मनुष्य बहुत देर तक सिर्फ़ इस दुनिया के सौंदर्य में खोया रहा। रात के सन्नाटे में झिलमिलाते अनगिनत तारे, क्षितिज तक फैला सागर, पहाड़ों पर पसरा हुआ बादलों का कम्बल—सब कुछ इतना मोहक कि देखने वाला अपने देखने को ही भूल जाए। मगर एक दिन मनुष्य के भीतर एक अजीब-सा खटका उठा—यह दुनिया तो बदलती रहती है, मौसम बदलते हैं, नदियाँ बहती हैं, शरीर बूढ़ा होता है; लेकिन “मैं” जो भीतर से देख रहा हूँ, वैसा ही क्यों बना हुआ है? यही छोटा-सा प्रश्न, आगे चलकर एक विराट दार्शनिक भूचाल का कारण बना।
जब उसे लगा कि दुनिया उससे अलग है—और शायद उससे बड़ी भी—तब उसके भीतर “जादू” और “जादूगर” की कल्पना जन्म लेती है। दुनिया जादू-सी लगी; और फिर जादू से ज़्यादा जिज्ञासा जादूगर की तरफ़ मुड़ गई—अगर खेल इतना सुन्दर है, तो खिलाड़ी कितना अद्भुत होगा? यही सवाल हज़ारों साल से मनुष्य को सोने नहीं देता। कहीं वह दुनिया से दूर जाकर उस अदृश्य जादूगर को खोजता, तो कहीं दुनिया के भीतर झांक-झांक कर उसके नियम समझने की कोशिश करता।
भारतीय वैदिक ऋषि इसी बेचैनी के उत्तर की खोज में निकले। उन्होंने सृष्टि और ईश्वर के रहस्य पर मनन करते हुए अनेक सूक्त रचे—पुरुष सूक्त, नासदीय सूक्त, हिरण्यगर्भ सूक्त… आदि। इन्हीं में से एक है हिरण्यगर्भ सूक्त—ऋग्वेद के दशम मंडल का 121वाँ सूक्त, जिसमें केवल दस मंत्र हैं, लेकिन उन दस मंत्रों में सृष्टि, ईश्वर, प्राण, पदार्थ, देवताओं और मनुष्य की चेतना के बारे में ऐसी गहराई से बात की गई है कि आधुनिक विज्ञान भी कहीं-न-कहीं सिर झुकाने पर मजबूर हो जाता है।
सूक्त का पहला मंत्र कहता है—जब कुछ भी नहीं था, न आकाश, न पृथ्वी, न रूप, न नाम, तब भी एक “कुछ” था—
“हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे…”
अर्थात, सृष्टि से पहले जो था, उसे ऋषि ने नाम दिया—हिरण्यगर्भ। “हिरण्य” यानी स्वर्ण, चमक, तेज, आकर्षण; और “गर्भ” यानी वह कोख, वह अंड, वह बीज—जिससे सब कुछ जन्म लेता है। सीधे शब्दों में कहें तो “हिरण्यगर्भ” कोई सोने का गोल अंडा भर नहीं है, बल्कि वह आदिम स्वर्ण-बीज है जिसमें पूरा ब्रह्मांड अभी अनमूर्त सम्भावना की तरह छुपा पड़ा था—समय से पहले, स्थान से पहले, हर “होगा” से पहले।
ऋषि कहते हैं—सब भूतों, सब पदार्थों, सब ऊर्जाओं, सब जीवों का “पति”—अर्थात अधिपति—वही एक है। वही पृथ्वी को धारण किए बैठा है, वही आकाश को संभाले हुए है। सूर्य, तारे, दिशाएँ—सब उसी के सहारे टिके हैं। इसीलिए मंत्र के अंत में सवाल उठता है—“कस्मै देवाय हविषा विधेम?”—किस देवता को हम हवि अर्पित करें? उत्तर स्पष्ट है—उसी को, जो हिरण्यगर्भ के रूप में सबका मूल, सबका आधार है।
