छप्पर फाड़ के –फिल्म रिव्यु
कल अचानक यूँ ही, बिना किसी भारी-भरकम उम्मीद के, छप्पर फाड़ के देख डाली। 2019 में आई यह Hotstar Special फ़िल्म न पूरी तरह कॉमेडी है, न ही विशुद्ध फैमिली ड्रामा। यह दोनों के बीच का वही धूसर इलाक़ा है, जहाँ हँसी भी आती है और भीतर कहीं कुछ चुभ भी जाता है। पहली नज़र में यह एक “वन टाइम वॉच” जैसी लगती है, लेकिन फ़िल्म खत्म होते-होते कुछ सवाल ऐसे हैं, जो दर्शक के साथ घर तक चले आते हैं।
फ़िल्म की कहानी मिस्टर शरद गुपचुप के इर्द-गिर्द घूमती है—एक रिटायर्ड, ईमानदार, ठेठ मध्यवर्गीय व्यक्ति, जिनकी भूमिका विनय पाठक ने निभाई है। विनय पाठक का चेहरा ही ऐसा है कि वह एक साथ भरोसा भी जगाता है और एक अजीब-सी बेचैनी भी। वे वही आम भारतीय पिता हैं, जो जीवन भर नैतिकता, ईमानदारी और ‘सही-गलत’ की मोटी लकीरें खींचते रहते हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि अगर पैसा सही रास्ते से न आए, तो वह धीरे-धीरे ज़हर बन जाता है—इंसान के लिए भी और परिवार के लिए भी।
कहानी की शुरुआत बिल्कुल साधारण है। रिटायरमेंट के बाद मिस्टर गुपचुप अपनी जीवन भर की जमा-पूँजी कहीं इन्वेस्ट कर देते हैं—जैसा कि लगभग हर मध्यमवर्गीय करता है—ताकि बुढ़ापे में किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन किस्मत कब साथ छोड़ दे, यह कोई नहीं जानता। एक एक्सीडेंट होता है, ऑपरेशन की नौबत आती है, और इसी बीच यह ख़बर भी मिलती है कि जिन निवेशकों पर भरोसा किया था, वे पैसा लेकर रफूचक्कर हो चुके हैं। यानी बीमारी भी, बेबसी भी और भविष्य का डर भी—तीनों एक साथ आ खड़े होते हैं।
यहीं से फ़िल्म अपने असली रंग दिखाने लगती है। परिवार, जो अब तक नैतिकता के उस ऊँचे खंभे को आदर की नज़र से देखता था, अचानक व्यावहारिक होने लगता है। दोस्तों से मदद ली जाती है, रिश्तेदारों से उधार माँगा जाता है, और मंदिर जाकर भगवान से शिकायतें भी होती हैं। निर्देशक ने यहाँ बड़ी सलीके से यह बात दिखाई है कि मुसीबत जब आती है, तो वह अकेली नहीं आती—वह इंसान की आत्मा की परतें भी उधेड़ देती है।
कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है, जब मंदिर से लौटते समय रास्ते में पैसों से भरा एक बैग मिल जाता है। बैग के पास एक लाश पड़ी है, खून बहा हुआ है—यानी पैसा संदिग्ध है, शायद किसी अपराध से जुड़ा हुआ। इस पल मिस्टर गुपचुप की नैतिकता पूरी ताकत से खड़ी हो जाती है—“यह पैसा हमारा नहीं है, इसे हाथ भी नहीं लगाना चाहिए।” लेकिन उनका बेटा, जूनियर गुपचुप, और बाकी परिवार इसे किस्मत का तोहफ़ा मान बैठते हैं। यहीं से वह द्वंद्व शुरू होता है, जो इस फ़िल्म की आत्मा है—नैतिकता बनाम अवसर।
फ़िल्म बहुत साफ़-साफ़ दिखाती है कि पैसा सिर्फ़ ज़रूरतें ही पूरी नहीं करता, वह इंसान के भीतर छिपे लालच को भी उजागर कर देता है। जिन हाथों ने कल तक “गलत” को छूने से इनकार किया था, वही हाथ अब नए कैमरे, नई वॉशिंग मशीन और नई स्कूटी के सपने बुनने लगते हैं। परिवार के सदस्य चोरी-छिपे खर्च करने लगते हैं—कोई नई चीज़ खरीदता है, कोई पुरानी अधूरी इच्छाओं को पूरा करता है। और हर बार खुद को तर्कों से समझा लिया जाता है—“थोड़ा-सा तो चलता है”, “किसी को पता नहीं चलेगा”, “हम भी तो परेशान हैं।”
