नेटफ्लिक्स खोलते ही मेरे मन में हर बार एक छोटा-सा संदेह सिर उठाता है—कहीं फिर से वही अनावश्यक हिंसा, वही ज़बरदस्ती का अंधकार, वही दिमाग थकाने वाला शोर तो नहीं परोस दिया जाएगा? परिवार, ड्रामा और हल्की-फुल्की कॉमेडी के बाद अगर कोई जॉनर मुझे अपनी तरफ खींचता है, तो वह है थ्रिलर-मिस्ट्री। लेकिन एक शर्त हमेशा लगी रहती है—कहानी दिमाग से खेले, हथौड़े से नहीं। इसी मानसिक अवस्था में मैंने Jaane Jaan देखने का रिस्क उठाया। और राहत की बात यह रही कि यह रिस्क घाटे का सौदा नहीं निकला।
ऊपर-ऊपर से देखें तो फिल्म की काया बहुत साधारण लगती है—एक कत्ल, पुलिस की एंट्री, जांच-पड़ताल और शक का घेरा। लेकिन जैसे ही यह साफ होता है कि मरने वाला खुद पुलिस वाला था, कहानी अपनी पटरी बदल लेती है। अब सवाल “कातिल कौन है” से ज़्यादा “शक किस पर जाए” बन जाता है। शक की सुई टिकती है एक ऐसी औरत पर जो देखने में इतनी सीधी-सादी, सुंदर और घरेलू है कि लगता है ऊपर वाले ने उसे बड़ी फुर्सत से गढ़ा होगा। मगर तभी दिमाग के किसी कोने से चेतावनी आती है—हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। और हर मासूम चेहरा… हमेशा मासूम ही रहे, इसकी कोई गारंटी नहीं।

यहीं से जाने जान असल में शुरू होती है। फिल्म खत्म होने पर भी यह आपके भीतर चलती रहती है। दो सवाल खास तौर पर पीछा नहीं छोड़ते—एक, आखिर नरेंद्र खुद को अपराधी साबित क्यों करता है, जबकि उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं दिखता? और दूसरा, वह सवाल जिस पर इंटरनेट आज भी माथापच्ची कर रहा है—अजीत की लाश आखिर गई कहाँ?
लेकिन ज़रा ठहरिए। अगर आप उम्मीद कर रहे हैं कि मैं यहाँ बैठकर पूरी कथा-वस्तु उधेड़ दूँगा, तो माफ़ कीजिए। भाई, अगर सब कुछ यहीं बता दिया, तो थ्रिल और मिस्ट्री का क्या होगा? सब्सक्रिप्शन लिया है आपने, तो थोड़ा दिमाग भी खर्च होना चाहिए। मैं बस उतना ही कहूँगा, जितना ज़रूरी है—बाकी काम आपका।
फिल्म की आत्मा दरअसल एक खेल में छिपी है—छुपन-छुपाई का खेल। राजा, वज़ीर और प्यादों का खेल। नियम बेहद सरल है—खेल तब तक चलता है जब तक राजा ज़िंदा है, और राजा तभी तक बचेगा, जब तक उसका वज़ीर जिंदा है। इस कहानी का वज़ीर एक शांत, अंतर्मुखी गणित का टीचर है। बाहर से साधारण, भीतर से जटिल। वह राजा को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, लेकिन यह “किसी भी हद” क्या है, इसका अंदाज़ा फिल्म आपको धीरे-धीरे देती है।

यह फिल्म असल में कत्ल की नहीं, सूत्रों की कहानी है। गणितीय सूत्रों की, समय के सूत्रों की और मनुष्य के भीतर चलने वाली गणनाओं की। एक छोटा-सा संवाद पूरी फिल्म की रीढ़ बन जाता है—कुछ समस्याओं को सुलझाने में दस-पंद्रह साल लग जाते हैं, बशर्ते पूरा समय मिले, बिना किसी रुकावट के। इस एक पंक्ति में ही फिल्म का दर्शन छिपा है।
