भारतीय सिनेमा जगत — जाने कहाँ गए वो दिन

भारतीय सिनेमा जगत जाने कहाँ गए वो दिन

भारतीय सिनेमा का विकास एक अद्भुत यात्रा है—एक ऐसी यात्रा जिसमें प्रौद्योगिकी और सामाजिक परिवर्तन दोनों ने अपनी-अपनी गहरी छाप छोड़ी है। पुराने समय की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से लेकर आज की हाई-डेफिनिशन डिजिटल फिल्मों तक, सिनेमा ने अनगिनत रूपांतरण देखे हैं। जहाँ पहले फिल्में केवल मनोरंजन का माध्यम थीं, वहीं आज वे सामाजिक संदेश पहुँचाने, इतिहास की झलक दिखाने और कई वैचारिक धारणाएँ स्थापित करने का शक्तिशाली साधन बन गई हैं।

आज के दौर में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने सिनेमाघरों की परिभाषा ही बदल कर रख दी है। अब दर्शक अपनी मनपसंद फिल्में और शो अपने समय के अनुसार, घर बैठे देख सकते हैं। विशेष प्रभाव (VFX) और डिजिटल एनीमेशन ने कल्पनाओं को परदे पर उतारने की कला को एक नए ब्रह्मांड में पहुँचा दिया है, जहाँ असंभव भी दृश्य बन सकता है।

सिनेमा जगत में जितना बदलाव आया है—शायद ही किसी अन्य मनोरंजन माध्यम में आया हो। हमारी पीढ़ी वाकई खुशनसीब है कि उसने इस 360 डिग्री परिवर्तन को न केवल देखा है, बल्कि उसे महसूस भी किया है। कहाँ वह ईस्टमैन कलर का जमाना और कहाँ आज के मल्टीप्लेक्स, वीएफएक्स का कमाल और ओटीटी का धमाल!

याद है न, वह गुज़रा जमाना जब सिनेमा हॉल शहर में गिनती के होते थे? हम तो गाँव से गंगापुर सिर्फ मूवी देखने आते थे। हाँ, सिर्फ मूवी देखने के बहाने घर से निकलना आसान नहीं होता था, इसलिए पिताजी के व्यापार संबंधी खरीददारी की आड़ लेनी पड़ती थी। और हम बड़े गर्व से कहते—“अब मैं बड़ा हो गया हूँ पापा, आपके काम-धंधे में हाथ बँटाना मेरा कर्तव्य है।”

गाँव से वजीरपुर तक पैदल, और वहाँ से बसों की धक्का-मुक्की खाकर शहर पहुँचते। पिताजी जानते थे कि हमें सिनेमा का शौक है—इसलिए जेब खर्च के नाम पर थोड़ी-सी रकम अलग से पकड़ा देते थे।

सिनेमा हॉल की वह लंबी कतार याद है? कोई फिल्म अगर हिट हो जाए, तो लाइन में खड़े-खड़े दिल ऐसे धड़कता कि कहीं ‘हाउसफुल’ का बोर्ड न टंग जाए। आँखें बार-बार इधर-उधर घूमकर ब्लैक में टिकट बेचने वाले को ढूँढ़ती रहतीं।

अगर दो साथी होते, तो एक को बाकायदा ‘ब्लैक टिकट खोजो दस्ता’ बनाकर भेज देते।
उस आदमी का ‘10 का 20… 10 का बीस…’ चिल्लाना और हमारा जेब टटोलकर अपने पास बची चिल्लर को सँभालना—यह अपनी ही किस्म का थ्रिल था।

पिताजी से तो एक ही टिकट के पैसे मिले होते थे। जेब खर्च की चिल्लर अलग थी, पर ब्लैक टिकट के लिए वह भी नाकाफी थी। ऐसे में अपने साथी से उधारी की मिन्नतें करना, गिड़गिड़ाना—यह भी उस दौर की संस्कृति का हिस्सा था। मन में एक ही डर—लाइन में नंबर आते-आते कहीं ‘हाउसफुल’ न हो जाए।

ब्लैक में टिकट बेचने वालों की बनावट भी बड़ी प्यारी होती थी—
गले में पसीना सोखता रुमाल, जो शर्ट की उठी हुई कॉलर के बीच फँसा होता।
शर्ट के ऊपर के आधे बटन खुले हुए—और आधे बटन तो जैसे पहले ही अपनी नाकामी से दुखी होकर शर्ट छोड़कर भाग गए हों।
मुँह में जर्दा-तंबाकू का बीड़ा, एक गाल और दाँतों के बीच दबा हुआ, जिसका रस लावा की तरह बाहर टपकता रहता।
तन से सींकिया, पर मन से ऐसा ऐटिट्यूड जैसे थिएटर के पोस्टर से उतरकर आया ‘फटा हुआ हीरो’।

