चंदा का धंधा — न मंदा, न गंदा

चंदा का धंधा न मंदा, न गंदा

डॉ. मुकेश असीमित

रोज़ की तरह मैं चैंबर में बैठा अपनी दो जून की रोटी का इंतज़ाम कर रहा था। गर्मी इतनी कि लगता था इस बार दो जून, दो दिन में ही आ जाएगी। मरीज अपनी उम्दा परेशानियाँ लिए सामने बैठा था और मैं उसके सवालों में उलझा कि तभी फोन का मुँह खुल गया।
आमतौर पर OPD के समय फोन साइलेंट रहता है—क्योंकि मरीजों के हिसाब से डॉक्टर का फोन बजना वैसा ही अपराध है जैसे किसी रोमांटिक सीन में खलनायक का अचानक प्रवेश। पर आज किसी अनहोनी की प्रस्तावना थी—फोन खुला रह गया था।

नंबर अनजान था, तो लगा जरूर कोई कंपनी वाला होगा, जो मेरे पेशे से इतना प्रभावित है कि दरवाज़े पर खड़े होकर भी 60 लाख का लोन मेरे हाथ में ठूंस देना चाहता है। या कोई साइबर अपराधी होगा जो मेरी भोली आत्मा को अपने चंगुल में फँसाकर मुझे “कैश–काऊ” बनाना चाहता है।

मैंने फोन को झटका देकर साइलेंट किया और मरीज की तरफ ऐसे लौटा जैसे कुछ हुआ ही नहीं… लेकिन तभी फिर उसी नंबर की रोशनी स्क्रीन पर चमकी। अबकी बार फोन गुर्राया नहीं, घरघराया—वही कंपन जो जेब में पड़े–पड़े डॉक्टर की आत्मा को भी कँपकंपा  दे।
मरीज ने करुणा-भाव से कहा—“उठा लो डॉक्टर साहब।”
ऐसा लगा मानो बॉस ने कर्मचारी की विनती सुनकर दो दिन की छुट्टी दे दी हो।

मैंने फोन उठाया। उधर से आवाज़ आई—
पहचाना कौन डॉक साहब?”

स्वर गुप्ता जी का सा था—शहर के सर्वमान्य कुलाधिपति, संस्था-जीवी, सेवा-खोर और चंदा–वसूली विभाग के “ब्रांड एम्बेसडर”। पर नंबर अनजान!
समझ गया—शायद इसी लिए नया नंबर, क्योंकि पिछले नंबरों से किए गए कॉल मैं उठा नहीं पाता था।क्यूँ वो मेरी कांटेक्ट लिस्ट में दर्ज थे l

मैंने पूछा, “आप… गुप्ता जी?”
उधर से तुरन्त सहमति—
“सही पकड़े हैं। हम लोग आपके क्लिनिक के बाहर ही हैं… बस दो मिनट में अंदर आते हैं।”
और फोन कट।

अब अपराधी मैं था और पुलिस वे। भागने का अवसर भी नहीं मिला। अगला सीन—“चंदा वसूली स्पेशल ऑपरेशन”—शुरू होने वाला था।
गुप्ता जी की चंदा–वसूली की दहशत शहर में उतनी ही मशहूर है जितना इनकम टैक्स का छापा, बस फर्क इतना कि यहाँ नोट गिनती मशीन नहीं लगती; यहाँ आदमी अपनी आत्मा, पश्चाताप और कैश—तीनों टेबल पर रख देता है।

पर कमाल! आधा घंटा बीत गया—न गुप्ता जी, न उनका गिरोह।
मैं बाहर भी झाँक आया—कुछ नहीं। सोचने लगा—आज तो 1 अप्रैल भी नहीं है कि मुझे मूर्ख बनाया जा रहा हो।

इसी उलझन में दो–चार मरीज निपटाकर जैसे ही उठने लगा—तभी धम्म–धम्म की ध्वनि के साथ 8–10 लोग चैंबर में घुस आए।
अगुआ—स्वयं श्रीमान गुप्ता जी।

बाकी सब—मुझे “जीजाजी”, “फूफाजी”, “भैया” कहकर बुलाने लगे। तब समझ आया कि ये मेरे रिश्तेदार भी हो सकते हैं—वो वाले जिन्हें मैं कभी पहचान नहीं पाता पर वे मुझे रोज़ सुबह वॉक पर पहचानते हैं।

मैंने औपचारिकता निभाई—“बैठिए, बैठिए…”
पर ये गिरोह शातिर था।
OPD में बैठा देता तो मैं मरीजों का बहाना बनाकर जल्दी चलता कर देता।
इसलिए बोले—
नहीं डॉक्टर साहब, ऊपर बैठते हैंबहुत दिन से भाभी जी के हाथ की  चाय नहीं पी।

अब इस षड्यंत्र में उनकी भाभी जी भी फंस चुकी थीं।

मैंने चाय का आदेश दिया। उधर से जो बड़बड़ाहट आई—वो हर भारतीय पत्नी की सामूहिक भावना थी—
कौन आए हैं? कितना चंदा माँग रहे हैं? पिछली बार क्या कम दिया था?”
मैंने जल्दी-जल्दी फोन का वॉल्यूम कम कर दिया और राजनयिक जवाब दिए—
“हाँ-हाँ, बस चार फीकी चाय भेज देना… कुछ नमकीन भी।”

