हिन्दी के अक्षर को देखो
मोड़ बने अति सुन्दर है
हर अक्षर रेखा के नीचे
ज्यों अक्षर उपर छाता है। (1)
वहीं लिखे जो बोला जाता
इसकी महत्ता प्यारी है
क्ष त्र ज्ञ संधि के अक्षर
ध्वनि अलग ही पायी है। (2)
स्वर और व्यंजन अलग जहां
संख्या में सबसे भारी है
कुछ कंठ से, कुछ तालू से
कुछ ओष्ठ हुए, कुछ दंती है । (3)
हिन्दी मे बिन्दी की महत्ता
ज्यों खोजे, गहराती है
आधा नन्ना, आधा मम्मा
बड़ी पहेली पायी है । (4)
सही व्याकरण शब्द संरचना
संधि और समास है
दोहा,चौपाई, गीत, कवित्त
हिन्दी के सरताज हैं ।(5)
तुलसी मीरा सूर कबीरा
अलख जगाई हिन्दी की
कालजयी रचनाएं रचकर
तामीर बनाई हिन्दी की (6)
पर्याय शब्द जिसने सीखा
लेखन उसका रोचक होगा
नये शब्दों की रचना कर
वह भाषा विद् कहलायेगा ।(7)
राजभाषा भले कहे हम
दोयम दर्जा थोप दिया
अंग्रेजी को रग में पैठा
ग्राम जनों को दूर किया (8)
अनुवाद पढ़ें हम कानूनों का
सही सदा आंग्ल माना
कोर्ट कचहरी अंग्रेज आप की
जहां हिंदी क्या! लेना देना (9)
अपनों ने अपनों को काटा
कदम कदम पर हार हुई
भाषा वासन भोजन छूटा
नक्काल राज की जीत हुई। (10)
हम हिन्दी दिवस मनाते हैं
केवल चर्चाएं होती है
प्राणों से प्यारी थाती कह
झूठी शपथ ली जाती है। (11)
हिन्दी का हक हमने मारा
जन को हिन्दी से दूर किया
अंग्रेजी को सिरमौर बना
आंचल भाषा को कुचल दिया । (12)
गिटपिट अंग्रेजी बोल के हम
झूठी धौंस जमाते हैं
इण्डिया दैट इज भारत कह
अपनी नाक कटाते है। (13)
भाव भरो अपने भारत का
नही इण्डिया बोले हम
अभिमान करें अपनी थाती का
स्वभाषा का सम्मान करें । (14)
हिन्दी का सम्मान करें हम
हिन्दी का सम्मान करें ।
Comments ( 2)
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डा राम कुमार जोशी
2 months agoVery Nice
डॉ मुकेश 'असीमित'
2 months agoयह कविता हिन्दी को केवल संवेदनात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि भाषावैज्ञानिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों में रखकर देखती है। देवनागरी की संरचना से लेकर हिन्दी के सामाजिक अवमूल्यन तक, रचना एक जागरूक नागरिक की तरह प्रश्न भी करती है और आग्रह भी। यह कविता हिन्दी-दिवस की औपचारिकताओं से आगे जाकर भाषा-आत्मसम्मान का घोषणापत्र बन जाती है।