संस्कृत में “हिरण्य” शब्द बड़ा रोचक है। पृथ्वी को कभी “हिरण्यदा” कहा जाता है—क्योंकि उसके गर्भ से धातुएँ, रत्न और अनेक मूल्यवान पदार्थ निकलते हैं। शिव को “हिरण्यपति” कहा जाता है—क्योंकि वे इस सम्पूर्ण भौतिक जगत के स्वामी माने गए। यानी “हिरण्य” का अर्थ केवल “सोना” नहीं, बल्कि वह सब कुछ है जो चमकता है, आकर्षित करता है, समृद्धि देता है—भौतिकता की सारी सजावट, चमक-दमक, रुतबा, ठाट-बाठ।
इसीलिए जब ऋषि कहते हैं कि सृष्टि “हिरण्यगर्भ” से उत्पन्न हुई, तो वे हमें एक गहरा संकेत दे रहे हैं। हमारे यहाँ ब्रह्मांड को “ब्रह्मांड”—ब्रह्म + अंड—कहा गया, एक विराट अंडाकार ऊर्जा-काय। वही भाव यहाँ भी है—एक आदिम ऊर्जा-डिंब, जहाँ अभी न रूप है, न नाम; केवल संभावना और शक्ति है। विज्ञान आज जिसे “सिंग्युलैरिटी” कहता है, वैदिक ऋषि उसे “हिरण्यगर्भ” की उपमा से पकड़ने की कोशिश कर रहे थे।
पुराणों की भाषा में देखें तो विष्णु की नाभि से एक कमल निकलता है, उस कमल पर ब्रह्मा बैठते हैं और सृष्टि रचना करते हैं। साधारण पाठक को यह कहानी अजीब लग सकती है—नाभि से कमल, कमल से देवता! लेकिन यदि आप एक गर्भवती स्त्री की नाल और उसके द्वारा मिलने वाले पोषण को याद करें, तो यह प्रतीक अचानक बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है। नाभि से निकली नाल, गर्भ में पलते शिशु को जीवन देती है। ऋषियों ने इसी प्रत्यक्ष अनुभव को ब्रह्मांड-स्तर पर रूपांतरित कर दिया—विष्णु का नाभि-कमल, ब्रह्मा का जन्म, और फिर सृष्टि की शुरुआत।
उपनिषदों में यह रहस्य और सूक्ष्म भाषा में खुलता है। ईशावास्य उपनिषद की प्रसिद्ध पंक्ति है—
“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्…”
अर्थात, सत्य का मुख एक “स्वर्ण-पात्र” से ढँका हुआ है। यह स्वर्ण-पात्र क्या है? वही जगत—यही आकर्षण, यही भौतिक दौड़, यही सोना-चाँदी, यही प्रतिष्ठा, यही शक्ति की चमक। सत्य—जो हमारे यहाँ “ब्रह्म” कहलाता है—अविनाशी तत्त्व है, शुद्ध अस्तित्व है। वह सीधे दिखता नहीं—क्योंकि उसके ऊपर यह जगत एक “हिरण्यमय पात्र” की तरह चढ़ा हुआ है।
ज़रा एक व्यावहारिक उदाहरण सोचिए—कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से बहुत कमजोर है, पर वह महँगा सूट पहनता है, चमकदार घड़ी लगाता है, आलीशान होटल में फोटो खिंचवाता है—ताकि उसकी सच्चाई न दिखे। उसका “हिरण्य”—चमकदार आवरण—उसके “सत्य” को ढक देता है। ठीक वैसे ही जगत की यह भौतिक चमक—इंद्रियों को मोह लेने वाली—अंदर छिपे अनन्त सत्य के मुख पर पात्र की तरह चढ़ जाती है। मन उसी में उलझ कर रह जाता है।
उपनिषद का यह इशारा बहुत सूक्ष्म है—वही हिरण्य, जो सृष्टि की पहली चमक है, वही आगे चलकर सत्य को ढँकने वाला आवरण भी बन जाता है। सृष्टि का बीज और माया का परदा—दोनों में एक ही स्वर्ण–चमक मौजूद है। फर्क केवल दृष्टि का है कि हम उसे किस रूप में पहचानते हैं।
