धुरंधर फिल्म काफी दिनों तक मैंने सिर्फ इसलिए नहीं देखी कि मुझसे क्रूरता के दृश्य देखे नहीं जाते—उन्हें तो मुझे फास्ट-फॉरवर्ड करना ही पड़ता है। लेकिन फिर वही पुराना “टेम्पटेशन” आ ही गया—यार, जब सब देख रहे हैं तो हम क्यों पीछे रहें! वैसे सच कहूँ तो ऐसी फिल्मों के दो वर्ज़न होने चाहिए—एक “सॉफ्ट वर्ज़न” हम जैसे संवेदनशील दर्शकों के लिए, और एक “हार्ड वर्ज़न” उनके लिए जो हर दृश्य को बिना पलक झपकाए देख लेते हैं। मेरी मान्यता तो यह है कि अगर हिंसा थोड़ी कम भी दिखाई जाए, गाली-गलौज थोड़ा संयमित हो, तो भी फिल्म की थीम और प्रभाव जस का तस रह सकता है।
अब आता हूँ असली बात पर—आदित्य धर के काम पर। क्या काम किया है! यूँ समझिए कि यह फिल्म सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि फिल्म निर्माण की एक “मास्टर क्लास” है। न इसमें टॉलीवुड की नकल है, न हॉलीवुड की छाया, न किसी पुराने “कल्ट टेम्पलेट” की पुनरावृत्ति। आमतौर पर थ्रिलर-एक्शन फिल्मों का एक घिसा-पिटा ढाँचा होता है, लेकिन यहाँ उससे बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया गया है। वास्तविक घटनाओं को जिस तरह रील के लिए बुना गया है, वह बेहद सधा हुआ और प्रभावशाली है। दोनों ही फिल्मों में कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कोई दृश्य जबरन जोड़ा गया हो या कोई “वाइल्ड कार्ड एंट्री” डाल दी गई हो। निर्देशन इतना सधा हुआ है कि औसत से औसत अभिनेता भी अपनी भूमिका में विश्वसनीय लगने लगता है। चेहरों पर जो ठहराव, भावों की गहराई और मौन संवादों की मुखरता दिखाई देती है—वह सचमुच लाजवाब है।
अब बात करते हैं अंडरकवर एजेंट्स की, जो इस फिल्म की आत्मा हैं।
आदित्य धर ने धुरंधर में जो दिखाया है, वह केवल एक जासूसी थ्रिलर नहीं है; यह उस पूरी अदृश्य, अनुशासित, निर्मम और बहुस्तरीय दुनिया की रचनात्मक व्याख्या है, जिसके बारे में आम दर्शक अक्सर सिर्फ सतही कल्पनाएँ करता है। हिंदी सिनेमा में अब तक अंडरकवर ऑपरेशन का मतलब यही रहा है कि किसी तेज-तर्रार, गुस्सैल, देशभक्त युवक को अचानक उठा लिया गया, दो-चार संवादों में राष्ट्रभक्ति जगा दी गई और उसे दुश्मन देश में भेज दिया गया। आदित्य धर इस आसान और फिल्मी शॉर्टकट को पूरी तरह नकार देते हैं। वे दिखाते हैं कि खुफिया एजेंसियाँ किसी सनक में नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संरचना के तहत काम करती हैं; आवेग में नहीं, बल्कि गहन विश्लेषण के आधार पर निर्णय लेती हैं; और केवल साहस नहीं, बल्कि उस साहस के पीछे छिपी मनोवैज्ञानिक तैयारी को महत्व देती हैं।
यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है कि यहाँ “मिशन” से पहले “मनुष्य” को समझा गया है। एजेंसियाँ किसी व्यक्ति को भर्ती करने से पहले उसके वर्तमान को नहीं, बल्कि उसके भीतर जमा हुए अतीत को पढ़ती हैं। उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, बचपन के आघात, अन्याय के प्रति उसकी प्रतिक्रिया, उसके घाव, उसकी चुप्पियाँ, उसकी टूटन, उसकी सहनशक्ति, उसके प्रतिशोध की दिशा—मानो उसकी नसों में बहती हर कहानी को पढ़ा जाता है। आदित्य धर इस पूरी प्रक्रिया को जिस धैर्य, विश्वास और बारीकी से परदे पर प्रस्तुत करते हैं, वह सचमुच चकित करता है। लगता है जैसे वे सिर्फ कहानी नहीं सुना रहे, बल्कि उस “प्रोसेस” को सम्मान दे रहे हैं, जिसे आमतौर पर फिल्मों में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