बैठक में बैठते ही टीम के एक सदस्य ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए शिकायत दर्ज कराई—
“देख रहे हैं डॉक्टर साहब? ये हाथ अभी भी टेढ़ा है। आपने इलाज किया था। फिर ठीक नहीं हुआ तो जयपुर में पाँच डॉक्टरों को दिखाया… दस हज़ार फूँक दिए… तब ठीक हुआ।”

मतलब ये ट्रिक है चन्दा वसूली गिरोह की ,यह जताने के लिए की यार डॉक्टर तो तुम दो कौड़ी  के नहीं ,लेकिन फिर भी ये तो हम हैं जो तुम्हे मौका दे रहे हैं कुछ अपने पापो का प्रायश्चित चंदा रूप में करने के लिए l
मैंने सोचा—कहीं आज चंदे के साथ “इलाज का हर्जाना” भी न वसूल लें।

फिर शुरू हुआ टीम का चंदा–संगीत।
कोई संस्था की उपलब्धियाँ गाना लगा—
“गरीबों की सेवा की, गायों की सेवा की, मंदिरों की सेवा की…”
उनकी टाइमलाइन में सिर्फ “सेवा” थी—कब, कहाँ, किस दुपहर, किस संध्या—सब डेटा तैयार।

दूसरा बोला—
डॉक्टर साहब, आप तो शहर के भामाशाह हैंफलानी संस्था को इतना दिया, ढिकानी को इतना…”
मैं हक्का-बक्का।
पूरा होमवर्क करके आए थे—रसीदों का इतिहास, डोनेशन का भूगोल, और वसूली का विज्ञान।

तीसरे ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा—
डॉक्टर तो भगवान होते हैं।
ये वही पंक्ति है जो मरीज बिल चुकाते वक्त बोलते हैं, या चंदा वसूली वाले रकम तय करते वक्त।

इसी बीच चाय आ गई। चाय की चुस्की के साथ कमरे में थोड़ी शांति फैली।
मैंने सावधानी से पूछा—
तोअब आपका क्या आदेश?”
यानी—जज साहब मेरी सजा कितनी?

गुप्ता जी ने इशारा किया। एक सदस्य ने जेब से रसीदों की गड्डी निकाली—ऐसे जैसे कोई बंदूक निकालकर अंतिम वार करने वाला हो।

रसीद गड्डी पलटकर बोले—
“फलाने डॉक्टर ने इतना दिया… फलाने ने इतना… आप इनसे कम कैसे देंगे? बस, ये रकम कर दीजिए।”

रकम देखी—मेरे अनुमान से भी दोगुनी।
मैंने विनम्रता का आवरण ओढ़ते हुए कहा—
“इतना नहीं हो पाएगा जी… टैक्स का महीना है… रहम करिए।”

पर पूरी टीम अंगद का पाँव थी—टस से मस नहीं।
जैसे फिगर अमिट स्याही से लिखा हो—बदलने का प्रश्न ही नहीं।

गुप्ता जी थोड़े नाराज़ हुए—
“डॉक्टर साहब, अगर इतना ही लेना होता तो किसी सदस्य को भेज देते। पहली बार खुद आए हैं… ये भी आपकी इज्जत है।”

मेरी गलती—मैंने उनके “आशीर्वादमय आगमन” की कद्र नहीं की।
आखिरकार, मैंने नीचे स्टाफ को फोन करके दिन भर की कमाई मँगवाई।
वाइफ को बुलाने की हिम्मत नहीं थी—क्योंकि चंदे की राशि बताने पर जो ‘ज्वार–भाटा’ उठता, वह मुझसे झेला न जाता।

राशि पकड़ाते ही उन्होंने हल्की हिकारत और भारी विजय–भाव से पैसे जेब में सरकाए।
मैंने कहा—“गिन लीजिए…”
उत्तर—
दान में कौन बेईमानी करता है!

और रसीद मेरे हाथ पर ऐसे फाड़ी गई मानो किसी युद्ध में आत्मसमर्पण का दस्तावेज़।

पूरा दल विजयी सेनानियों की तरह चला गया।

मैं नीचे आया—तो एक मरीज 500 रुपये लहराते हुए रिसेप्शन पर चिल्ला रहा था—
खुल्ले नहीं हैं क्या?”
मैं समझ गया—अभी जो रेजगारी ऊपर भेजी थी, उसी का दुष्परिणाम नीचे मुंह बांये खड़ा था।

चैंबर में लौटकर मैंने गुप्ता जी का नया नंबर भी सेव कर लिया—
यह सोचते हुए कि अगली बार शायद उन्हें भी पहचान लूँ…
हालाँकि वे हर बार नया नंबर लेकर ही इस “चंदा–धंधा” को अंजाम देते हैं।

आखिर चंदा का धंदा —मंदा नहीं होता, न गंदा।
बस, देने वाला हलकान होता है… लेने वाला मालामाल।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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