हमेशा आगे की सीट का टिकट लेते थे। यह हमारी जेब की मजबूरी भी थी और हमें अपनी समझदारी भी लगती थी। हमें तो लगता—ये लोग बॉक्स और बालकनी में बैठकर हमसे चार गुना पैसा देते हैं और इतना पीछे से मूवी देखते हैं—क्या फिजूलखर्ची है!

गाँव की रामलीला की यादें भी मन में बसी थीं—सुबह-सुबह जाकर आगे की सीट रोकना, पत्थरों को जोड़कर कुर्सी बनाना, और दिन भर लड़-लड़ाकर उसी जगह टिके रहना।

सिनेमा हॉल में मूवी शुरू होने से पहले विज्ञापन आते—और उन विज्ञापनों में लिरिल गर्ल का झरने में नहाता हुआ दृश्य… बस! टिकट का आधा पैसा वहीँ वसूल हो जाता।

हमें सीटी बजाना नहीं आता था, पर औरों के साथ हम भी सीटी जैसी शक्ल बनाकर हवा ज़रूर फूँकते थे।
हर गाने पर चिल्लर उछालना—यह तो जैसे दर्शक धर्म का हिस्सा था।
जेब में जो थोड़ी-बहुत बची रहती, उसमें से दो-चार सिक्के हम भी उड़ाते—क्योंकि आगे बैठते थे, माथे पर लगने का डर कम था।
कुछ चिल्लर बचाकर रखते—जो इंटरवल में कुल्फी खाने के काम आती।

“पुराने जमाने के सिनेमा हॉल का भीड़भाड़ वाला दृश्य—आगे की सीटों पर बैठे बच्चे गद्दी की रुई निकालते हुए, बीच में घूमते चाय-कुल्फी-पापड़ वाले विक्रेता, खुले आँगन वाले सामूहिक वॉशरूम का अव्यवस्थित दृश्य, दीवारों पर तंबाकू की पिचकारी से बने एब्सट्रैक्ट निशान, और बाहर चमकती धूप में आँखें मिचमिचाते दर्शक—एक व्यंग्यात्मक, नॉस्टेल्जिक भारतीय सिनेमा संस्कृति को दर्शाते हुए।”


इंटरवल—एक अपना ही महाभारत

इंटरवल का माहौल तो मानो एक अलग ही मेले जैसा होता था। चाय, कुल्फी, पापड़ वाले पूरे हॉल में अपनी-अपनी हाँक लगाते घूमते। लोग भी एकदम एकजुट भाव से मूत्रदान के लिए बाहर निकलते—यह दृश्य किसी सामाजिक एकता दिवस की सामूहिक परेड से कम न लगता।

आज के मल्टीप्लेक्सों के पाँच सितारा वॉशरूम कहाँ—उस वक्त तो एक खुला-खुला सा आँगन हुआ करता था। बीच में एक नाली बहती और उसके किनारे देश के जिम्मेदार नागरिक खड़े होकर समूहिक योगदान देते। पार्टीशन नाम की चीज़ तो मानो जानबूझकर छोड़ी जाती थी ताकि एक बार में ही पूरी कतार निपट जाए। चाहे किसी का योगदान के छींटे किसी और पर क्यों न पड़ जाएँ—उस समय इसे दुर्घटना नहीं, परिस्थितिजन्य योगदान माना जाता था।

इसी हलचल में वे लोग भी आपको मिल जाते जो पूरे पहले हाफ में बीड़ी-सिगरेट की तलब दबाए बैठे थे। अभी बाहर निकले नहीं कि आग सुलग गई। जर्दा-तंबाकू वालों का तो मानो यह वेलकम ब्रेक ही होता था—अपनी पिचकारी की फुहार से दीवारों को इस कदर सजाते कि वह पूरा आँगन किसी अजीब से ‘एब्सट्रैक्ट आर्ट गैलरी’ जैसा दिखाई देने लगता।

