गणगौर : स्मृतियों के आँगन में सजी एक जीवित परंपरा
गणगौर … नाम लेते ही जैसे मन के किसी कोने में फागुन की खुशबू तैर जाती है। कुछ लोक परंपराओं के त्योहार—सावन तीज, सिंधारा/सिंजारा, हरियाली तीज, गंगौरी तीज—मानो एक ही भावधारा के अलग-अलग रंग हों। तीज के नाम पर तो कई प्रदेशों में पूरे-पूरे उत्सवों की शृंखला चलती है; नेपाल में तो “तीज” अपने आप में ही एक विराट पर्व है। सच कहें तो—
तीज = सावन + स्त्री + सौंदर्य + प्रेम + लोकजीवन का उत्सव।

कैसे भूलें वे स्मृतियाँ… गाँव के परिवेश में पले-बढ़े हम लोगों के लिए हर त्योहार अपने साथ एक कौतूहल लेकर आता था। उस समय त्योहारों को मनाने के पीछे का उद्देश्य या दार्शनिक अर्थ भले न समझ आता हो, लेकिन भागीदारी पूरी होती थी—बिना किसी तर्क के, पूरे मन से।
गणगौर में तो हमारी भी अपनी “महत्त्वपूर्ण भूमिका” होती थी—गौर-इसर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लाना, बड़ी लड़कियों के आदेश पर कुएँ से पानी खींचना, उनके लोटे भरना, उनके पीछे-पीछे चलते हुए गीतों की नकल करना… और हाँ, घर में बनते पकवानों और मिठाइयों को “उदरस्थ” करना—यह तो हमारा विशेषाधिकार था!
अब समझ में आता है कि हर त्योहार कितना मायने रखता था। शहर में आकर वे परंपराएँ कुछ धुंधली-सी, औपचारिक-सी हो गई हैं। हाँ, भला हो “इवेंट मैनेजमेंट” वालों का—जिन्होंने इन परंपराओं को फिर से तड़क-भड़क के साथ जीवित करने की कोशिश तो की है, भले ही उनमें वह सहज आत्मा कम दिखती हो।
गणगौर के बारे में तो निस्संदेह कहा जा सकता है—
यह केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन की भावनाओं, आशाओं और सौंदर्य का उत्सव है—जहाँ हर रंग में प्रतीक्षा है, हर गीत में प्रेम है और हर रीति में विश्वास।
मुझे आज भी याद है—हमारे गाँव में गणगौर आने के लगभग पंद्रह दिन पहले से ही एक अलग-सी हलचल शुरू हो जाती थी। जैसे किसी बड़े मेहमान के स्वागत की तैयारी हो रही हो। खासकर घर की कन्याएँ और महिलाएँ तो मानो इस पर्व की धुरी ही होती थीं।
सुबह-सुबह, जब सूरज की किरणें अभी पूरी तरह फैली भी नहीं होती थीं, तब सिर पर घड़ा या लोटा रखे, रंग-बिरंगी चुनरी ओढ़े, माथे पर बिंदी, आँखों में काजल और हाथों में मेहंदी रचाए लड़कियाँ और औरतें कुएँ की ओर निकल पड़ती थीं। वह दृश्य किसी चलचित्र से कम नहीं लगता—धीरे-धीरे चलती कतारें, पायल की छनक, और आपस में होती हल्की-फुल्की चुहल।
कुएँ से जल भरकर लाना केवल एक क्रिया नहीं था, बल्कि एक सामूहिक अनुष्ठान था—जैसे हर घड़े में वे अपने सपनों और श्रद्धा को भरकर ला रही हों। घर पहुँचकर उसी जल से इसर-गणगौर को “जल पिलाया” जाता।
मिट्टी की छोटी-छोटी, लेकिन अत्यंत सुंदर मूर्तियाँ—इसर (भगवान शिव) और गंगौर (माता पार्वती)—को बड़े स्नेह से बनाया जाता। उन्हें पाटे पर बिठाया जाता, सिंदूर, मेहंदी और रंग-बिरंगी टिपकियों से सजाया जाता। उस सजावट में कोई कृत्रिमता नहीं होती थी—बस एक सहज सौंदर्य, जैसे गाँव की मिट्टी ही सिंगार बन गई हो।

फिर शुरू होता गीतों का दौर…
“गोर गवर गणगौर माता…”
इन गीतों में कहीं ससुराल की कल्पना थी, कहीं पति की दीर्घायु की कामना, और कहीं किशोरी मन की अल्हड़ इच्छाएँ।
सबसे सुंदर दृश्य होता था—जिठानी, ननद, देवरानी, पड़ोस की महिलाएँ—सब एक साथ बैठकर गीत गातीं, हँसतीं, कभी-कभी पुराने किस्से छेड़ देतीं… हल्की-फुल्की चुहलबाज़ी, छेड़छाड़, गारियाँ—सास-बहू से लेकर जिठानी-देवरानी तक—यह सब उस माहौल का हिस्सा था। यह केवल पर्व नहीं, एक जीवंत सामाजिक संवाद था—जहाँ रिश्ते भी निखरते थे और मन भी।
गणगौर की कथा तो आप जानते ही होंगे—यह माता पार्वती के तप, समर्पण और दांपत्य सौभाग्य का प्रतीक है। अविवाहित लड़कियाँ अच्छे वर की कामना करती हैं और विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं। लेकिन गाँव के परिवेश में यह सब केवल “व्रत” तक सीमित नहीं रहता—यह जीवन का उत्सव बन जाता है।
आज जब शहरों में गणगौर एक “इवेंट” बनकर रह गया है, तब उन दिनों की याद और भी कीमती लगती है—जब यह पर्व सचमुच “जीया” जाता था, निभाया नहीं जाता था।
वह क्या ज़माना था… हम क्यों न चिपके रहें उस स्वर्णिम समय से—जब गाँव की गलियों में रिश्ते खिलते थे, औरतों की हँसी गूँजती थी, और मिट्टी की मूर्तियों में भी एक जीवंत आत्मा बसती थी।
काश… फिर से सजीव हो उठें ये त्योहार।
हमारे बच्चे भी इन परंपराओं को समझें, उन्हें जिएँ।
लेकिन यह भी सच है—आज अगर अपनी बेटी से कहूँ कि आओ, गणगौर की मिट्टी की मूर्ति बनाते हैं… तो वह शायद मुस्कराकर कहे—
“अच्छा पापा, आप रहने दो… मेरी कॉम्पिटिशन की तैयारी ज़्यादा ज़रूरी है!”
और मैं… बस मुस्कराकर रह जाऊँ—
अपनी स्मृतियों के आँगन में गणगौर को फिर से सजाते हुए… 🌼
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