जस्किरत सिंह रंगी का चरित्र केवल एक नायक नहीं, बल्कि एक “केस स्टडी” के रूप में सामने आता है—एक ऐसा जीवन जिसे सिस्टम ने कुचला, समाज ने धोखा दिया, सत्ता ने रौंदा और न्याय ने भी अंततः राहत नहीं दी। उसके पिता, जो एक रिटायर्ड सूबेदार थे, सत्ता-प्रेरित हिंसा का शिकार बनते हैं; उसकी बहनों पर अमानवीय अत्याचार होता है; पूरा परिवार बिखर जाता है; एक बहन जीवित होते हुए भी कैद की जिंदगी जीने को मजबूर रहती है। यह सब केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि उस मनोदशा की जमीन तैयार करते हैं, जिसे एजेंसियाँ बाद में पढ़ती हैं। वे देखती हैं कि अन्याय के बोझ तले यह आदमी टूटता है या तपता है, झुकता है या जवाब देता है, बिखरता है या भीतर से और कठोर बन जाता है।
यहीं आदित्य धर का लेखन साधारण से असाधारण बन जाता है। जस्किरत को एक रोते-बिलखते, दया माँगते, हार मान चुके व्यक्ति के रूप में नहीं दिखाया गया। वह प्रतिकार करता है, अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है और उन शक्तिशाली लोगों को चुनौती देता है, जिनके सामने सामान्य व्यक्ति अक्सर घुटने टेक देता है। और फिर विडंबना यह कि स्पष्ट अन्याय का शिकार होने के बावजूद वही व्यवस्था उसके खिलाफ खड़ी हो जाती है—अदालत उसे मृत्युदंड सुना देती है। लेकिन यहीं खुफिया एजेंसियों की दृष्टि सामने आती है। वे इस “दंडित अपराधी” में भी संभावना तलाश लेती हैं। वे केवल अपराध नहीं देखतीं, वे क्षमता देखती हैं; केवल क्रोध नहीं, उसकी दिशा देखती हैं; केवल हिंसा नहीं, उसके भीतर छिपी अनुशासित ऊर्जा को पहचानती हैं। आदित्य धर इस बिंदु को जिस संवेदनशीलता से पकड़ते हैं, वह अत्यंत प्रभावशाली है।
फिल्म का एक और मजबूत पक्ष यह है कि भर्ती का आधार केवल वर्तमान विद्रोह नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही निष्ठा भी है। जाँच में सामने आता है कि जस्किरत का दादा सेना में था, पिता सेना में था और वह स्वयं भी सेना में जाने वाला था। यानी यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि रक्त में रची-बसी अनुशासन और देशभक्ति की विरासत है। एजेंसियाँ ऐसे ही व्यक्तियों को तलाशती हैं—जिनमें वंशानुगत निष्ठा हो और अनुभवजन्य आक्रोश भी उतना ही प्रखर हो। इसी द्वंद्व से एक अंडरकवर ऑपरेटिव जन्म लेता है—जहाँ वफादारी और घाव एक साथ चलते हैं।
लेकिन आदित्य धर का सबसे सुंदर और परिपक्व स्पर्श यहाँ आता है कि वे इस पूरे चयन-प्रक्रिया को किसी “रोमांटिक पैकेज” की तरह प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उसे एक कठिन, कड़वा और गहराई से नैतिक प्रस्ताव के रूप में रखते हैं। वे साफ-साफ बताते हैं—यह रास्ता चुनोगे तो यह कोई आसान सफर नहीं होगा। यह कोई फिल्मी हीरो बनने की सीढ़ी नहीं, बल्कि अपने ही अस्तित्व को धीरे-धीरे त्याग देने की प्रक्रिया है।
जस्किरत को मनाना आसान नहीं है। वह उस देश से आहत है, जिसके लिए उसके घर की कई पीढ़ियाँ समर्पित रहीं। उसका वह संवाद—कि देशप्रेम तो हमारे खून में था, लेकिन बदले में हमें क्या मिला—सिर्फ एक पात्र की पीड़ा नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर खड़ा किया गया एक तीखा, असहज और जरूरी प्रश्न है। यह उस व्यक्ति की आवाज है जिसे व्यवस्था ने पहले तोड़ा, फिर अपराधी ठहराया, और अब उसी से नायक बनने की उम्मीद की जा रही है।