हम बच्चों का एक और पवित्र कर्तव्य था—सीट की गद्दी से रुई निकालना। पता नहीं क्यों, हमें सीट की गद्दी से एक जन्मजात शिकायत थी। गाँव के नाई चाचा की फट्टे वाली कुर्सी से हमारी पीठ घुल-मिल चुकी थी—यह मुलायम गद्दी हमारी आदतों के खिलाफ थी।

और मैं अकेला नहीं था—आगे की पंक्तियों में बैठने वाले लगभग सभी बच्चे इस ‘गद्दी मुक्तिकरण आंदोलन’ में भाग लेते। डरावने दृश्यों पर तो यह प्रक्रिया और तेज़ हो जाती—मानो रुई निकालते हाथों को भी डर लगता हो कि वे धीरे क्यों चलें।

फिल्म खत्म होते ही हम दौड़कर बाहर निकलते। सिनेमा हॉल का दरवाज़ा सीधे सड़क पर खुलता था। बाहर की धूप इतनी तेज़ होती कि आँखें चौंधिया जातीं—कम से कम दस मिनट तक तो दुनिया धुँधली ही लगती। फिर जाकर सड़क और लोग नज़र आने लगते।

थिएटर भी आज के एसी मल्टीप्लेक्सों की तरह नहीं होते थे। हवा के नाम पर दो फर्राटेदार पंखे दीवार पर टँगे रहते, जो गर्मी में ऐसी हवा फेंकते कि चाहकर भी कोई आँखें बंद कर झपकी नहीं ले सकता।
ऊपर से लोगों की सीटी, ताली, सीटियाँ और शरीर से निकलती दैहिक गैस—सब मिलकर ऐसा वातावरण रच देते कि फिल्म बीच में छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। पूरा माहौल आपको मजबूर करता कि आप पूरी फिल्म देखें, चाहे आपकी इच्छा हो या न हो।

वह ज़माना था जब सिनेमा सचमुच सिनेमाथाl वह जमाना सचमुच निराला था—जब फिल्में बनती थीं सिर्फ़ मनोरंजन के लिए। मसाला, ड्रामा, कॉमेडी—सब कुछ लार्जर-दैन-लाइफ। हीरो भी ऐसा कि हर काम चुटकी में कर दे। हम दर्शक अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों से भागकर कुछ पल कल्पना के संसार में जाते और लौटते तो थोड़ा हल्का महसूस करते।

आजकल की फिल्में बड़े ‘रियलिस्टिक’ होने के नाम पर हिंसा, सेक्स, थ्रिल और वल्गर लैंग्वेज का अतिरेक परोसने लगी हैं। निर्माता और निर्देशक यह साबित करने पर तुले रहते हैं कि फिल्म की रील लाइफ बिल्कुल रियल लाइफ जैसी है। लेकिन ज़रा सोचिए—इंसान सिनेमा देखने जाता क्यों है? रियलिटी से भागने, अपने दुःख-दर्द को थोड़ी देर भूलने और किसी कल्पना संसार में खो जाने के लिए।

पर रियल लाइफ संवाद और नकारात्मकता परोसते-परोसते हम मानव मन को और अधिक कुंठित करने लगे हैं। सिनेमा अब केवल मनोरंजन नहीं—समाज का आइना बन गया है। और यह आइना दिखाते-दिखाते हमने मन की कोमलता, संवेदनशीलता और सपनों की जगह कठोरपन, असंवेदनशीलता और नकारात्मकता भर दी है।

वह जमानाजो सचमुच जमानाथा आज हालात यह हैं कि पहले जो ड्रामा-प्रधान फिल्में वर्षों तक सिनेमाघरों में चलती थीं, आज कोई फिल्म दस दिन हॉल में टिक जाए तो ‘हिट’ मानी जाती है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म और उनके सीजन-दार कंटेंट ने तो सेक्स और वल्गैरिटी को मानो ‘मुख्य आकर्षण’ बना दिया है।

परिवार के साथ फिल्म देखने का दौर कहीं पीछे छूट गया है।
सिनेमा जो कभी उत्सव हुआ करता था—अब एक बहुत व्यक्तिगत, बहुत निजी अनुभव बनकर रह गया है।
जैसे सिनेमा नहीं, किसी की व्यक्तिगत भूख का मनोरंजन मात्र।

आज भी मेरे जैसे अनेक दर्शक उस दौर को याद करते होंगे—जब फिल्में न केवल मनोरंजन करती थीं, बल्कि दिलों को छू लेने वाली कहानियाँ भी साथ ले आती थीं।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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