घर: ईंट-पत्थरों से आगे, अपनेपन का निवास
घर आखिर होता क्या है?
क्या वह केवल ईंट, पत्थर, सीमेंट और लोहे से खड़ा किया गया कोई ढांचा है? क्या वह केवल चार दीवारें और एक छत है, जिसमें दरवाज़े-खिड़कियाँ लगी हों? अगर सच यही होता, तो शहरों में खड़े हजारों मकान भी उतने ही गर्मजोशी से भरे होते जितने किसी छोटे कस्बे की कच्ची मिट्टी की झोंपड़ी। पर हम जानते हैं कि ऐसा नहीं है।
असल में मकान और घर दो अलग चीज़ें हैं। मकान तो बस एक भौतिक संरचना है—एक पता, एक लोकेशन, एक प्रॉपर्टी, एक एसेट। लेकिन घर तब बनता है जब उसमें “अपने” बसते हैं—और वे अपने भी ऐसे, जिनमें सचमुच अपनापन हो। वरना कई बार ऐसा भी होता है कि अपने ही धीरे-धीरे पराये लगने लगते हैं और अपनों के बीच भी घर कब मकान में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। जिस घर में अपने ही अपनों को धोखा देते हों, जहाँ रिश्ते केवल स्वार्थ और द्वार्थ-पूर्ति से बंधे हों, वह घर भी उतना ही काटने को दौड़ता है जितना कोई सूना मकान। इसलिए जब तक उसमें अपनापन नहीं, तब तक वह मकान ही रहता है—चाहे वह कितनी भी महंगी कॉलोनी में क्यों न बना हो।
कभी गौर कीजिए, जब कोई व्यक्ति लंबे समय बाद अपने घर लौटता है तो उसे सबसे पहले क्या याद आता है? दीवारों का रंग? फर्श की टाइलें? महंगा वॉशबेसिन? या फिर वह दरवाज़ा, जो खुलते ही माँ की आवाज़ से घर को भर देता है—“आ गया बेटा?” या पत्नी की वह हल्की-सी शिकायत में भी भीगा हुआ स्नेह—“कितनी देर कर दी… सुनो, टाइम पर घर आया करो।”
दरअसल घर की पहचान उसकी वास्तुकला से नहीं, उसके भीतर बसने वाली आवाज़ों, रिश्तों और स्मृतियों से होती है।
बिना अपनेपन के मकान अक्सर खालीपन का संग्रहालय बन जाते हैं। वहाँ सब कुछ मौजूद होता है—फर्नीचर, सजावट, आधुनिक सुविधाएँ—लेकिन फिर भी कुछ कमी सी महसूस होती है। जैसे कोई संगीत हो जिसमें सुर तो हों, पर भाव न हो। ऐसे मकानों में रहने वाले लोग अक्सर महसूस करते हैं कि वे किसी जगह रह तो रहे हैं, पर ठहर नहीं पा रहे। भीतर कहीं एक बेचैनी रहती है, जैसे मन किसी अदृश्य दरवाज़े को ढूँढ़ रहा हो।
हमारे जीवन की सबसे गहरी स्मृतियाँ भी घर से ही जुड़ी होती हैं। बचपन में बरामदे में खेलना, रसोई से आती ताज़ी रोटी की खुशबू, शाम को छत पर बैठकर देर तक बातें करना, साथ में टीवी पर रामायण या महाभारत का धारावाहिक देखना, सर्दियों में अंगीठी के चारों ओर बैठकर हाथ सेंकना—ये सब अनुभव मिलकर घर का अर्थ रचते हैं। यही कारण है कि बहुत से लोग बड़े शहरों में शानदार फ्लैटों में रहते हुए भी अपने पुराने छोटे घर को याद करते रहते हैं। क्योंकि वहाँ सुविधाएँ कम थीं, पर अपनापन अधिक था।
आज के समय में घर का यह अर्थ थोड़ा बदलता हुआ भी दिखता है। शहरों की तेज़ रफ्तार, नौकरी की मजबूरियाँ और जीवन की व्यस्तताएँ लोगों को एक जगह टिकने नहीं देतीं। लोग एक शहर से दूसरे शहर जाते रहते हैं, किराए के फ्लैट बदलते रहते हैं। धीरे-धीरे मकान बदलना आसान हो जाता है, लेकिन घर बनाना कठिन होता जाता है।
शायद इसी वजह से आजकल बहुत से लोग अपने भीतर एक अदृश्य घर खोजते रहते हैं—ऐसी जगह जहाँ वे बिना किसी दिखावे के, बिना किसी भूमिका के, बस अपने आप हो सकें। जहाँ उन्हें यह डर न हो कि उन्हें हर समय कुछ साबित करना है।
घर दरअसल वह जगह है जहाँ आपको स्वीकार किया जाता है।
जहाँ आपकी कमज़ोरियाँ भी उतनी ही सहजता से स्वीकार होती हैं जितनी आपकी सफलताएँ। जहाँ कोई यह नहीं पूछता कि आप कितने सफल हैं, बल्कि यह पूछता है—“तुम थके तो नहीं हो?”
अगर किसी मकान में यह संवेदना नहीं है, तो वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह केवल एक ठिकाना भर है। वहाँ रहना संभव है, लेकिन वहाँ जीना मुश्किल होता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि शायद जीवन का सबसे बड़ा सुख भी यही है कि इंसान को कहीं ऐसा घर मिल जाए जहाँ वह अपनेपन की गर्माहट महसूस कर सके। और अगर ऐसा घर हमें मिल जाए, तो फिर वह चाहे छोटा हो, साधारण हो, या शहर के किसी कोने में बना हो—वह दुनिया की सबसे कीमती जगह बन जाता है।
सही कहा गया है—घर वह जगह नहीं है जहाँ हम रहते हैं, बल्कि वह है जहाँ हमारे “अपने” रहते हैं।
और जहाँ अपने होते हैं, वहीं से जीवन को ठहरने की, मुस्कुराने की और फिर से शुरू होने की ताकत मिलती है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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