और यहीं अजय सान्याल का उत्तर आता है—गुरु ग्रंथ साहिब की वह अमर पंक्ति, “सूरा सो पहचानिए…”—जो केवल संवाद नहीं रह जाती, बल्कि जस्किरत के भीतर सोई हुई चेतना को झकझोर देती है। यह संवाद उसे केवल एक ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं करता, बल्कि उसके जीवन को एक नया अर्थ देता है। यही कारण है कि यह लेखन अपने शिखर पर दिखाई देता है—क्योंकि यहाँ राष्ट्रवाद का शोर नहीं है, बल्कि कर्तव्य की गंभीरता है। यह बताता है कि लड़ाई किसी पदक या पहचान के लिए नहीं होती, बल्कि धर्मार्थ—अर्थात् न्याय, अधिकार, अपने स्वप्न, अपने परिवार और अपने कारण के लिए होती है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी मोर्चे पर लड़ता ही है, और हर लड़ाई पर उसे कोई सम्मान-पत्र नहीं मिलता।
यहीं फिल्म अपनी सबसे बड़ी ईमानदारी दिखाती है। यह अंडरकवर जीवन का कोई चमकदार, ग्लैमरस पोस्टर नहीं बनाती। यह स्पष्ट कर देती है कि यह रास्ता सुविधा का नहीं, सतत सतर्कता का है। यहाँ पहचान धीरे-धीरे मिटती है, परिवार पीछे छूट जाता है, संदेह स्थायी साथी बन जाता है और हर क्षण अनहोनी की संभावना आपके साथ चलती रहती है। यह हिंदी सिनेमा के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है, क्योंकि पहली बार किसी फिल्मकार ने केवल मिशन नहीं, बल्कि मिशन से पहले मनुष्य के निर्माण, परीक्षण, चयन और मानसिक पुनर्गठन को केंद्र में रखा है।
आदित्य धर की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उन्होंने परदे पर उन अनाम लोगों के प्रति एक शांत, गरिमामय और प्रभावी श्रद्धांजलि रची है, जो बिना वर्दी के भी युद्धभूमि में मौजूद होते हैं। जिनकी बहादुरी टीवी डिबेट का हिस्सा नहीं बनती, जिनकी सफलताओं पर कोई जश्न नहीं होता, जिनकी असफलताओं पर कोई शोकसभा नहीं होती—लेकिन जिनकी वजह से हममें से अधिकांश लोग अपने घरों में चैन की नींद सो पाते हैं। धुरंधर इस अर्थ में केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक स्मरण है—कि हर सैनिक सीमा पर दिखाई नहीं देता, हर युद्ध बंदूक और बारूद से नहीं लड़ा जाता, और हर नायक की पहचान उसके नाम से नहीं होती।
आदित्य धर के लिए सचमुच जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। उन्होंने जासूसी को तमाशा नहीं बनने दिया, उसे एक सुगठित प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया; देशभक्ति को नारा नहीं बनने दिया, उसे आंतरिक अनुशासन की नींव बनाया; और प्रतिशोध को उन्माद नहीं बनने दिया, उसे एक बड़ी राष्ट्रीय भूमिका की ओर मोड़ दिया। यही एक गंभीर लेखक-निर्देशक की पहचान होती है—वह दृश्य नहीं, दृष्टि देता है। धुरंधर में वही दृष्टि है—बहुत तीखी, बहुत सधी हुई और बहुत देर तक मन में ठहर जाने वाली।
शायद भारतीय सिनेमा का भविष्य ऐसे ही पुनर्लेखन से तय होगा। भूल जाइए कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के कितने रिकॉर्ड तोड़ेगी—इसे उसी तरह याद रखा जाएगा, जैसे शोले या मदर इंडिया को याद रखा जाता है।
जय हिंद।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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