अलविदा पच्चीस!-kavita-dr mueksh

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 31, 2025 हिंदी कविता 0

वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला। कहीं हँसी थी, कहीं आँसू; कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ। यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।

मैं और मेरी हिंदी: पोस्टर से उतरकर जीवन में आने की पुकार

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 26, 2025 हिंदी कविता 0

“मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ, और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।” “‘राजभाषा’ कहलाती मैं, फिर क्यूँ हर वाक्य के बाद खिचड़ी सी हो जाती मैं।” “ये तालियाँ हैं या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—हिंदी दिवस।” “हमें हिंदी से मोहब्बत है—जीती-जागती, सुलगती, बोलती-लड़ती मोहब्बत!”

सकारात्मकता आत्म-उपहार

Prahalad Shrimali Dec 26, 2025 हिंदी कविता 0

“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!” “चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!” “प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!” “अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”

ये आईना भी

Vidya Dubey Dec 13, 2025 हिंदी कविता 0

“टूटा आईना कभी दाग छुपा लेता है, कभी छुपे घाव दिखा देता है—एक ही प्रतिबिंब में बिखराव और आत्मबोध का सुंदर द्वंद्व।”

कचरा कचरा ही रहेगा-व्यंग्य कविता

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 9, 2025 Poems 0

“कचरा — बन बैठा है मानवीय संबंधों का नया व्याकरण। वह चाय के प्यालों में बहस बनकर उफनता है, और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘ज्ञान’ में अवधारणाओं को सड़ा देता है।”

मैं तेरी ही कब हो गई-कविता रचना

Vidya Dubey Dec 1, 2025 हिंदी कविता 0

“प्रेम की मदहोश धड़कनों में खोई एक आत्मा—जिसे न जाने कब अपने ही भीतर से किसी और का उजाला छू गया। ‘मैं तेरी ही कब हो गई’ में विद्या दुबे प्रेम की उस सूक्ष्म अनुभूति को रेखांकित करती हैं जहाँ व्यक्ति स्वयं से सरककर प्रिय की परछाई बन जाता है, अनकहे जादू में डूबता चला जाता है।”

तंदूरी रोटी युद्ध: वीर तुम डटे रहो

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 28, 2025 Poems 0

“शादी के पंडाल में तंदूरी रोटी अब सिर्फ़ खानपान नहीं रही, पूर्ण युद्ध बन चुकी है। दूल्हे से ज़्यादा चर्चा उस वीर की होती है, जो तंदूर से सटकर खड़ा रहता है और दो रोटी के लिए इतिहास लिख जाता है। ‘वीर तुम डटे रहो’ इस जंग के मोर्चे पर खड़े हर भूखे शौर्यवान की व्यंग्य-गाथा है।”

साठ साल का आदमी-कविता रचना

Prahalad Shrimali Nov 26, 2025 हिंदी कविता 0

साठ साल का आदमी दरअसल चलता-फिरता पेड़ है—अनुभव की जड़ों में धँसा, सद्भाव की शाखों से भरा और भीतर अब भी एक प्यारा बच्चा लिये हुए। उसकी बातें कभी जुगाली लगती हैं, पर उनमें समय का सच और जीवन का रस बहता है।”

जय भारत वंदेमातरम्!वंदेमातरम्!!

Prahalad Shrimali Nov 20, 2025 हिंदी कविता 0

यह कविता भारत-जन के महा स्वरों की गूंज “वंदेमातरम्” से शुरू होकर राष्ट्रहित, देशभक्ति, असल–नकली देशप्रेम, मीडिया की गिरावट, आतंकी तत्वों की धूर्तता और नागरिक कर्तव्यनिष्ठा जैसे मुद्दों पर तेज़ और सीधी चोट करती है। व्यंग्य और राष्ट्रभाव का मेल इसे और प्रभावी बनाता है। यह रचना केवल भावुक नहीं—एक चेतावनी, एक संदेश और एक सख्त सामाजिक निरीक्षण भी है।