इसी बीच ऋषि “हिरण्य” शब्द का एक और पहलू सामने लाते हैं—हिरण्यकश्यप। प्रह्लाद का पिता, वह असुर राजा, जो धन, सोना, शक्ति, साम्राज्य—हर चीज़ का भूखा था। उसका नाम स्वयं बताता है—जो “हिरण्य” में, भौतिक जगत की चमक में, “कश्यप”—कवच की तरह लिपटा हुआ है। उसके पास सब कुछ था, पर शांति नहीं थी; वहीं प्रह्लाद के पास कुछ भी नहीं था, पर भगवान विष्णु के प्रेम के कारण आनंद से भरा हुआ था। ऋषि यहाँ एक ही बात को बार-बार घुमा-फिराकर समझाते हैं—भौतिक हिरण्य पर्याप्त नहीं; जब तक चेतना उस हिरण्य से परे “सत्य” तक न पहुँचे, तृप्ति नहीं मिलती।
हिरण्यगर्भ सूक्त के दूसरे और तीसरे मंत्र में यह रहस्य और साफ़ होता है। पहले मंत्र में जो हिरण्यगर्भ केवल सृष्टि का भौतिक मूल दिखाई देता था, अब यह स्पष्ट किया जाता है कि वही प्राण का भी मूल है। हमारी देह, वृक्ष, पशु, पक्षी, कीट—सभी में जो जीवन की धड़कन है, जो साँस चलती है, जो पलक झपकती है, जो हृदय को धकधकाती है—उस प्राण की उत्पत्ति भी उसी से है। यानी वह केवल “मेटर” (matter) का नहीं, “लाइफ़” का भी स्रोत है। और इतना ही नहीं, जिसने जन्म देना सीखा है, वही समेटना भी जानता है—इसलिए वही मृत्यु का अधिपति भी है।
चौथे और पाँचवें मंत्र में ऋषि, मानो एक विस्मित वैज्ञानिक की तरह, दुनिया को देख रहे हैं—ऊँचे पहाड़ों की शृंखलाएँ, बर्फ़ से ढके शिखर, सागर का अथाह जल, नदियों का प्रवाह, पेड़-पौधों से भरी पृथ्वी—और पृथ्वी से आगे निकल कर सूर्य, तारे, असंख्य नक्षत्र-मंडल। वे सोचते हैं—इतना संगठित, इतना सुचारु, इतने नियमों से बंधा हुआ ब्रह्मांड, किसी अंधे संयोग की देन नहीं हो सकता। इसके पीछे कोई “बुद्धिमान नियंता” होगा। वे इसी नियंता को तपस्वी रूप में हिरण्यगर्भ के रूप में देखते हैं—जो ध्यान में बैठा हुआ, नियमों की रचना करता है—गुरुत्वाकर्षण से लेकर ऋतुचक्र तक।
छठे मंत्र में एक बहुत सूक्ष्म और आधुनिक विचार आता है—ब्रह्मांड बड़ा है, विशाल है, अद्भुत है; पर यह सब तब तक “अर्थपूर्ण” नहीं जब तक कोई “चेतन प्रेक्षक” न हो। यदि इस विशालता को देखने वाला कोई न हो, तो उसके भव्य दृश्य का अर्थ किसके लिए? मनुष्य की चेतना, उसकी जिज्ञासा—यही ब्रह्मांड को अर्थ देती है। ऋषि कहते हैं—हिरण्यगर्भ का महिमादान केवल इतना नहीं कि उसने पहाड़, नदियाँ, तारे बना दिए; बल्कि यह भी कि उसने किसी को ऐसा बना दिया, जो इन सबको देख सके, समझ सके, प्रश्न पूछ सके, आश्चर्य कर सके। यही वह स्थान है जहाँ वे विज्ञान की आधुनिक “conscious universe” वाली चर्चा से भी आगे दिखाई देते हैं।
सातवें मंत्र में बात ऊर्जा तक जा पहुँचती है। प्रश्न उठता है—ऐसा क्या है जो हर पदार्थ में है? दर्शन, धर्म और विज्ञान—तीनों के जवाब अलग शब्दों में होते हुए भी एक ही बात कहते हैं। धर्म कहता है—हर कण में ईश्वर है। दर्शन कहता है—हर चीज़ में चेतना का अंश है। आधुनिक विज्ञान कहता है—हर पदार्थ, अंततः, ऊर्जा का凝ठा हुआ रूप है। यूनानी दार्शनिक हेराक्लाइटस ने इसे “फायर” कहा—आग। भारतीय ऋषि भी कहते हैं—सृष्टि मूलतः “अग्नि-तत्त्व” से बनी है—अग्नि यानी ऊर्जा, स्पंदन, गति। हर कण में ताप है, कंपन है, energy है—यही सृष्टि की असली धुन है।