यहीं से नरेंद्र का चरित्र खुलता है। वह सिर्फ शिक्षक नहीं है, वह गणित का भक्त है। उसका पहला प्रेम कोई इंसान नहीं, बल्कि एक अधूरी समस्या है, जिसे वह सालों से सुलझाने की कोशिश कर रहा है। भावनाएँ, रिश्ते, डर—सब उसके लिए सेकेंडरी हैं। प्राथमिक है सिर्फ एक चीज़—पूर्ण एकांत और समय। अब वह एकांत कहाँ मिलेगा, यह सवाल फिल्म आप पर छोड़ देती है।
इसी बिंदु पर जाने जान आपको जज बना देती है। आप खुद तय करते हैं कि जो हो रहा है, वह बलिदान है या अपराध। फिल्म जवाब नहीं देती, सिर्फ संकेत देती है। अजीत की बॉडी का रहस्य भी ऐसा ही है। साफ-साफ कुछ नहीं कहा जाता, लेकिन इतने संकेत छोड़ दिए जाते हैं कि दिमाग अपनी-अपनी थ्योरी गढ़ने लगे। क्या लाश कहीं है? या सचमुच “कहीं नहीं” है? निर्देशक दर्शक को क्लोज़र नहीं देता, बल्कि बेचैनी देता है—और शायद यही उसकी सबसे बड़ी शरारत है।
निर्देशन की बात करें तो Sujoy Ghosh को दर्शकों से पंगा लेने में खास आनंद आता है। वह आपको दो घंटे तक एक दिशा में चलाते हैं और आख़िरी दो मिनट में ज़मीन खिसका देते हैं। यह झटका बहुत बड़ा नहीं होता, लेकिन ऐसा होता है कि देर तक याद रहता है—जैसे नंगे बिजली के तार को हल्के से छू लिया हो।
अभिनय की दुनिया में तो मामला और साफ है। Jaideep Ahlawat एक तरफ खड़े दिखते हैं और बाकी फिल्म दूसरी तरफ। वह अभिनय नहीं करते, किरदार में घुल जाते हैं। किस सीन में क्या करेंगे, इसका अंदाज़ा लगाना लगभग नामुमकिन है। Vijay Varma हर फिल्म में गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं, और यहाँ भी उनकी मौजूदगी कहानी को धार देती है। Kareena Kapoor इस फिल्म में ग्लैमर से ज़्यादा असहजता लेकर आती हैं—और वही उनके किरदार की ताकत है।

फिल्म की रफ्तार तेज़ है। दो घंटे कब निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। गाने-बजाने में समय बर्बाद नहीं किया गया। यह सीधी, सधी हुई, नो-नॉनसेंस थ्रिलर है। हाँ, कमियाँ हैं। कहीं-कहीं लगता है कि कहानी और गहराई में जा सकती थी। कुछ संभावनाएँ जानबूझकर अधूरी छोड़ दी गई हैं—शायद इसलिए कि दर्शक सोचता रहे।
कुल मिलाकर, जाने जान टाइम पास नहीं, टाइम वर्थ फिल्म है। यह आपको संतुष्ट नहीं करती, बल्कि बेचैन करती है। सवाल देती है, जवाब नहीं। और शायद यही वजह है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग में चलती रहती है।
बाकी… अगर सब कुछ यहीं जान लिया, तो देखने का मज़ा ही क्या? जाइए, नेटफ्लिक्स खोलिए, सब्सक्रिप्शन का सही इस्तेमाल कीजिए—और खुद तय कीजिए कि राजा कौन है, वज़ीर कौन और खेल आखिर चला किसने।
हाँ, एक बात है जिस पर मैं अब भी पूरी तरह कन्विंस नहीं हो पाया हूँ—और मुमकिन है आप भी उसी उलझन में हों। फिल्म देखते हुए दिमाग बार-बार इस सवाल पर अटक जाता है कि क्या सचमुच इस पूरी योजना की नैतिक कीमत कुछ ज़्यादा ही भारी नहीं है?
