पुस्तक : हाशिये के शब्द लेखक : विवेक रंजन श्रीवास्तव प्रकाशक : इंडिया नेट बुक्स, नोएडा मूल्य : 280 रुपये
विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक हाशिये के शब्द समकालीन जीवन, समाज, संस्कृति और मनुष्य के अंतर्विरोधों पर विचार करने वाली पठनीय निबंध कृति है। पुस्तक का शीर्षक ही इसकी वैचारिक दिशा का संकेत देता है। लेखक उन विषयों, विचारों और संवेदनाओं को केंद्र में लाते हैं, जिन्हें प्रायः हमारी सामाजिक दृष्टि हाशिये पर छोड़ देती है। उनकी लेखनी में साहित्यिक संवेदना के साथ सामाजिक निरीक्षण और तार्किक विवेचन का संतुलित मेल दिखाई देता है।
पुस्तक की विशेषता इसकी विषय विविधता है। धर्म, लोकतंत्र, भारतीय ज्ञान परंपरा, आत्मबोध, भाषा, प्रकृति, राजनीति और बदलते सामाजिक संबंधों जैसे विषयों पर लेखक ने अपने विचार रखे हैं। वे किसी विषय को केवल सूचनात्मक ढंग से प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उसके भीतर छिपे सामाजिक और मानवीय अर्थों की पड़ताल भी करते हैं।
धर्म के निहितार्थ पर विचार करते हुए लेखक मंदिर की घंटियों और पूजा पाठ से आगे बढ़कर भूखे बच्चे, श्रमिक और वंचित मनुष्य की पीड़ा को धर्म की कसौटी बनाते हैं। उनका संकेत स्पष्ट है कि मनुष्य के प्रति संवेदना के बिना धार्मिक आचरण अधूरा है। इसी तरह इरादे बनाम बहाने में नए वर्ष के संकल्पों का उदाहरण लेकर वे मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हैं, जिसमें बड़े बड़े संकल्प तो लिए जाते हैं, लेकिन जनवरी का दूसरा सप्ताह आते आते वे विस्मृत होने लगते हैं। लेखक इस व्यवहार के माध्यम से संकल्प और आत्मप्रवंचना के अंतर को रेखांकित करते हैं।
लोकतंत्र और भारतीय ज्ञान परंपरा में वे भारतीय परंपरा की सभा, समिति, बौद्ध संघ और संवाद की ऐतिहासिक संस्कृति का उल्लेख करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ों की ओर ध्यान दिलाते हैं। स्व का बोध बनाम सर्वनाम से संज्ञा की यात्रा में मैं, तुम, वह और हम जैसे सामान्य शब्दों के माध्यम से व्यक्ति, संबंध और सामाजिक व्यवहार के सूक्ष्म अर्थ उद्घाटित होते हैं। नाक जैसे सामान्य विषय को भी लेखक सामाजिक प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और दिखावे के व्यापक प्रतीक में बदल देते हैं। बेटी के विवाह में नाक का प्रश्न हो या बेटे की उपलब्धि से परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ना, लेखक रोजमर्रा के अनुभवों में छिपी सामाजिक मानसिकता को पकड़ते हैं।
प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े निबंधों में जल, जंगल, जमीन और हवा के प्रति मनुष्य के बदलते व्यवहार पर चिंता व्यक्त की गई है। रासायनिक खादों का बढ़ता प्रयोग, भूजल का गिरता स्तर, नदियों का प्रदूषण और विकास की अंधी दौड़ जैसे प्रश्नों के माध्यम से लेखक पाठक को पर्यावरणीय जिम्मेदारी का बोध कराते हैं। वर्तमान में बुद्ध की प्रासंगिकता और धर्म तथा राजनीति जैसे विषयों पर भी उनकी दृष्टि समकालीन परिस्थितियों से संवाद करती है।
पुस्तक में कबीर, बसंत, प्रवासी जीवन, हिंदी भाषा और साहित्य, सत्ता तथा शब्द की शक्ति जैसे विषय भी शामिल हैं। यह विविधता पुस्तक को एक ही विचारधारा या विषय की सीमा में बंधने नहीं देती। लेखक कहीं सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न उठाते हैं, कहीं सांस्कृतिक परंपराओं का पुनर्पाठ करते हैं और कहीं मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करते हैं।
विवेक रंजन श्रीवास्तव की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक है। वे जटिल विषयों को सामान्य पाठक के लिए सुगम बनाने का प्रयास करते हैं। एक से अधिक विषयों पर उनकी पकड़ और विश्लेषण की प्रवृत्ति पुस्तक को वैचारिक विस्तार देती है। कुछ निबंधों में विचार और संदर्भों का विस्तार थोड़ा अधिक महसूस होता है, जिन्हें और कसाव देकर अधिक प्रभावी बनाया जा सकता था। फिर भी यह पुस्तक की समग्र पठनीयता को कम नहीं करता।
हाशिये के शब्द केवल निबंधों का संग्रह नहीं, बल्कि अपने समय और समाज को देखने की एक सजग दृष्टि है। यह पाठक को स्थापित धारणाओं पर पुनर्विचार करने, सामान्य घटनाओं में छिपे असामान्य अर्थ पहचानने और अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत होने का अवसर देती है। पुस्तक का सार्थक पक्ष यही है कि लेखक हाशिये पर पड़े शब्दों और विचारों को विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास करते हैं। विचारशील पाठकों के लिए यह एक उपयोगी और चिंतनपरक पुस्तक है। इन दिनों ललित निबंध कम ही लिखे जा रहे हैं, ऐसे समय में यह वैचारिक लालित्य पूर्ण दस्तक भाषा माधुर्य के साथ नवाचारी साहित्यिक वैचारिक कृति है, जिसका हिंदी जगत स्वागत करता है।
अंजनी सक्सेना, भोपाल
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