संगिनी-कविता-बात अपने देश की

Aasha Pallival Purohit Aashu Jun 26, 2025 Poems 0

यह कविता एक मौन, निःस्वार्थ संगिनी की बात करती है — परछाई की, जो जीवन भर साथ चलती है, बिना शिकायत, बिना अपेक्षा। वो सिर्फ साथ नहीं होती, बल्कि हर क्षण हमें अनुशासन, त्याग और अस्तित्व की सार्थकता सिखाती है। यही छाया, असली संगिनी है आत्मा की।

“सिसकियों से स्वर तक”-कविता रचना

Neha Jain Jun 26, 2025 Poems 0

यह कविता स्त्री की आंतरिक वेदना से उपजे साहस की गाथा है। रुदन और मौन के बीच खड़ी वह स्त्री, जो अब हार नहीं, संकल्प धारण करती है। आँसुओं को छोड़, आत्मविश्वास का दुशाला ओढ़ती है। यही उसकी नई पहचान है — परिवर्तन की ओर बढ़ती, एक जाग्रत चेतना।

हमें दिल का ज़माना चाहिए-गजल

Shakoor Anvar Jun 26, 2025 Poems 0

दिल के दौर में दुनिया ने खज़ाने मांगे। भूख से लिपटी आत्मा को सिर्फ़ आसरा चाहिए था। शिकारी ने निशाना ढूंढ़ा, और प्यार को बस ठिकाना चाहिए था। इस ग़ज़ल में जज़्बात, भूख, बेवफ़ाई और बेघरी की स्याही एक ही पन्ने पर फैली है।

मातृभूमि-कविता देश भक्ति की

Meenakshi Anand Jun 25, 2025 Poems 1

यहकविता मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, बलिदान और गौरव की भावना को दर्शाती है। हिमालय से सागर तक फैली इस पुण्यभूमि को नमन करते हुए व्यक्ति की भक्ति और भारत माता की आभा इस चित्र को भावपूर्ण बनाती है।

” चला ढूढ़ने जीवन को ” 

Uttam Kumar Jun 25, 2025 Poems 0

यह कविता जीवन की उस रहस्यमय दिशा की तलाश है, जहाँ कोई पदचिन्ह नहीं और कोई उत्तर नहीं। कवि उस अज्ञात छोर की ओर देखता है, जहाँ जीवन कभी मुस्कराता, कभी मौन चलता चला जाता है। यह आत्ममंथन की यात्रा है — जिसमें कवि न केवल जीवन को खोजता है, बल्कि स्वयं से भी प्रश्न करता है। हर पंक्ति एक सूक्ष्म पीड़ा को उद्घाटित करती है, जहाँ जीवन का मौन गूंजता है। कविता एक प्रतीक है उस क्षण का, जब मनुष्य समझना चाहता है — क्या सच में जीवन कुछ कहे बिना ही चला जाता है, और पीछे छोड़ जाता है... एक खालीपन।

हिन्दी की बेटी-कविता

Babita Kumawat Jun 25, 2025 Poems 2

हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की पहचान है। यह भाषा नहीं, सृजन की प्रेरणा है — जो प्रतिभा को आकार देती है और अज्ञान को मिटाती है। हिंदी का इतिहास, उसका सौंदर्य, और उसका वैश्विक व्यक्तित्व, हमें गर्व से भर देता है।

“बेसहारा सर्वहारा चिन्तक” कविता रचना-डॉ मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 24, 2025 Poems 0

एक मुखौटा जो क्रांति का नाम लेता है, और एक जाम जो सिंगल मॉल्ट से छलकता है। डॉ. मुकेश 'असीमित' की यह तीखी व्यंग्यात्मक कविता उन स्वघोषित चिंतकों पर करारा कटाक्ष है — जो शब्दों से सर्वहारा का राग अलापते हैं, पर जीवन में सुविधाओं के सहारे सांस लेते हैं। "बेसहारा सर्वहारा चिन्तक" सत्ता, दिखावे और वैचारिक दोगलेपन की उस रंगभूमि पर प्रहार करती है, जहाँ विमर्श क्लाइमेट चेंज और स्त्री अधिकारों पर होता है, पर ए.सी. और इंटर्न की सुविधा भी नहीं छोड़ी जाती। यह रचना नारे और नैतिकता के बीच के खोखलेपन को उजागर करती है — तीखी, मार्मिक और असीमित शैली में।

“रिश्ते (गजल ) दो छायाओं के बीच अनकहे जुड़ाव ।”

Babita Kumawat Jun 23, 2025 Poems 4

गजल – रिश्ते रिश्तों में विसाल उतना है जरूरी, मेरे लिए हर सिम्त में रिश्ते है जरूरी पर कुछ लोग बना देते है मैदान-ए-मतकल, मेरी ख्वाहिश है बनाना रिश्तों में खुशी हर पल कैद-ए-बाम मिलते कुछ लोग ऐसे है, जो पेच-ओ-खम रिश्तों में डाल देते हैं मैं हर शाख, हर खार, हर कली से मिली, […]

जंगल की पुकार: हरियाली, जीवन और संरक्षण की कविता

Dr. Mulla Adam Ali Jun 23, 2025 Blogs 0

जंगल केवल पेड़ों और जानवरों का घर नहीं, बल्कि हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। यह हरियाली, शांति, और जैव विविधता का प्रतीक हैं, जो धरती को संतुलन और सांसें प्रदान करते हैं। लेकिन आज मानवीय लालच और विकास की अंधी दौड़ ने इन प्राकृतिक धरोहरों को संकट में डाल दिया है। प्रस्तुत कविता “जंगल […]

गणेश वंदना-छंद रचना-डॉ मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 7, 2024 Poems 0

गणेश चतुर्थी विशेष… करहूँ स्तुति श्री गणपति, दीन दुखी के नाथ। दारुण दूर करहुं, तुम हो दीनों के साथ॥ विघ्न विनाशक नाम तुम्हारा, शुभ करहुं हर बार। दीनदयालु, कृपा बरसाओ, जग में हो उजियार॥ करबो वंदन पारवती सुत की, मंगल मूर्ति विशाल। विघ्न विनाशक नाम तुम्हारो, सिद्धि दाता प्रतिपाल॥ मूषक वाहन, मोदक भोगी, भाल चंद्र […]