आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक विचारधाराओं की दुनिया में एकात्म मानववाद एक महत्वपूर्ण भारतीय दृष्टि के रूप में सामने आता है। इस विचारधारा का प्रतिपादन Pandit Deendayal Upadhyaya ने बीसवीं शताब्दी के मध्य में किया था। उस समय विश्व की राजनीति और अर्थव्यवस्था मुख्यतः दो विचारधाराओं के प्रभाव में थी—पूंजीवाद और समाजवाद। एक ओर पूंजीवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी संपत्ति को सर्वोच्च मानता था, तो दूसरी ओर समाजवाद समानता और राज्य नियंत्रण को सर्वोपरि मानकर चल रहा था। इन दोनों विचारधाराओं ने आधुनिक विश्व को गहरे रूप से प्रभावित किया, परंतु समय के साथ यह भी स्पष्ट होने लगा कि दोनों ही दृष्टियाँ मनुष्य के जीवन को पूरी तरह समझने में कहीं न कहीं अधूरी हैं। इसी अधूरेपन को ध्यान में रखते हुए भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर एक ऐसे समन्वित दर्शन की आवश्यकता महसूस हुई जो मनुष्य को उसके समग्र रूप में समझ सके। यही प्रयास आगे चलकर एकात्म मानववाद के रूप में सामने आया।
एकात्म मानववाद का मूल विचार अत्यंत सरल किंतु गहरा है—मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी के रूप में नहीं देखा जा सकता। पश्चिमी आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराएँ अक्सर मनुष्य को मुख्यतः उत्पादन और उपभोग से जुड़ी इकाई के रूप में देखती रही हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य को बाजार का उपभोक्ता और श्रम का उत्पादक माना गया, जबकि समाजवादी व्यवस्था में उसे वर्ग संघर्ष की इकाई के रूप में परिभाषित किया गया। परंतु भारतीय चिंतन परंपरा मनुष्य को केवल शरीर तक सीमित नहीं मानती। यहाँ मनुष्य को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से मिलकर बना एक समग्र अस्तित्व माना गया है। एकात्म मानववाद इसी भारतीय दृष्टि को आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में प्रस्तुत करता है। यह कहता है कि यदि विकास केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित रह जाए तो मनुष्य का व्यक्तित्व अधूरा रह जाएगा, और यदि केवल आध्यात्मिक विकास पर ही बल दिया जाए तथा भौतिक आवश्यकताओं की उपेक्षा कर दी जाए तो भी जीवन संतुलित नहीं रह सकता। इसलिए वास्तविक विकास वही है जिसमें मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—इन चारों आयामों का संतुलित विकास हो।
इसी प्रकार एकात्म मानववाद व्यक्ति और समाज के संबंध को भी नए दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करता है। पश्चिमी राजनीतिक विचारधाराओं में अक्सर व्यक्ति और समाज को परस्पर विरोधी रूप में प्रस्तुत किया गया है। पूंजीवाद में व्यक्ति की स्वतंत्रता को इतना महत्व दिया गया कि कई बार सामाजिक संतुलन और समानता की उपेक्षा होने लगी, जबकि समाजवाद में समाज और राज्य को इतना अधिक महत्व दिया गया कि व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो गई। एकात्म मानववाद इस द्वंद्व को स्वीकार नहीं करता। इसके अनुसार व्यक्ति और समाज एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। व्यक्ति समाज में रहकर ही विकसित होता है और समाज व्यक्तियों के सहयोग से ही आगे बढ़ता है। इसलिए स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था वही होगी जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की समरसता दोनों का संतुलन बना रहे।
एकात्म मानववाद राष्ट्र की अवधारणा को भी केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं रखता। इस दृष्टि में राष्ट्र केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि वह एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता है। किसी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी सीमाओं या उसकी राजनीतिक व्यवस्था से नहीं होती, बल्कि उसकी संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों से होती है। यही कारण है कि इस दर्शन में संस्कृति को राष्ट्र की आत्मा कहा गया है। भूमि, जनसमूह, राजनीतिक व्यवस्था और सांस्कृतिक चेतना—ये चारों मिलकर राष्ट्र की संपूर्णता को व्यक्त करते हैं, परंतु इन सबको जोड़ने वाली शक्ति संस्कृति ही होती है। यदि राष्ट्र का विकास केवल आर्थिक या राजनीतिक दृष्टि से किया जाए और उसकी सांस्कृतिक आत्मा की उपेक्षा कर दी जाए, तो वह विकास स्थायी और संतुलित नहीं रह सकता।
आर्थिक दृष्टि से भी एकात्म मानववाद एक संतुलित मार्ग प्रस्तुत करता है। यह न तो अनियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थन करता है और न ही अत्यधिक केंद्रीकृत समाजवादी व्यवस्था का। इसके अनुसार अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना या पूंजी का संचय करना नहीं होना चाहिए, बल्कि मानव कल्याण को केंद्र में रखकर आर्थिक व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए। इस दृष्टि में विकेंद्रीकरण को महत्वपूर्ण माना गया है। स्थानीय संसाधनों और स्थानीय उत्पादन को महत्व देना, ग्राम आधारित विकास को बढ़ावा देना और श्रम के सम्मान को स्थापित करना इस आर्थिक दृष्टि के महत्वपूर्ण तत्व हैं। इसका उद्देश्य ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है जिसमें विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँच सके और आर्थिक व्यवस्था मनुष्य के जीवन को संतुलित और सुखद बनाने का माध्यम बन सके।
भारतीय जीवन-दर्शन में जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। एकात्म मानववाद इस पारंपरिक अवधारणा को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करता है। इसके अनुसार अर्थ और काम का विकास आवश्यक है, परंतु उनका संचालन धर्म के मार्गदर्शन में होना चाहिए। यदि आर्थिक और भौतिक इच्छाएँ नैतिक मूल्यों से नियंत्रित न हों तो समाज में लालच, शोषण और असंतुलन बढ़ सकता है। इसलिए आर्थिक विकास को नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ जोड़कर देखना इस दर्शन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध को लेकर भी एकात्म मानववाद एक संतुलित दृष्टि प्रस्तुत करता है। आधुनिक औद्योगिक विकास ने प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। एकात्म मानववाद इस समस्या का समाधान प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की भावना में खोजता है। यह कहता है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध शोषण का नहीं बल्कि सहयोग और संतुलन का होना चाहिए। विकास का ऐसा मॉडल अपनाया जाना चाहिए जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखे और आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखे।
आज की दुनिया में जब आर्थिक असमानता बढ़ रही है, सांस्कृतिक विघटन दिखाई दे रहा है और मनुष्य मानसिक तनाव तथा सामाजिक अलगाव से जूझ रहा है, तब एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता और भी स्पष्ट हो जाती है। यह दर्शन हमें याद दिलाता है कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं है। वास्तविक विकास वह है जिसमें मनुष्य का समग्र व्यक्तित्व विकसित हो, समाज में सहयोग और समरसता बनी रहे, संस्कृति सुरक्षित रहे और प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित हो सके। इस दृष्टि से एकात्म मानववाद केवल एक राजनीतिक विचारधारा नहीं बल्कि भारतीय चिंतन की उस परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है जो जीवन को समग्रता में देखने की प्रेरणा देती है। यही कारण है कि इसे अक्सर एक ऐसे मार्ग के रूप में देखा जाता है जो पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की सीमाओं से आगे बढ़कर मानव जीवन के संतुलित और समग्र विकास की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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