धर्मेंद्र: वह आख़िरी देहाती शहंशाह, जो परदे पर नहीं—दिलों में बसता था

धर्मेंद्र: वह आख़िरी देहाती शहंशाह, जो परदे पर नहीं—दिलों में बसता था

कभी-कभी लगता है फ़िल्में सचमुच आदमी को अमर बना देती हैं—और आदमी उसी परदे से नीचे उतरते ही फिर उतना ही साधारण, उतना ही नाज़ुक और उतना ही मानवीय रह जाता है। धर्मेंद्र—जिसे हम प्यार से ‘धरम पाजी’ कहते आए—शायद इसी साधारण और असाधारण के बीच झूलता वह आख़िरी सितारा था, जिसके चेहरे पर देहात की मिट्टी थी और आंखों में रोमांस का सूरज ढलता हुआ-सा चमकता था।

उनके निधन की ख़बर आने के बाद मीडिया ने जिस अनगढ़ तरीके से प्रतिक्रिया दी, वह शायद खुद धर्मेंद्र को भी ठेस पहुँचाती—ठीक वैसे ही जैसे अतीत में कई बार उनकी ‘झूठी मौत’ की ख़बरें छापकर मीडिया ने उन्हें परेशान किया था। जाते-जाते धर्मेंद्र का यह मौन-विद्रोह हमारे समय की मीडिया संस्कृति पर एक स्थायी टिप्पणी छोड़ गया।

परदे पर धर्मेंद्र सजीले जवान थे—एक ऐसा वीर, जो फ़िल्म ‘धर्मवीर’ में रोमन योद्धाओं का कवच पहनकर आठवां अजूबा लगता था, और ‘सीता और गीता’ में गुस्से से आँखें लाल कर देने पर भी दिलकश लगता था। वही धर्मेंद्र जब ‘चुपके-चुपके’ में प्यारे मोहन बनकर हास्य की धारा बहाते, तो लगता मानो कोई देसी शायर चुपके से अभिनय की पाठशाला चला रहा हो। वे गुस्से में अवतारी लगते थे, और मुस्कुराते थे तो बरसात का पहला फुहार-सा लगता था।

लेकिन अभिनेता धर्मेंद्र को समझने के लिए शोले के वीरू से बहुत दूर जाना पड़ता है—वहां तक जहाँ वे ऋषिकेश मुखर्जी की ‘सत्यकाम’ में अपनी ज़िंदगी का सर्वश्रेष्ठ अभिनय रखकर भी पुरस्कारों से वंचित रह जाते हैं। जहां ‘अनुपमा’ में एक सहज, शांत प्रेमी बनकर सिर्फ़ चेहरे की हल्की मुस्कान से पूरा दृश्य रोशन कर देते हैं। यह दर्द वे अपने दिल में हमेशा दबाए रहे कि उन्हें संजीव कुमार या अमिताभ बच्चन जैसे ‘संजीदा’ कलाकारों की कतार में कभी जगह नहीं मिली—हालाँकि दर्शकों ने उन्हें दिलों की कतार में हमेशा सबसे आगे रखा।

धर्मेंद्र की एक और दुनिया थी—जिसमें शायरी थी, उर्दू की मिठास थी, मिट्टी की खुशबू थी। मीना कुमारी, दिलीप कुमार और इफ्तेखार से उर्दू सीखने वाले इस देहाती हीरो की संवेदनशीलता पर किसी को संदेह नहीं हो सकता। उन्होंने अपनी आत्मकथा उर्दू में लिखने की कोशिश की—लेकिन जीवन ने उन्हें कभी इतना अवकाश ही नहीं दिया कि वह पूरा हो सके।

फिल्मों से दूर हुए तो लोनावला के फार्महाउस में किसान बन गए। इंस्टाग्राम पर उनके वीडियो में वह मिट्टी के ढेलों को ऐसे उलटते दिखते जैसे अपनी जवानी की फिल्मों के रील पलट रहे हों। कहते—“मिट्टी का बेटा हूँ… मरते-मरते भी कुछ कर जाऊंगा।”
एक बुज़ुर्ग सितारे को अपनी फसलें देखकर जो सुकून मिलता है, वह किसी पुरस्कार से बड़ा था। वे जिस खेत में सब्ज़ी उगाते थे, वहीं अपनी थकान भी गाड़ आते थे।

उनकी कमज़ोरियां भी उतनी ही मानवीय थीं। झगड़ों के किस्से मशहूर हैं—काजल के सेट पर राजकुमार से तकरार हो या शुरुआती दौर में ‘पहलवान’ कहकर दुत्कारा जाना। मगर धर्मेंद्र ने हर ताने को ताक़त में बदला। ‘फूल और पत्थर’ ने उन्हें वह ‘गरम धर्म’ बनाया जिसे 70 के दशक की जनता ने सिर पर बैठा लिया। यही वह गर्मजोशी थी जिसने बाद में उनके गुस्से को कॉमिक-रिलीफ़ भी बनाया और कभी-कभी ‘लोकनायक’ जैसा विस्तार भी दिया।

लेकिन इस गर्मजोशी का दूसरा पहलू भी था—दयालुता। कितने ही संघर्षरत कलाकारों को उन्होंने सहारा दिया, रहने की जगह दी, भोजन दिया, और कभी-कभी तो अपनी फिल्मों में रोल भी। किरण कुमार जैसे कई लोग आज भी यह किस्सा सुनाते हैं कि धर्मेंद्र ने उन्हें मारने से इंकार कर दिया क्योंकि वे उनके दोस्त के बेटे थे। ऐसा दिल अब फिल्मों में दिखाया जाता है, असल ज़िंदगी में कम मिलता है।

धर्मेंद्र की राजनीति एक अधूरी कहानी रही। बीकानेर की तपती रेत में एलोवेरा उगाने के सपने दिखाए, लेकिन दिल्ली की राजनीति की धूल में वे खो गए। शायद अभिनेता के लिए संसद का गलियारा उतना सहज नहीं जितना स्टूडियो का कैमरा।

फिर भी, एक बात निर्विवाद है—धर्मेंद्र किसी एक जमाने के नहीं थे। हर जमाने में उनका अपना आसमान था। 60 के रोमांटिक हीरो, 70 के एक्शन स्टार, 80-90 के धुआँधार माहौल में भी ‘धरम पाजी’ ट्रक उठाते दिखे—और 2000 की पीढ़ी ने उन्हें ‘यमला पगला दीवाना’ के पापा के रूप में अपनाया।

आज वह गांव का सानेवाल, पंजाब का ख़ालिस बेटा, खेतों और परदे का ये देसी शहंशाह, अपनी मिट्टी में लौट गया। लेकिन यह तय है—धर्मेंद्र कभी किसी फिल्म का हिस्सा नहीं थे, फिल्में खुद उनका हिस्सा थीं। वे एयरकंडीशंड ग्रीनरूम के नहीं, खेतों की धूप के कलाकार थे।

और शायद यही कारण है कि वे परदे से उतरकर भी कभी हमसे दूर नहीं होते—एक हाथ में दाती, दूसरे में जिंदगी का गीत लिए वह देहाती हीरो अब भी कहीं न कहीं मुस्कुरा रहा होगा—

“मैं मिट्टी का बेटा हूँ…
फसल बोता रहूँगा—दिलों में भी, परदे पर भी।”

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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