सबसे बड़ा सवाल वही है—एक निर्दोष भिखारी को इस कथानक के लिए मार देना। क्या यह फैसला पूरी फिल्म के कथ्य और उसके संदेश को कहीं न कहीं कीचड़ में नहीं धकेल देता? जिस क्षण यह बात सामने आती है, उसी क्षण कहानी सिर्फ थ्रिलर नहीं रहती, वह एक नैतिक बहस बन जाती है। अब सवाल यह नहीं रह जाता कि कहानी कितनी चतुर है, बल्कि यह हो जाता है कि क्या यह चतुराई इंसानियत के साथ चल भी सकती है?
क्या कोई आदमी इतना निर्दय और स्वार्थी हो सकता है कि सिर्फ अपने गणित के जुनून के लिए—अपने भीतर पल रहे एक बौद्धिक भूत को तृप्त करने के लिए—किसी निर्दोष की जान ले ले? वह भी तब, जब उसका मकसद किसी से बच निकलना नहीं, बल्कि खुद को जेल भिजवाना है। यह तर्क दिमाग को असहज करता है। जुनून अपनी जगह, लेकिन क्या जुनून इंसान को इस हद तक अंधा कर सकता है?
दूसरा सवाल और भी पेचीदा है। अगर सिर्फ तारीख बदलनी थी—अगर हत्या 9 की जगह 10 तारीख को दिखानी थी—तो क्या उसके लिए एक और कत्ल ज़रूरी था? यानी एक कत्ल को “मैनेज” करने के लिए दूसरा कत्ल? यह तर्क गणितीय पहेली की तरह तो रोमांचक लगता है, लेकिन मानवीय धरातल पर आते ही लड़खड़ा जाता है।
फिर तकनीकी स्तर पर भी कुछ सवाल उठते हैं। अगर लाश को पूरी तरह जला दिया गया, अगर पहचान सिर्फ कपड़ों पर लगे खून के धब्बों से की गई, तो मृत्यु की सटीक तारीख आखिर तय कैसे हुई? फॉरेंसिक साइंस इतनी भी जादुई तो नहीं कि राख से कैलेंडर निकाल ले। हो सकता है यहाँ मैं ज़्यादा तकनीकी हो रहा हूँ, लेकिन थ्रिलर फिल्में जब दिमाग से खेलती हैं, तो दर्शक भी दिमाग लगाता है—और तब ऐसे सवाल अपने आप उठते हैं।

शायद फिल्म हमसे यह उम्मीद करती है कि हम इन बातों को नजरअंदाज़ कर दें, यह मान लें कि कहानी का संसार हमारा संसार नहीं है। लेकिन समस्या यही है—फिल्म खुद को इतना रियल रखती है कि दर्शक उससे लॉजिक भी रियल ही माँगने लगता है। यहीं आकर कहानी का जादू थोड़ा-सा कमजोर पड़ता है।
फिर भी, हो सकता है यही फिल्म का असली दांव हो। हो सकता है निर्देशक हमें यह बताना चाहता हो कि जब इंसान अपने जुनून का गुलाम बन जाता है, तो नैतिकता, करुणा और तर्क—सब पीछे छूट जाते हैं। या फिर यह भी संभव है कि यह सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने की एक सुविधाजनक चाल हो, जिसे हमने ज़रूरत से ज़्यादा गंभीरता से पकड़ लिया है।
तो सवाल अब भी खुला है—क्या यह सब तार्किक है, या सिर्फ सिनेमाई छूट?
मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूँ। और शायद फिल्म चाहती भी यही है कि हम आश्वस्त न हों, बल्कि सवाल करते रहें।
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