मिस्टर गुपचुप इस पूरे बदलाव को भीतर ही भीतर झेलते रहते हैं। विनय पाठक ने यहाँ कमाल का अभिनय किया है—उनकी आँखों में गुस्सा भी है, बेबसी भी और एक ऐसा टूटता हुआ आदर्श भी, जो शब्दों में नहीं, चुप्पी में बोलता है। जब परिवार उनकी बात नहीं मानता, तो आवेश में आकर वे उस पैसों के बैग को जला देते हैं। यहीं एक रहस्य खड़ा होता है… आगे की कहानी मैं यहीं छोड़ देता हूँ। लेकिन यह ज़रूर दिखता है कि आदर्शों पर चलने वाला व्यक्ति भी कितनी कुंठाओं में जीता है।
उसी समानांतर महेंद्र का चरित्र है—जो पूरा का पूरा फ्रॉड है, फिर भी समिति का अध्यक्ष बना हुआ है। उसके घर रेड पड़ती है, तो कई लोगों को अजीब-सी खुशी होती है। मानो वे सिर्फ़ मौके की तलाश में हों—कि कब कोई और गिरे और हम खुद को सही साबित कर सकें। फ़िल्म यही बताती है कि अवसर की एक हल्की-सी ढील मिलते ही हम कितनी आसानी से उसी दलदल में फँस जाते हैं, जिसे कोसते रहे हैं।
मानवीय दुर्बलताओं का बड़ा सधा हुआ खाका खींचती है यह फ़िल्म। इसका क्लाइमैक्स ग़ज़ब का है। परिवार में हर सदस्य की अपनी कमज़ोरियाँ हैं, अपनी शिकायतें हैं—एक-दूसरे से भी, हालात से भी। फिर भी परिवार, परिवार ही रहता है। कहीं न कहीं एक साझा स्वार्थ, एक अदृश्य डोर, सबको जोड़े रखती है। शायद यही इस फ़िल्म की सबसे कड़वी और सबसे सच्ची बात है।
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फ़िल्म अपना संदेश किसी उपदेशक की तरह माथे पर नहीं मारती। यह सीधे-सीधे यह नहीं कहती कि “पैसा बुरा है” या “लालच गलत है।” बल्कि बहुत चुपचाप, बहुत चालाकी से एक सवाल आपके सामने रख देती है—अगर आपकी जान, आपका परिवार और आपका भविष्य एक साथ दाँव पर लग जाए, तो क्या आप भी वही करेंगे, जिसे करने से आप अब तक दूसरों को रोकते आए हैं? यही सवाल इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।
यहाँ की कॉमेडी ठहाकों में नहीं फूटती। न तो यह पेट पकड़कर हँसाने वाली फ़िल्म है, न ही हर दस मिनट में पंचलाइन मारती है। इसकी हँसी हल्की है, तंज़ में लिपटी हुई है और परिस्थितियों की विडंबना से पैदा होती है। इसलिए अगर आप यह सोचकर बैठेंगे कि ढेर सारी हँसी मिलेगी, तो शायद निराश हों। लेकिन अगर आप ऐसी फ़िल्म देखना चाहते हैं, जो मुस्कराते-मुस्कराते आपको अपने ही भीतर झाँकने पर मजबूर कर दे—तो यह फ़िल्म आपको खाली हाथ नहीं लौटाती।
फ़िल्म बड़ी खूबसूरती से यह दिखाती है कि आदर्श जितने साफ़ और सीधे किताबों में दिखते हैं, ज़िंदगी में उतने ही उलझे हुए होते हैं। पैसा जब “छप्पर फाड़” कर आता है, तो वह सिर्फ़ घर की छत नहीं हिलाता, इंसान की नैतिक छत को भी डगमगा देता है। और कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि सिर्फ़ अपने आप को बचाने के लिए, हम अपनी आँखों के सामने अपनों को गिरते, टूटते, मरते हुए भी देख लेते हैं। यही इस फ़िल्म की सबसे डरावनी और सबसे सच्ची परत है।
रेटिंग के तराज़ू पर तौलें, तो यह कोई मास्टरपीस नहीं है। लेकिन यह एक ईमानदार कोशिश ज़रूर है—ऐसी फ़िल्म, जिसे एक बार देखना बनता है। और सबसे बड़ी बात यह कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी वह पूरी तरह खत्म नहीं होती; उसकी कुछ परछाइयाँ देर तक आपके भीतर चलती रहती हैं, मन में सवाल बनकर।
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