Criminal Justice के पहले सीज़न को देखे वर्षों बीत गए, लेकिन उसकी यादें किसी जुनून की तरह दिमाग में अब भी कहीं बसी थीं—जैसे पुरानी किताब के भीतर रखा कोई प्रेम-पत्र, जिसे खोलते ही उस समय की महक फिर से जाग जाए। यूँ तो चार दिन से मैं दो-दो एपिसोड प्रति रात की गति से देख रहा था, लेकिन कल रात एक शादी के फ़ंक्शन से देर से लौटा, फिर भी मन में यह उत्सुकता अड़ी रही कि आज चाहे जितनी रात हो जाए, सीज़न पूरा करके ही दम लूँगा। और सच में, जब आख़िरकार सीज़न 2 समाप्त किया, तो लगा मानो इतने दिनों में देखते-देखते मैं भी उसी कोर्टरूम की बेंच पर बैठ गया था, जहाँ इंसाफ और भ्रम एक साथ सांस लेते हैं।
मुझे हमेशा ऐसे सीज़न पसंद आते हैं जिनमें सीज़न-दर-सीज़न कहानी न जुड़े, केवल पात्र वही रह जाएँ—जैसे The Family Man। यही वजह है कि यहाँ भी वही आनंद मिला: बस वही प्यारा-सा माधव मिश्रा—अपनी चप्पलों की चरमराहट, देसी आत्मविश्वास, और असहज परिस्थितियों में हँसी ठेल देने की अद्भुत कला के साथ। बाकी दुनिया, हालात, और अपराध—सब नए, और इतने उलझे हुए कि जितने सरल लगते हैं, असल में उससे कहीं गहरे निकलते हैं।
कहानी शुरू होती है एक हत्या से—जाने-माने वकील विक्रम चंद्रा की। और चौंकाने वाली बात यह कि हत्यारोपी कोई दुश्मन नहीं, बल्कि उनकी पत्नी अनु चंद्रा। मामला इतना साफ-सुथरा प्रतीत होता है कि पहली नज़र में viewer भी यही सोच ले कि काम खत्म, फ़ाइल बंद। सबूतों की पूरी सेना अनु के खिलाफ खड़ी दिखती है—परिस्थितियाँ, बयान, घटनाएँ… सब उसकी ओर इशारा करती हैं।
लेकिन ठीक इसी आसान रास्ते के बीच में माधव मिश्रा आकर खड़े हो जाते हैं, और कहानी धीरे-धीरे मनोविज्ञान, रिश्तों की राजनीति और भीतर सुलगते ज़हर का एक उबलता हुआ संसार बन जाती है। पंकज त्रिपाठी अपनी कॉमिक टाइमिंग से गहरे कोर्टरूम ड्रामे में हल्की-हल्की मुस्कानें बुनते चलते हैं—जिससे कहानी बोझिल नहीं, बल्कि सांस लेती हुई लगती है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पता चलता है कि अनु महज़ एक आरोपी नहीं, बल्कि वर्षों से एक अदृश्य कैद में जी रही थी। विक्रम—जिसे दुनिया “सम्मानित” कहकर पूजती थी—घर की चारदीवारी के भीतर एक मनोवैज्ञानिक शिकारी था। उसने अनु को gaslight करते-करते इस हद तक पहुँचा दिया था कि वह खुद ही अपनी बीमारियों में विश्वास करने लगी। दवाइयाँ, झूठ, और आइसक्रीम वाला वह मासूम-सा दृश्य—जहाँ वह अनु को उसी के ऊपर शक करने पर मजबूर कर देता है—स्पष्ट कर देता है कि मानसिक शोषण कितना खतरनाक और अदृश्य हो सकता है।
यहाँ थोड़ा “gaslight करना” समझना भी ज़रूरी है—इसका अर्थ है किसी व्यक्ति के दिमाग में उसके ही अनुभवों, यादों और भावनाओं को लेकर इतना भ्रम पैदा कर देना कि वह खुद को गलत, कमजोर या “पागल” समझने लगे, और सामने वाला उस पर पूर्ण नियंत्रण पा ले।
