Vidya Dubey Jul 3, 2025 Poems 2

विद्या पोखरियाल की यह कविता एक माँ की गहन भावनाओं की अभिव्यक्ति है, जो अपने बच्चे के नाम से अपना अस्तित्व गढ़ना चाहती है। वह उसका पथप्रदर्शक बनना चाहती है, उसका संसार संवारना चाहती है और हर कठिनाई में साथ निभाने को तत्पर है — पूर्ण समर्पण की अद्वितीय अभिव्यक्ति।

सावन आया-हिंदी कविता

Uttam Kumar Jul 3, 2025 Poems 2

इस कविता में सावन का रसभीना चित्र है—जहाँ झूले हैं, कजरी है, और बदरा की फुहारें हैं, वहीं किसी के पिया की दूरी आँखों में तड़प बनकर उतरती है। यह रचना सावन की सौंदर्याभिव्यक्ति और विरह के भाव का सुंदर संगम है।

मैं बच्चा हूँ, ट्रॉफी नहीं-कविता -डॉ मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 30, 2025 Poems 1

यह कविता एक बच्चे की अंतरात्मा की पुकार है—जो केवल अपने लिए जीना चाहता है, किसी की महत्वाकांक्षा की ट्रॉफी बनकर नहीं। वह अपने सपनों को जीना चाहता है, न कि दूसरों के अधूरे सपनों को ढोना। उसमें संवेदना है, विद्रोह है और मानवता की गूंज है।

क्या होती देशभक्ति?-कविता-बात-अपने-देश-की

Dr Mahima Shreevasav Jun 30, 2025 Poems 0

देशभक्ति केवल नारों या गीतों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के उन छोटे-छोटे कर्मों में छिपी होती है जो सादगी से, ईमानदारी से, कर्तव्य की भावना से जन्म लेते हैं। कविता में देशभक्ति की परिभाषा शोर में नहीं, बल्कि खामोश अच्छाइयों में मिलती है।

जगाते है-कविता-बात अपने देश की

Sanjaya Jain Jun 29, 2025 Poems 0

यह आत्मपरिचयात्मक कविता एक लेखक के अंतरमन की झलक देती है — जहाँ लेखनी के गुण-दोष, धनहीनता में भी मन की समृद्धि, और समाज को जाग्रत करने की शक्ति निहित है। यह भावनाओं, चेतना और सभ्यता को एक नए रूप में ढालने का आह्वान करती है।

द्रोपदी का चीर हरण -कविता-बात-अपने-देश-की

Uttam Kumar Jun 29, 2025 Poems 0

द्रोपदी की पुकार, कृष्ण की कृपा और महारथियों की चुप्पी — यह कविता महाभारत की उस घड़ी का चित्रण है जहाँ न्याय मौन हो गया, और एक स्त्री की पीड़ा ने देवता को पुकारा। चीरहरण नहीं रुका, पर चीर बढ़ता गया — और मौन महारथियों की हार दिखी।

एक डॉक्टर की अंतर्वेदना-कविता-बात अपने देश की

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 29, 2025 Poems 1

एक डॉक्टर की आत्मा में दबी हुई करुण पुकार — जो हर दिन दूसरों के लिए जीवन की लड़ाई लड़ता है, पर खुद की वेदना अनकही रह जाती है। ऑपरेशन की छुरी थामे वो दिल थामे रहता है, जीवन और मृत्यु के द्वंद्व में उलझा, पर स्वयं के दर्द का कोई उपचार नहीं।

“जय जगन्नाथ”-कविता-बात अपने देश की

Neha Jain Jun 29, 2025 Poems 0

पुरी का जगन्नाथ धाम, आस्था और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। रथयात्रा के उत्सव में धड़कता है प्रभु का हृदय, जो भक्तों से मिलने स्वयं निकलते हैं। रथ, ढोल-नगाड़े, भक्तों का प्रेम – सब मिलकर इस दृश्य को अलौकिक बना देते हैं। यहाँ आकर आत्मा भी ‘जय जगन्नाथ’ गाने लगती है।

उनके होंठ-कविता -बात अपने देश की

Veerendra Narayan jha Jun 26, 2025 Poems 0

उनके होंठ बस होंठ नहीं, सत्ता के हथियार हैं — हवा में तैरते छल्लों जैसे, जो कभी बयान बनते हैं, कभी धमकी। दिल और दिमाग के ताले में बंद आत्मा, जब बोलने लगे बिना सोचे, तो सीज़फायर से स्ट्राइक तक का फ़ैसला भी होंठ ही करते हैं।