आठवें मंत्र में घोषणा होती है—देवता भी हिरण्यगर्भ से ही उत्पन्न हैं। देवताओं से हमारा तात्पर्य यहाँ प्रकृति-शक्तियों से भी है—अग्नि, वायु, सूर्य, इन्द्र आदि। नासदीय सूक्त में भी यही बात आई थी कि देवता भी सृष्टि के बाद आए—इसलिए सृष्टि के आदिम रहस्य को वे भी पूरी तरह नहीं जानते। हिरण्यगर्भ देवताओं का भी देवता है—source of all sources।
नौवें और दसवें मंत्र में, इतनी लम्बी दार्शनिक यात्रा के बाद, मनुष्य का स्वर अचानक बहुत मानवीय हो जाता है। अब वह न केवल ब्रह्मांड को समझना चाहता है, बल्कि उससे प्रार्थना भी करता है—हे हिरण्यगर्भ! हमारी जीवन-यात्रा को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित कर, हमें विवेक दे, समृद्धि दे; हमारा पथ सुगम कर। अब वह केवल बाहरी चमत्कारों से मोहित नहीं, बल्कि भीतर के सत्य तक पहुँचने में सहायता माँग रहा है। बाहर का हिरण्य देख चुका—अब भीतर के ब्रह्म की खोज है।
आज की भाषा में कहें तो विज्ञान “बिग बैंग” के ज़रिये उस आदिम बिंदु को समझने की कोशिश करता है जहाँ से समय और स्थान ने जन्म लिया। भारतीय ऋषि उसे “हिरण्यगर्भ” कहकर पुकारते हैं—एक स्वर्ण-बीज, जिसमें सब कुछ पहले से ही संभावित रूप में उपस्थित है। विज्ञान “सिंग्युलैरिटी” कहता है, दर्शन “सत्” कहता है; शब्द बदल जाते हैं, संकेत एक ही रहता है—एक आदिम, अविभाजित, अखंड तत्त्व।
हिरण्यगर्भ का रहस्य केवल बाहर के ब्रह्मांड की कहानी नहीं, हमारे भीतर के ब्रह्मांड की भी कथा है। जैसे सृष्टि एक चमकते बीज से फूटी, वैसे ही हमारे भीतर भी एक छोटा-सा “ज्योतिबिंदु” है—चेतना का, विवेक का, सत्य की खोज का। जब हम जगत के स्वर्ण-पात्र—आकर्षण, मोह, अहंकार, संपत्ति—के आवरणों से थोड़ा ऊपर उठते हैं, तो भीतर से वही आदिम प्रकाश झलकने लगता है। ऋषियों ने उसे “ब्रह्मदर्शन” कहा, साधु उसे “अनुभूति” कहते हैं, आधुनिक मनोविज्ञान उसे “स्व-चेतना” कहता है।
मगर मूल बिंदु वही है—एक चमकता बीज, जो कभी “पहले-पहल” था… और जो आज भी हर प्राणी के भीतर छोटे-से चिंगारी की तरह छिपा हुआ है।
हिरण्यगर्भ—ब्रह्मांड का स्वर्ण-गर्भ, और मनुष्य के हृदय का भी।
बाहर खोजो तो सृष्टि का रहस्य, भीतर खोजो तो अपने अस्तित्व का।
दोनों दिशाएँ चलकर अन्ततः एक ही बिंदु पर मिलती हैं—
जहाँ प्रश्न करने वाला भी वही हो, उत्तर देने वाला भी वही,
और बीच में जो स्वर्ण-चमकती दुनिया है, वह भी उसी की खेली हुई जादूगरी।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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