डराने वाली बात यह है कि विक्रम सिर्फ़ अनु को ही नहीं, पूरा संसार अपने नक्शे में ढालता गया था। उसने बेटी तक को माँ के खिलाफ खड़ा कर दिया, अनु के पिता को तीन साल घर में आने नहीं दिया, और CWC की केयरटेकर से लेकर पुलिस ऑफिसर तक—सभी को पैसों और प्रभाव के दम पर मोहरा बना लिया। हर फ़ैसला, हर रिश्ता, हर भाव—सब पर उसकी मुहर थी। अनु की साँसें भी मानो उसकी अनुमति से चलती थीं।
और तभी कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है—अनु का अफेयर, मोक्ष का होना, और यह रहस्य कि जिस बच्चे को विक्रम अपना मान रहा था और जिसकी डिलीवरी के बाद वह उसकी कस्टडी लेना चाहता था—वह वास्तव में मोक्ष का था। पर असली बात “अफेयर” नहीं थी—असली दर्द यह था कि अनु ऐसी मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक यातना में जी रही थी कि उसके शरीर पर भी उसका अधिकार नहीं बचा था।
कोर्टरूम में जब यह सच धागे-दर-धागा उधड़ने लगता है, सीरीज़ अपनी सबसे परिपक्व और ताकतवर स्थिति में आ पहुंचती है। माधव मिश्रा और निकहत मिलकर पूरा सच जोड़ते हैं, और इसी बीच मीडिया अपनी अलग अदालत चलाता रहता है। यह सीज़न बड़े प्रभावी ढंग से दिखाता है कि आजकल दो तरह की कोर्ट होती हैं—एक जहाँ जज बैठे होते हैं, और दूसरी जहाँ कैमरे। और कैसे रसूखदार लोग दोनों को मनचाहे ढंग से मोड़ लेते हैं।
आख़िरी एपिसोड इतना तीव्र है कि आप पलभर भी नजरें नहीं हटा सकते। वहाँ कहानी खुद अपना गला खोलकर चीखती है कि यह हत्या प्रतिशोध नहीं थी—यह जीवित रहने का आखिरी प्रयास था। जब किसी औरत से उसका मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक अस्तित्व छीन लिया जाए, तब अपराध की परिभाषा सिर्फ़ IPC की धाराओं में नहीं समाती; वह दर्द के इतिहास में लिखी जाती है।
अनु को सिर्फ़ दो साल की सजा मिलती है—क्योंकि सजा में अपराध का बोझ कम और पीड़ा का इतिहास अधिक था। और इस फैसले के बीच खड़े माधव मिश्रा—अपनी टेढ़ी मुस्कान, बेफिक्र चाल और भीतर छिपी गहरी संवेदनशीलता के साथ—पूरे शो को उस ऊँचाई तक ले जाते हैं जहाँ मनोरंजन से अधिक मानवीय वेदना दिखाई देती है।
Criminal Justice Season 2 एक थ्रिलर से कहीं अधिक है। यह बंद दरवाज़ों के भीतर दबे हुए कराहते सच, रिश्तों की सड़ांध, और दिखावे की दुनिया में छिपी नाजुक धड़कनों की कहानी है। marital rape को rape माना जाए या नहीं—इस पर लंबी बहस छिड़ सकती है; लेकिन यह सीज़न सोचने पर मजबूर करता है कि शादी जैसा पवित्र रिश्ता भी अहंकार, स्वार्थ, संदेह और पुरुषवादी दबाव की सतह पर नरक बन सकता है।
कहानी खत्म होती है, लेकिन भीतर कुछ खत्म नहीं होता—सिर्फ़ बदलता है। जैसे किसी ने आपके सामने एक आईना रख दिया हो, और आप चाहकर भी उससे नज़र न हटा सकें।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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