जगत फूफा और फोन कॉल की विश्व राजनीति

दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क का सबसे चर्चित आदमी इन दिनों बड़ी परेशानी में है। लोग कह रहे हैं कि वह किसी “अटेंशन सीकिंग डिसऑर्डर” से पीड़ित है—पूरे ग्रह का ध्यान हर समय अपनी ओर चाहता है। लेकिन मुझे तो मामला कुछ और ही लगता है। दरअसल, वह बीमार नहीं है, वह हमारे यहाँ के एक बेहद स्थापित, कॉपीराइटेड और पीढ़ियों से चले आ रहे भारतीय चरित्र में ढल चुका है—वह है रूसे फूफा

आप ज़रा ध्यान से देखिए—चेहरा, हाव-भाव, नाराज़गी का प्रदर्शन, बात-बात पर मुँह फुलाना—क्या आपको अपने मोहल्ले के किसी फूफा की याद नहीं आती? वही जिन्हें हर शादी, हर मुंडन, हर तेरहवीं में सबसे पहले बुलाया जाए, सबसे आगे बिठाया जाए, और हर तीन मिनट में हालचाल पूछा जाए। नहीं तो वे ऐसे रूठते रहेंगे  कि बात इस जगत फूफा की करें तो  विश्व की  अर्थव्यवस्था ही चरमरा जाएगी मित्र ।

मामला था सिर्फ़ एक फोन कॉल का। सोचिए, क्या बिगड़ जाता अगर इधर से एक फोन  कॉल हो जाता? जगत फूफा  को तसल्ली मिल जाती। ‘मन की बात’ सिर्फ़ देश ही नहीं, फूफाओं के लिए भी होती है—वे भी चाहते हैं कि कोई उनकी मनोदशा सुने। हो सकता है जगत फूफा  ने दो-चार मिस्ड कॉल भी मारी हों—लेकिन इधर उनके पुराने यार है  जी हैं कि “अननोन नंबर” समझकर उठा नहीं पाए हों । फूफा इस लापरवाही को कैसे माफ़ करें?

फूफा क्या कर सकता है—शिकायत के अलावा? वो उस हारे हुए आशिक की तरह है जो माशूका की यह नाराजगी भला कैसे बर्दाश्त  करे l माशूका अब किसी और के साथ गलबहियां करे l पुराने आशिक का दर्द आप क्या हे पहचाने मित्र l लेकिन फूफाजी का दिल बिलकुल साफ़ है कोई बात पेट में पचती नहीं है । फूफा यह सुनिश्चित करना चाहता है कि पूरा खानदान, पूरा मोहल्ला, और अब पूरा विश्व—सिर्फ़ उसी का ख्याल रखे। आखिर वे यूँ ही जगत फूफा थोड़े ही बन गए हैं। यह पदवी वर्षों की नाराज़गी, अनगिनत तानों और बेहिसाब अपेक्षाओं के बाद मिलती है।

दुनिया के सबसे ताक़तवर देश का सबसे ताक़तवर आदमी इस समय ठीक वैसे ही बैठा है, जैसे हमारे मोहल्ले में रूसे फूफा बैठ जाया करते थे—धवल-सिक्त घर की दीवारों पर जैसे अपमान की कालिख पूत गयी ; मुँह फुलाए, पैर पसारे, और भीतर ही भीतर यह तय करते हुए बैठ गए  कि अब बिना मनाए कोई प्रवेश नहीं करेगा।

अब आप पूछेंगे—फोन नहीं किया तो क्या हुआ? अरे साहब, आपने रिश्तेदारी का गणित नहीं पढ़ा। मूँगफली में दाना न होने से अगर “नाना” जैसे रिश्ते टूट सकते हैं, तो फोन न करने से विश्व राजनीति क्यों न डगमगाए?

फूफा फोन की ताक़त जानते हैं। फोन से युद्ध शुरू भी कराए जा सकते हैं और युद्ध रुकवाने का दावा भी किया जा सकता है। फोन पर चिड़िया के बीट जैसे कुछ ट्वीट टपकाकर पूरा ब्रह्मांड हिलाया जा सकता है। सुबह-सुबह बैठे हैं डाल पर पंख फद्फदाये —आज किस देश पर ट्वीट गिर जाए, कोई भरोसा नहीं।

नाराज़गी कोई कूटनीतिक दस्तावेज़ नहीं होती, यह रिश्तेदारी का भावनात्मक अनुबंध है। और इस अनुबंध में सबसे ज़्यादा आहत वही होता है, जो खुद को “अपना” समझता है। गैरों से कोई नाराज़ नहीं होता। फूफा जी भी यही कह रहे हैं—“मैं तो अपना हूँ, मेरा हक़ बनता था।” अपनापन जब टूटता है तो दिल को चोट लगती है। विरह की पीड़ा वही जाने, जैसे प्रेमिका किसी और के साथ गलबहियाँ डाले दिख जाए। कोई कहे—“करो गलबहियाँ, पर पुराने यार को कभी-कभार फोन तो कर लिया करो!”

असल में फूफा बिन बुलाये समधी हैं ,रिश्तेदारी निभाना चाहते  हैं  । उनका सपना है कि दुनिया के नेता रोज़ सुबह उठते ही पूछें—“कैसे सोए? नींद पूरी हुई या नहीं? आज हाजत कैसी हुई ? कई देश के राष्ट्राध्यक्ष उनके लिए कुछ विशेष हीन्ग्वटी चूर्ण भी पेश कर रहे हैं ताकि उनकी हाजत ठीक बनी रहे l ”

रिश्तों की मज़बूती इसी में है कि आप बेमन से ही सही, हालचाल पूछते रहें। उनके लिए हर समिट ,हर गोलमेज समेलन ,सेमीनार,कन्वेंशन एक शादी की तरह है ? बेगानों की शादी में भी अब्दुल्ला दीवाना होना चाहता है l इसलिए रूसे फूफा रूसे ही रहते हैं, जताते नहीं तो उनकी ताक़त कौन माने?

उनके पास एक अचूक हथियार है—टैरिफ का डंडा। इसी डंडे से लंगड़ाती अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है, और इसी से दुनिया सीधी होती है। फूफा की निगाह में टैरिफ भानुमती का पिटारा है—जिससे युद्ध, शांति, समझौते और बाज़ार—सब  जिन्न  निकाले जा सकते  हैं।

और अब फूफाजी शगुन पर भी अपडेट हैं। जो टैरिफ का शगुन  कभी इक्यावन रुपये में निपट जाता था , वह अब पाँच सौ एक की दर पर चल रहा है । फोन करके एक तारीफ़ न करिए, तो टैरिफ के पुल बंध ही सकते हैं।

असली बात यह है कि नाराज़गी ताक़त का दूसरा नाम है। जो नाराज़ हो सकता है, वही कल दोस्तों को दुश्मन और दुश्मनों को दोस्त बना सकता है।

तो फोन घनघनाते रहिए। फूफा के कान बजबजाते रहिये । यूँ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, तो जगत फूफा को यह नागवार गुज़रेगा—और फिर बिबिलाया फूफा कल ड्रामा क्वीन की तरह कोप भवन में बैठा बिबिलाता रहे तो  मत कहियेगा ।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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