होमर के महाकाव्य इलियड और ओडिसी विश्व साहित्य की उन आधारशिलाओं में गिने जाते हैं, जिनके बिना पाश्चात्य सभ्यता की कल्पना अधूरी लगती है। इन दोनों महाकाव्यों के रचयिता माने जाने वाले होमर के ऐतिहासिक अस्तित्व पर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि ये काव्य ईसा पूर्व लगभग 8वीं शताब्दी में वर्तमान रूप में संकलित हुए। इनका कथानक उससे भी प्राचीन है और ट्रोजन युद्ध की परंपराओं पर आधारित है, जिसे सामान्यतः ईसा पूर्व 12वीं–13वीं शताब्दी का माना जाता है।
दूसरी ओर भारतीय महाकाव्य महाभारत का कथानक भी इसी कालखंड के आसपास स्थित माना जाता है। आधुनिक इतिहासकार महाभारत युद्ध को मोटे तौर पर ईसा पूर्व 1500–1200 के बीच रखते हैं, यद्यपि इसकी रचना और संकलन की प्रक्रिया कई शताब्दियों तक चली। इस प्रकार कालगत दृष्टि से देखें तो इलियड–ओडिसी और महाभारत लगभग समकालीन सांस्कृतिक स्मृतियाँ हैं—एक यूनानी सभ्यता की, दूसरी भारतीय उपमहाद्वीप की।
कथानक और युद्ध की केंद्रीयता
इलियड का केंद्र ट्रोजन युद्ध का एक सीमित कालखंड है—अखिलीस का क्रोध, उसका युद्ध से विमुख होना और अंततः युद्ध में लौटकर हेक्टर का वध। इसी प्रकार महाभारत भी कुरुक्षेत्र युद्ध को केंद्र में रखता है। दोनों महाकाव्यों में युद्ध केवल हथियारों का संघर्ष नहीं, बल्कि अहंकार, धर्म, मर्यादा और भाग्य की टकराहट है।
जहाँ इलियड में अखिलीस का क्रोध कथा को गति देता है, वहीं महाभारत में दुर्योधन की महत्वाकांक्षा और द्रौपदी का अपमान कथा का निर्णायक मोड़ बनता है। दोनों ही कथाओं में युद्ध अनिवार्य लगता है—मानो पात्र अपने भाग्य से बच नहीं सकते।
नायक और चरित्र-साम्य
ओडिसी के नायक ओडिसियस (यूलिसीस) चतुराई, धैर्य और बुद्धि के प्रतीक हैं। वे दस वर्षों तक समुद्री यात्राओं में भटकते हुए घर लौटते हैं। भारतीय परंपरा में यही गुण हमें कृष्ण या युधिष्ठिर के चरित्र में मिलते हैं—जहाँ बल से अधिक नीति और बुद्धि निर्णायक होती है।
अखिलीस और भीम के बीच भी समानता दिखाई देती है—दोनों अपार शारीरिक बल के धनी हैं, किंतु भावनात्मक आवेग उन्हें विनाश की ओर भी ले जाता है। हेक्टर और कर्ण जैसे पात्र, जो शत्रु पक्ष में होते हुए भी नैतिक ऊँचाई पर खड़े दिखते हैं, दोनों महाकाव्यों में करुणा और वीरता का संतुलित रूप प्रस्तुत करते हैं।
देवता, भाग्य और हस्तक्षेप
इलियड और ओडिसी में यूनानी देवता—ज़ीउस, एथेना, अपोलो—मानव जीवन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते हैं। कभी युद्ध का पासा पलट देते हैं, कभी नायकों को छल से बचाते हैं।
महाभारत में भी देवत्व का हस्तक्षेप है, किंतु अधिक सूक्ष्म रूप में। कृष्ण स्वयं ईश्वर होते हुए भी प्रत्यक्ष चमत्कार कम करते हैं; वे गीता के माध्यम से कर्म और धर्म की व्याख्या करते हैं। यहाँ देवता भाग्य को निर्देशित करते हैं, पर मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
घर-वापसी और जीवन-दर्शन
ओडिसी मूलतः “घर लौटने” की कथा है—जहाँ युद्ध के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं होता। ओडिसियस का घर पहुँचना, पत्नी पेनलोपे की प्रतीक्षा और पहचान का संकट—यह सब मानवीय संबंधों की परीक्षा है।
महाभारत में भी युद्ध के बाद शांति नहीं आती। पांडवों का राजतिलक, गांधारी का विलाप, और अंततः महाप्रस्थान—यह दिखाता है कि विजय भी अंतिम समाधान नहीं। दोनों परंपराएँ यह संकेत देती हैं कि युद्ध मनुष्य को जीत दिला सकता है, पर उसे पूर्ण नहीं करता।
निष्कर्ष
इलियड–ओडिसी और महाभारत दो भिन्न सभ्यताओं की उपज होते हुए भी मानवीय अनुभव की साझा जमीन पर खड़े हैं। युद्ध, नायक, नैतिक द्वंद्व, भाग्य और करुणा—ये सब सार्वकालिक तत्व हैं। जहाँ यूनानी महाकाव्य वीरता और मानवीय दुर्बलताओं को उभारते हैं, वहीं महाभारत उन्हें दर्शन और आत्मचिंतन की ऊँचाई पर ले जाता है।
इस तरह ये महाकाव्य केवल अतीत की कथाएँ नहीं, बल्कि आज भी मनुष्य के अंतर्द्वंद्वों को समझने की जीवित परंपराएँ हैं—दो अलग संस्कृतियाँ, पर एक ही मानवीय आत्मा।
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