कल सोशल मीडिया—ख़ासकर फेसबुक की दीवारों—पर कान लगाकर एक फुसफुसाहट सुनी। यह आवाज़ थी हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई फ़िल्म हक की। मैं फिल्माहोलिक भला क्यूँ पीछे रहता ,दिन में ही इस मूवी का नाम श्रीमती जी को नोट करा दिया ”
यह फ़िल्म एक ऐसे मामले से प्रेरित है, जिसने सिर्फ़ समाज को नहीं, राजनीति, क़ानून और धर्म—तीनों को एक साथ झकझोर दिया था। शाजिया बानो का नाम—जो कभी एक आम और सम्मानित नाम था—एक दौर में बहस, बहिष्कार और बहानेबाज़ी का प्रतीक बना दिया गया। फ़िल्म इसी बिंदु से शुरू होती है—“मेरा नाम शाजिया बानो रखा था, लेकिन आज एक ग़लत फ़ैसले की वजह से लोग इसे गाली समझेंगे।” यही पंक्ति बता देती है कि यह सिनेमा आरामदेह नहीं है।
निकाह, ट्रिपल तलाक़, तलाक़ के बाद मुआवज़ा, शरीयत क़ानून, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक़्फ़ बोर्ड, सेक्युलर क़ानून, अदालतें—फ़िल्म इन तमाम तहों पर चलती है, बिना किसी एक को आसान खलनायक या नायक बनाए। 2019 में ट्रिपल तलाक़ पर लगे पूर्ण प्रतिबंध और 1987 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की पृष्ठभूमि फ़िल्म में स्पष्ट रूप से महसूस होती है। साथ ही, अनुच्छेद 44 में वर्णित यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड और सीआरपीसी की धारा 125 जैसे क़ानूनी संदर्भ फ़िल्म को सिर्फ़ भावनात्मक नहीं, बौद्धिक रूप से भी समृद्ध करते हैं।
अभिनय की बात करें तो इमरान हाशमी और यामी गौतम —दोनों अपने-अपने चरित्रों में असहज करने वाली सच्चाई लेकर आते हैं। इमरान हाशमी यहाँ “विलेन” होकर भी एक आईना बन जाते हैं—ऐसा आईना, जिसमें समाज अपना बदसूरत चेहरा देखने से कतराता है। उनका किरदार इतना बदतमीज़, इतना आत्मकेंद्रित है कि कई बार दर्शक स्क्रीन में घुसकर थप्पड़ मारने को प्रेरित हो जाए—और यही इस अभिनय की सफलता है।
यामी गौतम का किरदार अलग तरह की ताक़त दिखाता है। वे यहाँ सिर्फ़ पीड़िता नहीं हैं, बल्कि एक माँ हैं—और फ़िल्म बहुत चुपचाप यह बात कह देती है कि शायद भगवान हर जगह नहीं हो सकता, इसीलिए उसने माँ को बनाया। अंतिम पाँच मिनटों में यामी के संवाद केवल संवाद नहीं रहते, वे कई औरतों की आवाज़ बन जाते हैं।
फ़िल्म का दूसरा हिस्सा पूरी तरह कोर्ट-रूम ड्रामा में बदल जाता है, जहाँ दोनों पक्षों को अपनी बात कहने का अवसर मिलता है। हैरानी की बात यह है कि एक क्षण ऐसा भी आता है, जब दर्शक खुद से पूछता है—“क्या मैं सचमुच सही के साथ खड़ा हूँ?” यही फ़िल्म की असली ताक़त है। यह सही-ग़लत का आसान पाठ नहीं पढ़ाती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है।
हाँ, यह फ़िल्म कंट्रोवर्शियल है। यह धार्मिक अंतर को उभारती है, हिंदू-मुस्लिम फ़ैक्टर को ट्रिगर करती है। लेकिन सवाल यही है—क्या इसी डर से सही को सही और ग़लत को ग़लत कहना बंद कर दिया जाए? हक वह सिनेमा है जो स्क्रीन पर “The End” लिखे जाने के बाद दिमाग़ में शुरू होता है। इसे आप इग्नोर नहीं कर सकते।
कमज़ोरियाँ भी हैं—कहानी थोड़ी प्रेडिक्टेबल हो जाती है, सपोर्टिंग कैरेक्टर्स का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता। फिर भी इमोशंस असर छोड़ते हैं। म्यूज़िक संवादों में बदल जाता है और संवाद कई घरों की ख़ामोशी।
नेटफ्लिक्स जैसे प्लेटफ़ॉर्म ( Netflix ) पर आई यह फ़िल्म सिर्फ़ “अच्छी” नहीं, “ज़रूरी” है। इसे अंडररेटेड होने से बचाने के लिए अच्छी ऑडियंस चाहिए—ऐसी ऑडियंस, जो सीरियस सिनेमा देखना जानती हो।
पाँच में से तीन स्टार।
सब्जेक्ट, लेखन और अभिनय के लिए।
और उन आख़िरी पाँच मिनटों के लिए—जो बहुत देर तक पीछा नहीं छोड़ते।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 4, 2026
Cinema Review
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