एप्सटीन फाइल्स: सत्ता, सेक्स और नैतिकता का गहरा अंधकार
एप्सटीन फाइल्स पर सोशल मीडिया में इन दिनों एक वायरल बहस चल रही है। रोज़ नई फाइलें खुलने की बात कही जा रही है। “यू टू… यू टू…” का शोर है—मानो हर कोई किसी पर उंगली उठा रहा हो। पर यदि इस पूरे घटनाक्रम को थोड़ी गहराई से देखें, तो यह केवल सनसनी नहीं है; यह उस मानसिकता का आईना है, जो शक्ति, धन और प्रभाव के शिखर पर बैठकर यह मान बैठती है—“हम ही व्यवस्था हैं। हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा।”
Jeffrey Epstein के मामले में अदालतों में दर्ज तथ्य चौंकाने वाले हैं। 2025 में न्याय विभाग के एक मेमो के अनुसार, इस मामले में एफ़बीआई के पास 300 गीगाबाइट से अधिक डेटा और सबूत हैं। न्याय विभाग का कहना है कि इनमें पीड़ितों की बड़ी संख्या में तस्वीरें और वीडियो शामिल हैं, जो बच्चों के शोषण से जुड़े हैं। पीड़िताओं की गवाहियाँ और उसके नेटवर्क से जुड़े दस्तावेज़ों ने जिस तंत्र का संकेत दिया, वह भयावह था। इस नेटवर्क में राजनेताओं से लेकर उद्योगपतियों, अकादमिक जगत और सांस्कृतिक क्षेत्र तक के नाम चर्चा में आए।
सार्वजनिक विमर्श में Bill Gates, Bill Clinton, Donald Trump, Noam Chomsky, Stephen Hawking, Deepak Chopra जैसे नामों का उल्लेख हुआ। परंतु यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नाम का उल्लेख और अपराध सिद्ध होना—दो अलग बातें हैं। किसी दस्तावेज़ में नाम आ जाना या किसी कार्यक्रम में दिखाई दे जाना अपराध का प्रमाण नहीं होता। कानून तथ्यों पर चलता है, अफवाहों पर नहीं।
फिर भी एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—ऐसा आकर्षण पैदा क्यों होता है? क्यों दुनिया के शीर्ष पर बैठे लोग—जो शेयर बाज़ारों को प्रभावित कर सकते हैं, नीतियाँ बना सकते हैं, वैश्विक विमर्श को दिशा दे सकते हैं—ऐसे नैतिक दलदल में उतर जाते हैं?
मनोविज्ञान बताता है कि निरंकुश शक्ति व्यक्ति में दंड-मुक्ति का भ्रम पैदा करती है। जब कोई व्यक्ति धन, प्रतिष्ठा और प्रभाव के ऐसे घेरे में घिर जाता है, जहाँ विरोध की आवाज़ें छनकर ही पहुँचती हैं, तब उसकी इच्छाएँ धीरे-धीरे अधिकार में बदलने लगती हैं। “मैं चाहता हूँ” से “मुझे मिलना ही चाहिए” तक की यात्रा बहुत लंबी नहीं होती। और यही वह बिंदु है जहाँ इच्छाएँ अपराध में परिवर्तित हो सकती हैं।
खेल जगत का उदाहरण लें। Tiger Woods का सेक्स स्कैंडल सामने आने पर उनके सार्वजनिक माफ़ीनामे और साक्षात्कार में एक बात स्पष्ट झलकती थी—उन्होंने स्वीकार किया कि वे यह मान बैठे थे कि धन और शक्ति के कारण वे अपने आसपास मौजूद हर प्रलोभन का आनंद लेने के अधिकारी हैं। यह स्वीकारोक्ति केवल व्यक्तिगत पतन की कथा नहीं थी, बल्कि उस मानसिक संरचना की झलक थी, जहाँ उपलब्धियाँ आत्म-नियंत्रण को क्षीण कर देती हैं।
कई रिपोर्टों और षड्यंत्र-चर्चाओं में यह भी दावा किया गया कि कुछ अपराधियों द्वारा बच्चों को टॉर्चर किया जाता था, क्योंकि अत्यधिक तनाव की स्थिति में शरीर में Adrenochrome जैसा रसायन बनता है, जिसे पीकर युवा बने रहने का भ्रम पाला जाता है। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय ऐसे दावों को प्रमाणित नहीं मानता, पर यह सच है कि विकृत मानसिकता निरंतर उत्तेजना, नए रोमांच और वर्चस्व की तलाश में रहती है। जब साधारण सुख पर्याप्त नहीं लगता, तब व्यक्ति जोखिमपूर्ण सीमाएँ पार करने लगता है।
“हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा”—यही भावना हर बड़े अपराध की जड़ में होती है। यह केवल पश्चिम की कहानी नहीं है। सत्ता और पाखंड का गठजोड़ हर समाज में देखा जा सकता है। धर्म, राजनीति, व्यापार—हर क्षेत्र में ऐसे लोग मिलते हैं जो सार्वजनिक मंच पर नैतिकता की भाषा बोलते हैं, पर निजी जीवन में शोषण और दुराचार के आरोपों से घिरे रहते हैं।
अमेरिका में एप्सटीन फाइल्स एक कानूनी प्रक्रिया के तहत सामने आईं। पर यह मान लेना कि ऐसी कहानियाँ केवल एक देश तक सीमित हैं, एक भोला निष्कर्ष होगा। हर समाज में ऐसी फाइलें हो सकती हैं—जो अभी खुली नहीं, दबाई गई हों; जिनमें पीड़ितों की आवाज़ें कैद हों; जहाँ प्रभावशाली लोग जाँच को प्रभावित करने का प्रयास करें।
सत्ता का चरम यदि जवाबदेही से मुक्त हो जाए, तो वह विकृत हो जाता है। और जब यह विकृति सामाजिक संरचना में घर कर ले, तो उसका परिणाम केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होता है। व्यवस्था तभी स्वस्थ रह सकती है जब शक्ति पर अंकुश, कानून की पारदर्शिता और समाज की नैतिक सजगता जीवित रहे। इतिहास बार-बार यही बताता है—सत्ता का सबसे बड़ा नशा वही है, जो व्यक्ति को यह भ्रम दे दे कि वह अजेय है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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