मैं एक द्विचक्र-वाहिनी हूँ।
हाँ, वही—जो आज घर के कोने में खड़ी नहीं, बल्कि दीवार से सटाकर टिका दी गई है; जैसे कोई भूला-बिसरा वृद्ध, जिसकी लाठियाँ टूट चुकी हों और जो किसी दीवार का सहारा लेकर अपने अस्तित्व को बचाए खड़ा हो। मैं भी वैसे ही खड़ी हूँ—न पूरी तरह जीवित, न पूरी तरह त्यागी हुई। मेरी श्रृंखला शिथिल पड़ चुकी है, मेरे पादचक्र कभी-कभी करुण स्वर में कराह उठते हैं, मेरा दिशा-नियंत्रक दण्ड आज भी उन असंख्य हथेलियों की ऊष्मा को स्मरण करता है जिन्होंने मुझे थामा था। मेरा ढाँचा, जो मेरी अस्थि-संरचना है, आज भी अनेक पीढ़ियों का भार वहन करने के पश्चात् अडिग खड़ा है—कुछ जंग खाया, कुछ झुका हुआ, पर टूटा नहीं।
मैंने समय को अपने चक्रों पर घूमते देखा है। मेरे चक्रावरण ने कच्ची गलियों की धूल का स्वाद भी चखा है और पक्की सड़कों के गर्व को भी सहा है। जब पहली बार मुझे घर लाया गया था, तब मेरी वृत्तधार में चमक थी, मेरे तार-दण्ड तनकर खड़े रहते थे, और मेरी घण्टा-नादिनी में भविष्य की अनकही संभावनाओं की झंकार गूँजती थी। मैं किसी विलासी कुल की नहीं थी, न किसी आडम्बरपूर्ण प्रदर्शन का साधन—मैं साधारण थी, पर आत्मसम्मान से परिपूर्ण थी।
मेरे आसन पर बैठा था घर का वह बालक—पिता का दुलारा, माता की आँखों का प्रकाश। पिता ने मेरे आसन-उन्नयन और अवनयन को अत्यन्त सावधानी से निर्धारित किया था; उस बालक की ऊँचाई के अनुसार, मानो उसके भविष्य की सीमाएँ तय कर रहे हों। माता ने मेरी श्रृंखला-आवरण पर स्नेहपूर्वक वस्त्र फेर दिया था—वह स्नेह जो किसी निर्जीव वस्तु और अपने पुत्र के बीच कोई भेद नहीं करता। उनके लिए मैं केवल एक द्विचक्र-वाहिनी नहीं थी, बल्कि उनके पुत्र की पहली स्वतंत्र उड़ान का साधन थी।
मैंने गिरते-पड़ते सीखे गए संतुलन के असंख्य पाठ देखे हैं। जब पहली बार मेरा स्थिरक-दण्ड हटाया गया, तब बालक के साथ-साथ मैं भी क्षणभर को काँप उठी थी। मेरे निरोधक-यंत्र ने कई बार समय से पूर्व जीवन की रक्षा की और कई बार विलम्ब से जीवन का कठोर पाठ पढ़ाया। घुटनों पर लगे छिलके, हथेलियों पर उभरे घाव—मेरी आत्मकथा के वे अध्याय हैं, जो न किसी पुस्तक में अंकित हैं, न किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाते हैं, पर जीवन भर स्मृति में जलते रहते हैं।
मेरी धुरी ने गाँव की सीमाएँ नापीं, मेरे पाद-परिवर्तक ने बाल्यावस्था की जिद और हठ को सहन किया, और मेरी कीचड़-निवारक पटलिका ने वर्षा की छींटों से बालक और मुझे—दोनों को बचाया। विद्यालय की कच्ची-पक्की राहें, संध्या के अभ्यास-पथ, और पर्वों की उल्लास-यात्राएँ—सब मेरी धुरी पर ही घूमती रहीं। मैं केवल चलने का साधन नहीं थी, मैं उस बालक के लिए संसार की पहली माप-रेखा थी।
फिर समय ने अपनी गति बदली। घर में एक नई द्विचक्र-वाहिनी आई—बहु-चाल-सम्पन्न, बहु-वर्णीय और नव्यता के गर्व से भरी हुई। मेरे तार-दण्ड मानो एक-दूसरे से दृष्टि चुराने लगे। मैं धीरे-धीरे घर के कोने में पहुँचा दी गई। मेरे चक्रावरण की वायु क्षीण होती चली गई, जैसे स्मृतियों से शब्द धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हों। मेरी श्रृंखला पर काल का जंग चढ़ गया, पर स्मृतियाँ अब भी उज्ज्वल रहीं—अडिग, अमिट।
आज जब कोई मुझे देखता है, तो मेरी घण्टा-नादिनी नहीं बजती—अंतरात्मा गूँज उठती है। मैं जानती हूँ, मैं अब न तीव्र हूँ, न आधुनिक; पर मैं वही हूँ जिसने चलना सिखाया, जिसने संतुलन का दर्शन कराया, जिसने गिरकर उठने की विद्या दी।
मैं एक द्विचक्र-वाहिनी हूँ—
श्रृंखलाओं में बँधी स्मृतियों की,
ढाँचे में जड़ी पीढ़ियों की,
और चक्रों पर घूमती—
एक जीर्ण-शीर्ण, पर अविनाशी आत्मकथा।
Comments ( 0)
Join the conversation and share your thoughts
No comments yet
Be the first to share your thoughts!